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क्या सच में झारखंड में अपराध बढ़ गया है और क्यों निशाने पर हैं डीजीपी एमवी राव!

Saurav Singh

Ranchi: कोरोना काल में लाखों लोगों को थाना परिसर में भोजन कराने के बाद भी पिछले कुछ दिनों से झारखंड पुलिस निशाने पर है. खासकर विपक्षी पार्टी के. तो क्या सच में झारखंड में अपराध और नक्सलवाद बढ़ गया है! क्या सच में झारखंड में लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति पिछले सालों की तुलना में खराब हो गयी है! हमने आंकड़ों से इसे समझने की कोशिश की.

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नक्सली घटना

वर्ष घटना की संख्या
2018 196 (1 जनवरी से 30 जून तक)
2019 162 (1 जनवरी से 30 जून तक)
2020 145 (1 जनवरी से 30 जून तक)

अपराध की स्थिति

हत्या

वर्ष संख्या
2018 956 (1 जनवरी से 30 जून तक)
2019 960 (1 जनवरी से 30 जून तक)
2020 863 (1 जनवरी से 30 जून तक)

डकैती

2018 78 (1 जनवरी से 30 जून तक)
2019 64 (1 जनवरी से 30 जून तक)
2020 55 (1 जनवरी से 30 जून तक)

लूट   

2018 268 (1 जनवरी से 30 जून तक)
2019 292 (1 जनवरी से 30 जून तक)
2020 283 (1 जनवरी से 30 जून तक)

दुष्कर्म

2018 792 (1 जनवरी से 30 जून तक)
2019 892 (1 जनवरी से 30 जून तक)
2020 892 (1 जनवरी से 30 जून तक)

अपहरण

2018 15 (1 जनवरी से 30 जून तक)
2019 08 (1 जनवरी से 30 जून तक)
2020 10 (1 जनवरी से 30 जून तक)

ऊपर के आंकड़े बताते हैं कि अपराध और नक्सलवाद की स्थिति पहले के दो सालों की जैसी ही है. इसमें ना तो ज्यादा बढ़ोतरी हुई है और ना ही बहुत ज्यादा कमी. यानी कि कम से कम आंकड़ों में स्थिति पहले की तरह है.

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हालांकि आंकड़ों का अपना खेल है. अपराध या नक्सलवाद की स्थिति को सिर्फ आंकड़ों से नहीं आंका जा सकता. घटना की तीव्रता, उसके स्थान और घटना होने के तरीके से भी हालात को अलग-अलग व्याख्या करते हैं. कुछ घटनाएं समाज और उसके लोगों को चौंकाते हैं. जिससे लोगों को लगता है कि अपराधियों-नक्सलियों में पुलिस का डर समाप्त हो गया है. तो क्या राज्य में ऐसी कोई स्थिति बनी है !

तो सवाल यह उठता है कि झारखंड पुलिस और इसके मुखिया डीजीपी एमवी राव विपक्ष के निशाने पर क्यों हैं! अपराध या उग्रवाद की घटनाओं की वजह से या फिर कोई और कारण है. इसे समझने के लिए हमें हालात के 3-4 महीनों में पुलिस विभाग द्वारा उठाये गये प्रमुख फैसलों को देखना होगा.

पहला फैसला

लॉकडाउन में जिनके पास भोजन की व्यवस्था नहीं उनके लिए थानों में भोजन की व्यवस्था करना. इस फैसले से शायद ही किसी को विरोध हो.

दूसरा फैसला

लातेहार में अवैध कोयला कारोबार का फंडाफोड़ हुआ. डीएसपी रैंक तक के अफसर पर कार्रवाई हुई. जिसके बाद डीजीपी ने सीआइडी को निर्देश दिया है कि लातेहार की तरह ही राज्यभर में पिछले कुछ सालों के भीतर हुए अवैध कोयला कारोबार की जांच की जाये.

डीजीपी के इस आदेश से कोयला माफिया और उससे जुड़े सफेदपोश लोगों में हड़कंप मचा है.

तीसरा फैसला

एमवी राव ने डीजीपी का पद संभालते ही 500 से अधिक पुलिसकर्मी, जो अंगरक्षक के रुप में तैनात थे, उसे वापस किया. झारखंड में छुटभैये नेताओं, नेताओं के करीबियों, ठेकेदारों, कोयला माफिया से लेकर कई ऐसे लोगों को अंगरक्षक दे दिये गये थे, जिन्हें इसकी जरुरत नहीं थी.

पुलिस विभाग के इस कदम से हर तबके और हर दल के लोगों में बेचैनी है. और वे परेशान हैं. बॉडीगार्ड हासिल करने के लिए वह हर तरह की कोशिश कर रहे हैं.

चौथा फैसला

एमवी राव ने पद संभालते ही वर्तमान व रिटायर अफसरों के घरों में तैनात जवानों, कुक, माली आदि को भी वापस मंगाया, जो राज्य व राज्य के बाहर रिटायर और वर्तमान अफसरों के घरों में काम कर रहे थे. सेवारत अधिकारियों से भी कहा कि कम से कम जवान या अन्य कर्मचारी अपने घर में रखें.

इस फैसले के बाद डीजीपी कुछ रिटायर और कई सेवारत अधिकारियों के भी निशाने पर आ गये हैं.

पांचवा फैसला

पूर्व मंत्री और विधायक सरयू राय ने सीआइडी द्वारा फोन टेपिंग मामले की जांच कराने के लिए पत्र लिखा था. सीआइडी के द्वारा फोन टेपिंग करने के मामले की जांच की गयी. जिसके बाद साबित हुआ कि पहले कभी सीआइडी में अवैध तरीके से भी फोन टेपिंग हुई थी. पुलिस अफसरों को पशु तस्कर बताकर फोन टेप किये गये. इसे लेकर डोरंडा थाना में प्राथमिकी दर्ज करायी गयी है. जिसमें पुलिस के सीनियर अफसर फंसेंगे.

छठा फैसला

सीआइडी के निर्देश पर राज्यसभा चुनाव-2016 में हॉर्स ट्रेडिंग को लेकर भी नये सिरे से जांच शुरु की गयी है. चुनाव आयोग के निर्देश पर जो प्राथमिकी दर्ज की गयी थी, उसमें पीसी एक्ट नहीं लगाया गया था. अब पीसी एक्ट के तहत जांच शुरु की गयी है. इस मामले में रघुवर दास, उनके प्रेस सलाहकार रहे अजय कुमार, एडीजी अनुराग गुप्ता समेत कई फंसे हुए हैं.

इस कदम से भी एक तबका परेशान है. उन्हें लग रहा है कि झारखंड पुलिस विपक्ष को निशाना बनाने के लिए मामले की नये सिरे से जांच कर रही है.

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