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महाधिवक्ता के गलत तथ्य से HC ने शाह ब्रदर्स को किस्तो में बकाया लौटाने को कहा था, अब सरकार ने महाधिवक्ता से कहा कोर्ट से करें पुनर्विचार का अनुरोध

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Ranchi:  झारखंड सरकार माइनिंग कंपनी शाह ब्रदर्स से पैनाल्टी की राशि एकमुश्त ही वसूलेगी. सरकार ने महाधिवक्ता को पत्र लिख कर कहा है कि वह हाई कोर्ट में अनुरोध के लिये आवेदन करें. उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट ने शाह ब्रदर्स को राहत देते हुए किस्तों में राशि देने का आदेश दिया था. जिसके बाद झारखंड विकास मोर्चा के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया था कि राज्य सरकार के महाधिवक्ता ने हाई कोर्ट में गलत तथ्य दिये. शाह ब्रदर्स के पक्ष में सरकार की अनुमति के बगैर तथ्य रखे. इस कारण हाई कोर्ट ने शाह ब्रदर्स के पक्ष में फैसला दिया है. श्री मरांडी के आरोप पर महाधिवक्ता ने मीडिया में दिये बयान में कहा था कि उन्होंने राज्य हित में अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए हाई कोर्ट में सरकार का पक्ष रखा था.

जानकारी के मुताबिक 2 नवंबर 2018 को खान एवं भूतत्व विभाग के अपर सचिव अजीत शंकर ने महाधिवक्ता को एक पत्र लिखा है. जिसमें महाधिवक्ता से कहा गया है कि वह हाई कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करें. चिट्ठी के मुताबिक शाह ब्रदर्स और एनकेपीके की बकाया राशि को किस्त में भुगतान किये जाने पर खान विभाग का मानना है कि राजस्व हित में पूरी राशि का एकमुश्त भुगतान होना चाहिए.

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दूसरे कंपनियों के मामले में भी दायर करें पुनर्विचार याचिका

खान विभाग के अपर सचिव अजीत शंकर ने झारखंड के महाधिवक्ता को जो पत्र लिखा है, उसमें कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में पारित आदेश में राशि एकमुश्त 31 दिसंबर 2017 तक जमा करने का आदेश था. और इसके अनुपालन में कई कंपनियों द्वारा एकमुश्त राशि जमा की जा चुकी है.

इस मामले में उच्च न्यायालय द्वारा लंबे अंतराल के लिए किस्त निर्धारण किया गया है. विभाग का मानना है कि राजस्व हित में पूरी राशि का एकमुश्त भुगतान ब्याज सहित करने के आदेश हेतु उच्च न्यायालय में अनुरोध की आवश्यकता है. अन्य कंपनियों हिंडाल्को, उषा मार्टिन, सेल आदि कंपनियों के अलग-अलग मामलों में भुगतान का अलग-अलग आदेश दिया गया है. उन सभी मामले में आदेश पर पुनर्विचार करने के लिये कोर्ट से अनुरोध करने की आवश्यकता है. अपर सचिव ने लिखा है कि हाइकोर्ट द्वारा पारित आदेश के आलोक में पुनर्विचार के संबंध में अग्रतर कार्रवाई के दिशा-निर्देश के लिए संचिका विधि विभाग झारखंड सरकार को भेजी गयी है, जो अभी तक प्राप्त नहीं हो पायी है.

बाबूलाल ने महाधिवक्ता को हटाने की मांग की थी

झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ने महाधिवक्ता पर अदालत में गलत तथ्य रखते हुए शाह ब्रदर्स को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया था. साथ ही इस मामले की न्यायिक जांच कराने की मांग की है. उन्होंने सरकार से सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में कमेटी गठित कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने और महाधिवक्ता को पद से हटाने का भी आग्रह किया है. इस संबंध में मरांडी ने मुख्यमंत्री रघुवर दास को पत्र भी लिखा है. मरांडी ने कहना है कि उपायुक्त पश्चिमी सिंहभूम ने शाह ब्रदर्स पर 250.63 करोड़ रुपये की पेनाल्टी लगाते हुए एकमुश्त राशि अदा करने का आदेश दिया था. इसके खिलाफ शाह ब्रदर्स ने हाइकोर्ट में याचिका दायर की.

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एकल पीठ में शाह ब्रदर्स की याचिका खारिज होने पर खंडपीठ में अपील याचिका दायर की गयी. खान विभाग ने इस मामले में प्रति शपथ पत्र दायर कर 250.63 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति मांग पत्र को सही ठहराया. मरांडी ने कहा कि एक अक्तूबर को मामले की सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि पट्टेधारी और राज्य सरकार के बीच एक समझौता हुआ है. दोनों पक्षों की संयुक्त सहमति से 250.63 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि प्राप्त न कर किस्तों में प्राप्त करने की सहमति बनी है. प्रथम किस्त 40 करोड़ रुपये की राशि 11 अक्तूबर तक दिये जाने पर राज्य सरकार खनन परिवहन चालान निर्गत कर देगी, जो कि अभी पूर्ण भुगतान किये जाने के कारण बंद है.

महाधिवक्ता की इस दलील पर अदालत ने शाह ब्रदर्स को 11 अक्तूबर तक 40 करोड़ रुपये व शेष बकाया पेनाल्टी राशि सितंबर 2020 तक जमा करने का आदेश दे दिया. साथ ही प्रथम किस्त जमा करने के तुरंत बाद ट्रांजिट परमिट निर्गत करने का निर्देश दिया. जब अदालत का आदेश खान व भूतत्व विभाग में पहुंचा, तो पदाधिकारी भौंचक रह गये. इस मामले में विभाग की ओर से कोई सहमति नहीं बनी है. इसके बाद भूतत्व सचिव ने संचिका को आवश्यक मार्गदर्शन के लिए विधि विभाग के पास भेज दिया, जो अभी लंबित है.

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मरांडी ने आरोप लगाते हुए कहा कि इस पूरे प्रकरण में राज्य सरकार, महाधिवक्ता और शाह ब्रदर्स की मिलीभगत प्रमाणित होती है. सरकार शाह ब्रदर्स को अनुचित आर्थिक लाभ पहुंचा कर उपकृत करना चाहती है. जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आलोक में टाटा स्टील, रुंगटा माइंस, अनिल खिरवाल, रामेश्वरम जूट, देबुका भाई भेलजी एवं कई अन्य कंपनियों ने तय समय सीमा के अंदर एकमुश्त राशि का भुगतान किया था.

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