न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

हत्यारा और तानाशाह शीर्षक पर हरिओम राजोरिया की तीन कविताएं

1,516

हत्यारा और तानाशाह शीर्षकों से हिन्दी में वर्षों से कवितायें लिखी जा रही हैं. जिस तरह तानाशाह बदल रहा है उसी तरह इन कविताओं में भी बदलाव आ रहा है. दुख ये है कि आज तानाशाह और हत्यारे पर कविता लिखने की ज़रूरत और ज़्यादा बढ़ गयी है. ऐसे ही परिदृश्य में यहां इस शीर्षक से हरिओम राजोरिया की तीन कविताएं प्रस्तुत हैं.

हरिओम राजोरिया

 

हत्यारा – एक

 

हत्यारे को तो अब याद भी नहीं

कि कभी वह हुआ करता था हत्यारा

सारे सबूत मिटाए जा चुके हैं

रास्ते के कांटे हटाये जा चुके हैं

हत्यारे के निजी दस्तावेजों में हत्यारा

एक निर्दोष और सम्मानित नागरिक है

 

भले ही सहज मनुष्य होने का

स्वांग कर रहा हो हत्यारा

पर अंततः है तो वह एक चालाक हत्यारा ही

आदतें और स्वभाव तो हत्यारों के से ही हैं

वह अपने भीतर दुबके

हत्यारे को चालाकी से छुपाता है

इस प्रक्रिया के चलते  हत्यारा

एक अभिनेता में रूपांतरित हो जाता है

अब वह जोरदार अट्टहास करता है

हाथ मिलाता है, फोटो खिंचवाता है

अकेला कहीं कुर्सी पर बैठा-बैठा

ईश्वरीय आभा से ओतप्रेत

भगवान के कैलेंडरों जैसा

मंद-मंद मुस्काता है

 

हत्यारे की दाढ़ी में फंसा है एक तिनका

जो ताकतवर और तिकड़मी होने के बावजूद

भीतर ही भीतर उसे डराता है

अकसर अकेले में

हत्यारा मन ही मन बड़बड़ाता है

अतीत और इतिहास को झूठा बतलाता है

होने को हुआ करे बहुत बड़ा बक्काड़

पर झूठ बोले बग़ैर

पूरा एक वाक्य नहीं बोल पाता है .

 

हत्यारा – 2

 

अखबारों में खबर शाया हुई

कि जैसे ही हत्यारे को जमानत मिली

हत्यारे ने जेल से ही घोषणा करी

कि अब वह कविताएं करेगा

और आपनी राष्ट्रीय भावनाओं को

शब्दों में पिरोकर धर्मप्रेमी बंधुओं तक पहुंचाएगा

 

हत्यारे ने कहा कि जब आप राष्ट्रहित में

किसी का वध कर देते हैं

और इस कार्यवाही में

हत्या और आपके बीच में कहीं राष्ट्र आता है

तो फिर यह हत्या नहीं

WH MART 1

आपके लिए गौरव का विषय हो जाता है

 

हालांकि इन सब कामों में

धैर्य , साहस और लायकी की ज़रूरत होती है

हत्यारे के इन विचारों से प्रेरित होकर

एक काबीना मंत्री ने

हत्यारे का माल्यार्पण कर स्वागत किया

माता – बहिनों ने हत्यारे का तिलक कर

आरती उतारी

खूब  जयकारा हुआ हत्यारे का

 

इन्हीं भावुक क्षणों के दरम्यान

अर्ध शिक्षित हत्यारे के मन में

कविता करने का ख्याल आया

 

हत्यारा – 3

 

अजीब दौर आया है

दंगाइयों और हत्यारों को

समाज में ऊँचा स्थान हासिल हो गया है

 

पद , पदवियां , पुरस्कार , टिकट , धन , वैभव

सब उनके सामने छोटे हैं

वे जहां चाहें जिस कुर्सी पर बैठ सकते हैं

आप नहीं समझ रहे

आपकी इसी नासमझी के चलते

वे आज यहाँ तक पहुंचे हैं

हत्यारों का गौरवगान हो रहा है

कोई युगपुरुष कह रहा है

कोई मक्कारियों और झूठ को

कर रहा है महिमामंडित

 

आज हर आदमी के हिस्से में एक देवता है

हर जाति के ठेके बांटे जा चुके हैं

ठेके से जुलूस निकल रहे हैं

निकल रही हैं चुनरी और कांबड यात्राएँ

ठेका देकर लड़ाया जा रहा है नागरिकों को

लोग अकारण हुंकारें भर रहे हैं

घृणा सिखाने की कक्षाएं चल रही हैं

आरोपित औपचारिकताओं में

नागरिक दीक्षित हो रहे हैं

ईश्वर तक का चरित्र बदला जा रहा है

मनुष्य को क्रूर और हिंसक बनाने के लिए

नई-नई संहिताएं तैयार हो रही हैं

 

हत्यारा दिन-रात काम कर रहा है

नया सहज ज्ञान

नया इंसान

नया देश बन रहा है

श्रम के गौरव का लोप हो रहा है..

 

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

kohinoor_add

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like