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गुमला मॉब लिंचिंगः पुलिस चाहती तो बच सकती थी प्रकाश लकड़ा की जान, देखें वीडियो

गुमला के डुमरी प्रखंड में 14 दिन पहले  मॉब लिंचिंग की हुई थी घटना

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Pravin kumar

Ranchi/Gumla: गुमला के डुमरी प्रखंड में हुई मॉब लिंचिंग की घटना को पुलिस की निष्क्रयता माना जा रहा है. वहां के लोगों के अनुसार पुलिस को घटना की सूचना पहले ही मिल चुकी थी.

वहां अब भी इस घटना को लेकर मातम का माहौल है. घटना के 14 दिन के बाद भी पूरे गांव में भय का माहौल है.

भय ऐसा कि लोगों के बीच संवादहीनता की स्थिति बन गयी है. पुलिस के रवैये से पीड़ितों के परिजनों के बीच आक्रोश है.

सवाल यह भी उठने लगा है कि पुलिस किसी के दबाव में आरोपियों को बचाना चाहती है. यह संदेह इसलिए भी उत्पन्न हो रहा है कि पुलिस ने पीड़ितों का बयान 14 दिन गुजर जाने के बाद भी दर्ज नहीं किया है.

ग्रामीणों के अनुसार पुलिस अगर चहती तो प्रकाश लकड़ा की जान बच सकती थी. वजह यह थी कि घटना की सूचना डुमरी थाना को रात्रि के 10 बजे से पहले ही मिल चुकी थी. जबकि घटना शाम के सात बजे करीब घटी थी. वहीं थाने में मौजूद पुलिसकर्मियों ने कहा था कि हम घटनास्थल पर नहीं जायेंगे.

इसी स्थान पर ग्रामीणों को पीटा गया.

पुलिस को यह भी पता नहीं कि घायल लोगों का ईलाज कहां हो रहा है. ग्रामीणों का आरोप है 14 दिनों में घटना से जुड़े तथ्यों व साक्ष्यों को बदला जा रहा है.

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क्या है पूरा मामला

10 अप्रैल 2019 को झारखंड में गुमला के डुमरी ब्लॉक के जुरमु गांव के रहने वाले 50 वर्षीय आदिवासी प्रकाश लकड़ा को कथित गौहत्या के शक में पड़ोसी जैरागी गांव के लोगों की भीड़ ने पीट-पीट कर मार दिया.

डुमरी थाना को प्रतिबंधित पशु को काटे जाने की सूचना देने के बाद भी पुलिस घटना स्थाल पर नही पहुची. वहीं जैरागी के ग्रामीणों को थाने से कहा जाता है कि आप लोग ही थाना पहुचा दो.

इसके लिए जैरागी में खड़ी बस का प्रयोग किया जाता है और भीड़ द्वारा रात के करीब 11 बजे पुलिस के कहे अनुसार थाने से बहार झोंपड़ी में जख्मी लोगो को छोड़ा जाता है. और फिर भीड़ उसी बस से जैरागी लौट जाती है.

समय से उपचार नहीं होने के कारण प्रकाश लकड़ा (50) की मौत हो गयी. प्रकाश लकड़ा की मौत अस्पातल पहुंचने के पहले हो जाती है. भीड़ के हमले से घायल तीन अन्य पीड़ित-

पीटर केरकेट्टा, बेलारियस मिंज और जेनेरियस मिंज- गंभीर रूप से घायल हैं. इनको उपचार के लिए रांची के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में भेजा जाता है. लेकिन सही उपचार नही होने के कारण घायल अपना खुद अपचार करा रहे है. तीनों घायल अब भी दहशत में हैं.

भीड़ द्वारा जय श्री राम और जय बजरंग बली के नारे लगाये जा रहे थे. और पीड़ितों से भी ज़बरदस्ती नारे लगवाये जा रहे थे.

अगर वे नारे लगाने से मना कर रहे थे अथवा ज़ोर से नारा नहीं लगा रहे थे, तो उन्हें और अधिक पीटा जा रहा था. पीड़ितों द्वारा नामित सात आरोपियों में से केवल दो को ही अब तक गिरफ्तार किया जा सका है.

