Opinion

गुजरात मॉडल बनाम दिल्ली मॉडल: बिहार और बंगाल के चुनावों में कौन रहेगा हावी- दिखने लगा है

Faisal Anurag

50 प्रतिशत से ज्यादा वोट और 70 में 60 से ज्यादा सीटों पर आम आदमी पार्टी को मिली जीत के बाद राजनीतिक हलकों में दिल्ली मॉडल की खूब चर्चा हो रही है. दिल्ली मॉडल नरेटिव दिल्ली के बाहर कितना असर पैदा करेगा, इसे लेकर अनुमान लगाये जा रहे हैं.

बंगाल में ममता बनर्जी और झारखंड में हेमंत सोरेन इस मॉडल को अपनाने की बात कर रहे हैं. गुजरात और बिहार मॉडल भी राजनीतिक चर्चा का विषय रहा है.  नरेंद्र मोदी तो गुजरात मॉडल की कामयाबी का प्रचार कर केंद्र की सत्ता तक पहुंच गये.

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यह दूसरी बात है कि अब गुजरात मॉडल की असलियत सामने आ गयी है. गुजरात मॉडल वास्तव में किसान और गरीब के पक्ष के बजाय पूंजीनिवेश के लिए सख्त शासन की छवि है. और गुजरात इस प्रचार के शोर के बावजूद शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबी उन्मूलन के मामले में कोई खास उपलब्धि हासिल नहीं कर पाया. गुजरात में तो दलितों और आदिवासियों की परेशानी और सामाजिक उत्पीड़न इस शोर में खूब बढ़ा.

नीतीश कुमार के बिहास मॉडल और सुशासन पर अब कोई बिहार निवासी सकारात्म्क रुख नहीं रखता है. सामाजिक तौर पर बिहार की जड़ता पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है, जो लालू प्रसाद के शासन काल में  टूट रही थी. और बिहार का सामाजिक समीकरण करवट ले रहा था. लेकिन पिछले 15 सालों के बिहार मॉडल की हकीकत यह है कि बिहार में वर्चस्ववादी ताकतों को बढ़ावा मिला है.

दिल्ली के एक सरकारी स्कूल की तस्वीर.

इन दोनों मॉडल से बिल्कुल अलग दिल्ली मॉडल है. देश की राजधानी का कॉस्मोपोलिटन चरित्र उसे विशेष बनाता है. केजरीवाल का दिल्ली मॉडल राज्य की जिम्मेदारियों और लोक कल्याण के राज्य के दायित्व को जमीन पर उतारने का प्रयास है.

केरल ने एक समय शिक्षा, स्वस्थ्य और पंचायतों के मामले में एक बड़ी लकीर खींची थी. कमोबेश दिल्ली उसे एक नया आयाम दे रहा है. पिछले कुछ सालों से अनेक राज्य तेजी के साथ नागरिकों के कल्याण के दायित्व से भाग रहे हैं और निजीकरण की आंधी चल रही है. ऐसे दौर में दिल्ली ने एक अलग रास्ता अपना कर संविधान की प्रतिबद्धताओं के प्रति कदम बढ़ाया है.

जिस तेजी से मोदी सरकार सार्वजनिक क्षेत्रों को निजी हाथों में बेच रही है. और उच्च शिक्षा को ले कर उसकी योजनाओं ने देश  में संदेह का माहौल बढ़ाया है. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बजट में कमी और जिस यूनिवर्सिर्टी में कोई कैंपस तक नहीं है, उनको इमिननेंस की संज्ञा देना कई सवाल खड़े कर रहा है. जेएनयू की फीस बढ़ायी जा रही है और जिओ एक हजार करोड़ दिया गया है.

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यह बताता है कि केजरीवाल स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में जो प्रयाग कर रहे हैं वह केंद्र के शिक्षा इरादों को चुनौती देता है. यही कारण है कि चुनाव के समय जिस तरह भाजपा के सांसदों ने फर्जी फोटो शेयर कर केजरीवाल का मजाक उड़ाया, उसे दिल्ली के वोटरों ने खारिज कर दिया. दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बहुत कुछ किया जाना शेष है. लेकिन केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने जो प्रयोग किया है, वह पूरे भारत में नायाब है.

यही कारण है कि बंगाल और झारखंड अब दिल्ली की राह चलने का बात कर रहे हैं. मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही हेमंत सोरेन केजरीवाल से मुलाकात कर दिल्ली मॉडल को अपनाने का का संकेत दे चुके हैं. बिहार और झारखंड सहित अधिकांश हिंदी राज्यों की स्कूली शिक्षा खराब है.

और बच्चों से उनकी शिक्षा हासिल करने का हक छीना जा रहा है. यहां तक कि शिक्षा अधिकार कानून का खुला उल्लंघन इन राज्यों में हो रहा है. जिस तरह प्राथमिक स्कूलों के मर्जर को अंजाम दिया गया है, वह बताता है कि राज्य अपने ही नागरिक के बच्चों को शिक्षा देने में अरुचि दिखा रहा है.

भारत की राजनीति में गुजरात मॉडल की नकल किसी भी राज्य ने नहीं की. और न ही बिहार मॉडल का. इसका एक बड़ा कारण इन दोनों की सामाजिक प्रतिबद्धता भी रही है. दिल्ली मॉडल इससे भिन्न है जो लोगों को राहत देने और बेहतर नागरिक बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है.

केजरीवाल ने कई राजनीतिक दलों के भीतर यह आकांक्षा तो पैदा कर ही दी है कि दिल्ली मॉडल वह सूत्र है जिसकी दीवार में भारतीय जनता पार्टी का एजेंडा कोई दरार नहीं डाल पाया है. यही कारण है कि भाजपा के उकसावे के तमाम प्रयासों के बावजूद  केजरीवाल ने अपनी पिच पर ही खेला. और उस पिच का मिजाज भाजपा की राजनीति के लिए अबूझ पहेली बनी रही.

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