Opinion

चीन के साथ व्यापार करना है, सो “हुआ तो हुआ”

Apurv Bhardwaj

Jharkhand Rai

2019 के चुनाव अभियान में मोदी जी ने राहुल गांधी के खास सेम पित्रोदा के एक बयान को लेकर बड़ा बवाल काटा था. मैंने चुनाव विश्लेषण में कहा था कि यह बयान गेम बदल देगा और हुआ भी ऐसा ही था. लेकिन आज जवाब देने की बारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की है. वर्ष 2014 के बाद पहले मसूद अजहर हुआ. फिर डोकलाम हुआ और अब गलवान हुआ. पर हमें तो चीन के साथ व्यापार करना है, सो “हुआ तो हुआ”

वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी के गुजराती दोस्त बोलते थे कि चीन के साथ भारत का व्यापार काफी कम है. चीन को सीधे निवेश की छूट मिलनी चाहिये. ताकि भारत में तकनीक और पूंजी आ सके. 2014 के बाद में निवेश का पैटर्न बताता है कि शायद मोदी सरकार ने यह सुझाव मान लिया. चीन भारत में निवेशक बन गया. उसका टेलीकॉम सेक्टर में निवेश इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.

आज जो आप हर दूसरे आदमी के पास चीनी मोबाइल देख रहे हैं, वो मोदी सरकार द्वारा चलाये गए “मेक इन इंडिया” की बदौलत है. वर्ष 2010-2011 में तो टेलीकॉम ऑपरेटरों पर चीनी कम्पनियों से उपकरण ख़रीदने पर बेन लग गया था. इलेक्ट्रॉनिक आइटम के मैन्यूफेक्चरिंग में सब्सिडी तो 2011 में भी थी. लेकिन जब किसी भी सरकार का प्रधानमंत्री चीनी राष्ट्रपति के साथ झूला झूलता है तो निवेशक बेफिक्र हो जाता है.

Samford
भारत में चीन के आयात का औसत 1991 से 2020 तक 127.29 INR बिलियन था, जो 2018 के सितंबर में 467.49 INR बिलियन के सभी उच्च स्तर तक पहुंच गया. 1991 के अप्रैल में 0.01 INR बिलियन का रिकॉर्ड कम था. भारत का चीन से आयात, मूल्य का डाटा चार्ट अंतिम बार 2020 के जून में अपडेट किया गया.

मेक इन इंडिया के कारण देश शोओमी, ओप्पो, वीवो, वन प्लस जैसे प्रमुख ब्रांड की मेन्यूफेक्चरिंग का बड़ा हब बन गया. आज यह हालत है कि भारत में लोगों के हाथ में ओप्पो-वीवो हैं. नेटवर्क को हुआवे और जेडटीई चला रहे हैं. जबकि अमेरिका में सरकारी कंपनियों को हुआवे व जेडटीई से किसी भी तरह की खरीद से रोक दिया गया. अमेरिका के बाद में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड ने भी इन कंपनियों से दूरी बनाई.

पेटीएम जैसी अनेकों ऐप्लिकेशन के पीछे अलीबाबा व टेनसेंट की पूंजी है. टेलीकॉम ऐसा सेक्टर है जहां से गोपनीय सूचनाएं और डाटा लीक हो सकता है. ऐसे संवेदनशील सेक्टर इतनी बड़ी पूंजी का आना सबसे बड़ा रहस्य है.  2010 में मनमोहन सरकार ने तो निवेश तो दूर आयात को कम करने की नीति बनाई थी, पर 18 बार मिलकर मोदी सरकार ने ऐसा क्या खेल खेला की चीन टेलीकॉम का राजा हो गया?

असल में इस कहानी की शुरुआत 2007 के वायब्रेंट गुजरात में शुरू हो गई थी और मोदी के मुख्यमंत्री काल मे चीन को इज ऑफ डूइंग बिजनेस करने का पूरा मौका मिल गया. मोदी के सत्ता में आते ही 2014 के बाद का समय भारत व चीन के कारोबारी रिश्तों का गोल्डन पीरियड बन जाता है.

 

1962 के बाद हमें चीन ने फिर धोखा दे दिया है. हम लगातार धोखे खा रहे हैं. पर जवाब देने से कतरा रहे हैं.  और मजबूरी इस हद तक है कि सरकार चीन के व्यापारी दखल को कम करने का जोखिम तक लेने से भी डर रही है. क्योंकि सरकार को पता है कि उसने ऐसा कुछ किया तो बची खुची अर्थव्यवस्था भी निपट जायेगी. और पहले से घाटे में चल रहे टेल्को ऑपरेटर दिवालिये हो जाएंगे.

इन 6 सालों में आप चीन से हर मोर्चे पर मात खाते हैं. लेकिन लगातार व्यापार करते हैं. मसूद पर मात खाने के बाद डोकलाम की डकैती के बाद भी आपने सोचा कि “हुआ तो हुआ”.  चलो व्यापार करते हैं.  मुझे मालूम है आप बोलते है कि व्यापार आपके खून में है, लेकिन प्रधान सेवक जी कम-से-कम आज तो देश की सेवा करिये. दुश्मन के साथ व्यापार नहीं.

 

डिस्क्लेमरः यह लेखक के निजी विचार हैं और यह लेख मूल रुप से उनके फेसबुक वॉल पर प्रकाशित हुआ है.

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