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क्या कहते हैं बैल के मालिक और ग्रामीण

बैल मालिक अदियस कुजूर कहते हैं, मैं अपने बैल को तलाश रहा था. इस क्रम में नदी के किनारे हमें अपना बूढ़ा बैल मारा हुआ मिला.

जिसकी सूचना गांव में आकर लोगों को दी. वहीं जुरमू के आदिवासियों के अनुसार, अन्य समुदायों के लोग नियमित रूप से उन्हें मृत पशु को ले जाने के लिए कहते रहे हैं.

इस घटना से पहले गांव के विभिन्न समुदायों के बीच पशु मांस को खाने पर कभी विवाद नहीं हुआ.

यह इलाके में इस तरह की पहली घटना है. गांव में 106 उरांव परिवार, 10 से 15 चीक बड़ाईक, 7 घासी परिवार, 12 खिरवार परिवार, एक परिवार बनिया और 2 मुस्लिम परिवार रहते हैं.

घटना के बारे में क्या कहते है जैरागी के गंगा साहू

बुजुर्ग गंगा साहू कहते हैं कि घटना के संबंध में हम लोगों को कोई जानकारी नहीं. हमारे गोतिया में एक बुजुर्ग की मौत होने का भोज 10 तारीख को जैरागी में था.

जब हमलोग भोज से लौट कर घर लौट गये तो गांव के साहू टोला का रात में दरवाजा खटखटाया जाता है. और कहा जाता है हर घर से एक एक आदमी निकलो. इस घटना से पहले इलाके में किसी समुदाय के बीच में किसी तरह का तनाव नहीं था.

सभी जाति धर्म के लोग आपस में मिल जुल कर रहते थे और सभी के बीच में व्यापारिक संबंध भी मजबूत था.

हिरासत में लिये गये संजय साहू के परिजन क्या कहते हैं

घटना के संबंध में गिरफ्तार संजय साहू के परिजन कहते हैं कि मेरे पिता को पुलिस ने फंसाने का काम किया है. मेरे पिता भाजपा से जुड़े हैं जिसके कारण इलाके में उनका नाम है.

पुलिस ने सुबह हस्ताक्षर करने के लिए थाना बुलाया और फिर जेल भेज दिया. घटना के बारे में पूछने पर संजय साहू के परिजन ने कहा कि घटना की रात संजय साहू घर में देर रात आये थे.

गांव में दसमा का भोज चल रहा था. गांव के कुछ लोगों ने भोज में सूचना दी कि नदी के किनारे प्रतिबंधित पशु को छठ घाट के पास काटा जा रहा है. फिर इसकी सूचना डुमरी थाने को दी गयी.

पुलिस ने कहा, हम घटना स्थल पर नहीं पहुंचेंगे. आप लोग ही समझ लो. परिजनों ने आगे कहा कि जुरमू गांव के लोग मांस बंटवारे को लेकर आपस में लड़ाई में ही सभी लोग घायल हुए.

पुलिस के कहे अनुसार सभी लोगों को थाना के समीप में रात के 11:00 बजे से पहले पहुंचा दिया गया था. अगर समय से उपचार किया जाता तो किसी की जान नहीं जाती.

मॉब लिंचिग की घटना पर पुलिस की भूमिका पर बड़े सवाल

घटना की सूचना मिलने के बाद भी पुलिस घटना स्थल पर क्यों नहीं पहुंची.

किसने पुलिस को घटना की सूचना दी थी और किस पुलिस अधिकारी ने कहा कि सभी को थाने के 150 मीटर दूर झोंपड़ी में छोड़ो.

जिस वाहन से भीड़ चार लोगो को मारते-पीटते धर्म विशेष का नारा लगवाते हुए थाने तक लायी, उस वाहन (बस) का प्रयोग भीड़ ने किसने कहने पर किया.

भीड़ ने 11:00 बजे से पहले घायलों को डुमरी थाना के करीब पहुंचा दिया था, इसके बावजूद पुलिस ने घायलो का उपचार क्यों नहीं कराया.

घटना की जांच कर रहे अधिकारी 13 दिन बीतने के बाद भी पीड़ितों का बयान क्यों नहीं दर्ज कर पाये.

घटना में शामिल नामजद अभियुक्तों को अब तक क्यों नहीं गिरफ्तार किया गया.

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