Opinion

क्या मोदी सरकार ने भारतीय बाजार पर अमेरिकी कारपोरेट को कब्जा करने की छूट दे दी है

Girish Malviya

क्या आपको आश्चर्य नहीं हो रहा कि अचानक से बड़े अमेरिकी कारपोरेट को क्या हो गया, जो भारत में लगातार धनाधन धन बरसाये जा रहे हैं? सोमवार को गूगल के सुंदर पिचाई ने भी घोषणा की है भारत की डिजिटल इकोनॉमी को बढ़ावा देने के लिए गूगल कंपनी आनेवाले सालों में क़रीब 75 हज़ार करोड़ रुपये का निवेश करेगी.

इससे पहले इस कोरोना काल में 10 से 12 बड़ी अमेरिकी कंपनियों ने भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी जिओ में कुल 25 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीद ली है, इसमें फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट भी शामिल हैं. इसी का नतीजा है कि रिलायंस जिओ के भाव आसमान पर हैं और मुकेश अंबानी को विश्व में सातवां सबसे अमीर आदमी बनने का खिताब मिल गया.

‘गूगल’ पर जिस कंपनी का स्वामित्व है वह कम्पनी है ‘अल्फाबेट’ इंक. इसमें ‘ऐपल’, ‘फ़ेसबुक’ और ‘एमेज़ॉन’ की हिस्सेदारी है. यानी फिर से वही GAFA (गूगल, ऐपल, फ़ेसबुक और एमेज़ॉन) ग्रुप के नाम से कुख्यात इन कंपनियों का समूह जिसे टेक जाइंट्स कहा जाता है.

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गूगल फेसबुक की कमाई विज्ञापनों से ही अधिक है. कोरोना काल में विज्ञापनों से होनेवाली कमाई में अचानक बड़ी गिरावट आयी है. उसके बावजूद कोरोना काल में इनके मालिकों की दौलत में अप्रत्याशित उछाल आया है.

अब GAFA भारत में अपने पंजे फैला रहा है. जो उद्योगपति यहां उसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा थे, उसे उन्होंने अपने साथ मिला लिया है. आपको याद होगा कुछ साल पहले मुकेश अंबानी ने डेटा को 21 शताब्दी के लिए ‘तेल’ की संज्ञा दी थी. सरकार पिछले दो साल से ई-कॉमर्स पॉलिसी पर काम कर रही थी. नयी ई-कॉमर्स पॉलिसी में यह प्रावधान रखा जाना था कि अमेजन जैसी वो सभी कंपनियां जो ग्राहकों का डेटा विदेश में स्टोर कराती हैं, उनको एक तय अवधि में ऑडिट कराना अनिवार्य होगा.

गूगल, मास्टरकार्ड, वीजा और अमेजन जैसी अमेरिकी कंपनियां भारत में डेटा के स्थानीयकरण के खिलाफ लॉबीइंग करती आयी हैं. यह खबर भी आयी थी कि मोदी सरकार GAFA के बढ़ते दबाव के आगे झुक गयी है और ई-कॉमर्स पॉलिसी में देश के भीतर ही ग्राहकों का डाटा स्टोर करने की शर्त को हटाने के लिए मान गयी है. पिछले साल रिजर्व बैंक ने भी कहा था कि सभी विदेशी पेमेंट कंपनियों को अपने डेटा को केवल भारत में रखना होगा.

यह सारा खेल डेटा लोकलाइजेशन का है. भारत अमेरिकी कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार है. कोरोना के बहाने चीनी कंपनियां लोगों के निशाने पर हैं. यानी फायदा उठाने का यही असली मौका है.

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डेटा लोकलाइजेशन का अर्थ है कि देश में रहनेवाले नागरिकों के निजी आंकड़ों का कलेक्शन, प्रोसेस और स्टोर करके देश के भीतर ही रखा जाये. देश में बड़े-बड़े डेटा सेंटर बनाये जायें और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थानांतरित करने से पहले लोकल प्राइवेसी कानून या डेटा प्रोटक्शन कानून की शर्तों को पूरा किया जाये.

भारत को यदि छोड़ दिया जाये तो डेटा लोकलाइजेशन के मामले दुनिया के सभी बड़े देश अपने डेटा की सुरक्षा को सुनिश्चित कर चुके हैं. डेटा लोकलाइजेशन को लेकर रूस में सबसे ज्‍यादा पाबंदियां हैं. चीन में हर ‘जरूरी डेटा’ को लोकली स्‍टोर करने का नियम है. किसी तरह के क्रॉस-बॉर्डर पर्सनल डेटा ट्रांसफर को बिना सुरक्षा एजेंसियों से चेक कराये पूरा नहीं किया जा सकता. यूरोपियन यूनियन में डेटा लोकलाइजेशन अनिवार्य नहीं है. मगर एक मजबूत डेटा प्रोटेक्‍शन फ्रेमवर्क वहां काम कर रहा है. सिर्फ भारत ही ऐसा देश है जो डेटा लोकलाइजेशन में बहुत पीछे है. मोदी सरकार डेटा रेगुलेशन की पॉलिसी बनाने की बात तो करती है, लेकिन बिना लोकलाइजेशन के डेटा रेगुलेशन का कोई मतलब नहीं है.

ताजा स्थिति जो समझ में आ रही है कि जो उद्योगपति, जो मोदी सरकार पर डेटा रेगुलेशन की पॉलिसी बनाने के लिए दबाव डाल रहा था, उसे ही अमेरिकी कंपनियों ने खरीद लिया है. अब अमेरिकियों के लिए रास्ता बिल्कुल साफ है और इसी कारण गूगल 75 हजार करोड़ रुपये जैसी बड़ी रकम भारत में ‘डिजिटल इकनॉमी’ को बढ़ावा देने के लिए राजी हो गया है.

डिजिटल इकोनॉमी का यहां सीधा अर्थ हैः भारतीय बाजार पर अमेरिकी कारपोरेट का कब्जा.

डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.

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