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हरियाणा चुनावः छोटे व क्षेत्रिय दलों को जनता क्यों दे वोट, जब चुनाव जीत कर वह भाजपा के साथ ही चले जाते हैं

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Faisal Anurag

क्षेत्रीय आकांक्षाओं और वैकल्पिक राजनीति का दंभ भरने वाले दलों को आखिर वोटरों को अपनी पहली पसंद क्यों बनाना चाहिए? अनुभव बताता है कि जिस तरह इन दलों का चुनाव के पहले ओर परिणाम के बाद रवैया उभरा है, वह लोकतंत्र और बदलाव के लिए बेहद घातक साबित हो रहा है.

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धारणा तो यह बन रही है कि वोट चाहे जिसे दो, सरकार तो भाजपा ही बना लेती है. या फिर देर-सबेर तख्तापलट कर देती है. आयाराम-गयाराम की राजनीतिक विरासत वाला हरियाण इसकी ताजा बानगी है.

गोवा और मणिपुर की याद इससे जीवंत हो उठी है. बिहार में तो जनादेश पलट जाने का नायाब इतिहास बना. 2014 के बाद के न्यू इंडिया का हर राजनीतिक ट्रेंड बिल्कुल नया है. मोदी ओर शाह ने मिल कर लोकतंत्र में ऐसी मिसाल पेश किया है जो लोकतंत्र के लिए ही घातक बनता जा रहा है.

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हरियाण की राजनीति जाट बनाम अन्य में बांट दी गयी है. इस बार के विधानसभा चुनाव में खट्टर सरकार को ले कर नारजगी साफ नजर आयी. भाजपा ने 75 का टारगेट तय किया था. लेकिन बहुमत के लिए भी उसे तरसना पड़ा.

भाजपा ने सरकार बनाने के मैनेजमेंट में बेहद दक्षता हासिल कर लिया है. इसमें उसके लिए विचार ओर नैतिकता के सवाल ही नही. जम्मू व कश्मीर में भाजपा का पीडीपी जैसे विपरीत ध्रुव से तालमेल ने दिखाया था कि वह सरकार बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकी है.

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अटल बिहारी बाजपेयी ने भी 13 दिनों की सरकार बनाने का जो उदाहरण पेश किया था, उसमें भी तमाम विपरीत धाराओं के साथ लाने का प्रयास किया गया था. इससे भाजपा को सरकार बनाने की भूख पैदा हुई और वह अनेक क्षेत्रीय दलों को अपने साथ लाने में कामयाब हुई.

बाद में एनडीए बना ओर भारत की राजनीति में भाजपा एक स्थायी सत्ता का दावेदार बन गयी. मोदी और शाह ने इस प्रवृति को और तेवर दिया. और अब उसकी महत्वकांक्षा देश की इकलौती सत्ता की दावेदारी की है. केंद्र और राज्यों का नियंत्रण भाजपा हर हालत में अपने हाथ में रखना  चाहती है.

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भाजपा ने ऐसे हालात पैदा कर दिये हैं कि छोटे ओर क्षेत्रीय दलों को उसके साथ आने के सिवा कोई चारा नहीं बचे. इसके लिए हर हथकंडे को अंजाम दने की प्रवृति हावी है. भाजपा जिसे अपने साथ नहीं ला पायी है उनकी साख पर लगातार हमले कर रही है.

दिल्ली की आम आदमी पार्टी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. महाराष्ट्र में भी शरद पवार को साधने के लिए हर तरह का प्रयास जारी है. दक्षिण में भी भाजपा ऐसा का प्रयोग करने में लगी हुई है. 2014 के पहले तक अनेक क्षेत्रीय दल भाजपा के साथ तीन बड़ी शर्तों के साथ ही सहयोग करते थे.

और एनडीए के घोषणपत्र से भाजपा बंधी भी रहती थी. इन में विवाद के वे मुद्दे शामिल थे जो गैर  भाजपाई दलों की सेकुलर छवि के लिए जरूरी समझे जाते थे. इसमें धारा 370 का भी मामला था. भाजपा ने इसे खत्म कर एनडीए के नए चेहरे को सामने किया है.

नीतीश कुमार जैसे लोग भी इस सवाल पर अपना विरोध दर्ज नहीं करा पाये. इससे साफ जाहिर है कि भाजपा सहयोगियों को अपनी शर्तो पर रजामंद करती है. 2014 की दिल्ली विधानसभा चुनाव की करारी हार को भाजपा अब भी नहीं भूल पायी है.

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की किलेबंदी को तो वह नहीं तोड़ पायी. लेकिन बिहार में उसने 2015 की हार के जनादेश को पलट दिया. नीतीश कुमार का भाजपा के समक्ष आतमसमर्पण क्षेत्रीय दलों और आकांक्षाओं पर तुषरापात था.

हरियाणा में दुष्यंत चैटाला के उभार को ताजी हवा की तरह महससू किया जा रहा था. लेकिन जेल में बंद दुष्यंत के दादा ओर पिता का हथियार इस्तेमाल कर भाजपा ने दुष्यंत को अपने साथ ले लिया. एवज में उनके पिता को फरलो पर छोडा गया है. अभी तो 15 दिनों का ही फरलो दिया गया है. लेकिन उसे और बढ़ाये जाने की संभावना है.

भारत के इतिहास की यह भी एक नायाब घटना है. इसके पहले इस तरह जेल और सत्ता का रिश्ता राजनीति में देखने को नहीं मिला है. अदलतों की स्वतंत्रता भी इससे प्रभावित हुई है. इससे देश के तमाम संवैधानिक संथाओं के पतन की चर्चा तो आम है. लेकिन कई संथाओं का आत्मसम्मान बेहद चिंताजनक है.

दुष्यंत ने भी भाजपा के विरोध में प्रचार अभियान चलाया. और उसका हिस्सा बन गये. उन्होंने जाटों की खट्टर से नाराजगी को ही महत्व नहीं दिया. भाजपा को हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव की तुलना में मिले 20 प्रतिशत कम वोट को भी इसने पलट दिया. बिहार में नीतीश का पालाबदल तो आयाराम- गयाराम की परिघटना से भी ज्यादा गंभीर है.

लेकिन भारत की राजनीति में इस तरह का पालाबदल अब कोई चैंकाने वाली बात नहीं रह गयी है.

एक औरत को सुसाइड के लिए बाध्य काने के आरोपी गोपाल कांडाओं के महत्व को भाजपा ने जिस तरह स्वीकृति दी है, वह राजनीतति में तमाम नैतिकताओं और मान्यताओं को हाशिये में धकेल दे रहा है. चाल, चरित्र और चेहरे से अलग दिखने का दावा करने वाली भाजपा अपने इस जुमले को तो भूल ही गयी है.

क्षेत्रीय आकांक्षाओं का दम भरने वाले दलों के सत्तापेक्षी आचरण ने इस सवाल को बेहद संजीदा कर दिया है कि जनता आखिर उसे ही क्यों वोट दे. जबकि वे अपने वोट का सौदा उस दल से करने में नहीं हिचकते हैं, जिसके खिलाफ हाने का दावा करते हुए उसके जूनियर सहयोगी बन जा रहे हैं. बहुदलीय लोकतंत्र का यह बेहद त्रासद पहलू है. साख का संकट वोटरों के लिए एक बड़ी चेतावनी है.

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