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ग्रामसभा ने सीएम से की शिकायत- वन विभाग नहीं दे रहा सामुदायिक वन पट्टा

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  • ग्रामसभा ने लगाया आरोप- राज्य में वन अधिकार कानून 2006 की धज्जियां उड़ा रहे वन विभाग के अधिकारी

Pravin Kumar

Ranchi : जिस भूमि से आदिवासी समुदाय की आजीविका चल रही है, वैसी भूमि और वन क्षेत्र पर उन्हें व्यक्तिगत एवं समुदाय पट्टा देने का प्रावधान वन अधिकार कानून 2006 में किया गया है. लेकिन, राज्य के सरायकेला-खरसावां जिला के कुचाई प्रखंड की ग्रामसभा की सामुदायिक वन पट्टा की मांग को वन विभाग की ओर से खारिज कर दिया गया. वन विभाग के अधिकारी द्वारा ग्रामसभा को सामुदायिक पट्टा देने से इनकार करने पर ग्रामसभा प्रखंड की 13 ग्रामसभाओं ने मुख्यमंत्री रघुवार दास, नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन और  खरसावां विधायक से शिकायत की है. ग्रामसभा की ओर से मांग की गयी है कि सरायकेला के वन प्रमंडल पदाधिकारी नूर आलम अंसारी द्वारा विधि के विरुद्ध प्रतिवेदन देकर वन अधिकार कानून 2006 की धज्जियां उड़ाने के मामले की जांच कर उचित कार्रवाई की जाये. बता दें कि मुख्यमंत्री से शिकायत के दो महीने बीतने के बाद भी ग्रामसभा को सामुदायिक वन पट्टा नहीं मिला है.

वन विभाग ने खारिज कर दिया दावा पत्र

वन अधिकार कानून 2006 के प्रावधान के आलोक में कुचाई प्रखंड के जोवा जंगीर, भुरकुंडा, कारलोर, कुंडिया, रेनसा, दुगीडीह, तिलोपदा, बाईडीह, दुखियाडीह, डागो, लेपसो ग्रामसभा की ओर से 2013 से ही सामुदायिक पट्टा की मांग कानून के तहत की जार ही है. आवेदन ग्रामसभा के अनुमोदन के बाद 2016 तक दिये जाते रहे हैं. सरायकेला-खरसावां जिला के कुचाई प्रखंड की 17 ग्रामसभाओं की ओर से सामुदायिक वन संसाधनों के उपयोग और संरक्षण एवं प्रबंधन के अधिकार के लिए दावा पत्र वन विभाग में जमा किया गया था. उस दावा पत्र को वन विभाग की ओर से खारिज कर दिया गया.

इन ग्रामसभाओं ने किया है दावा

ग्रामसभा कितनी भूमि
डागो ग्रामसभा 476.15 एकड़
भुरकुंडा ग्रामसभा 849.10 एकड़
करालोर ग्रामसभा 34.15 एकड़
कुंडिया ग्रामसभा 495.95 एकड़
रेनसा ग्रामसभा 273.72 एकड़
दुगीडीह ग्रामसभा 163.18 एकड़
तिलोपदा ग्रामसभा 83.67 एकड़
बाईडीह ग्रामसभा 138.69 एकड़
दुखियाडीह ग्रामसभा 190.83 एकड़
लेपसो ग्रामसभा 306.97 एकड़

ग्रामसभा के दावे पर क्या हुई थी कार्रवाई

वर्ष 2013 से 2016 के बीच 17 ग्रामसभों ने सामुदायिक वन संसाधनों का उपयोग और संरक्षण एवं प्रबंधन का अधिकार के लिए दावा पत्र भरकर अनुमंडलस्तरीय वन अधिकार समिति सरायकेला-खरसावां के पास जमा किया था. उसके बाद सरायकेला अनुमंडल स्तर पर वन अधिकार समिति ने इसे अनुशंसा करके जिलास्तरीय वन अधिकार समिति को भेजा, जिसके अध्यक्ष उपायुक्त हैं. इस जिलास्तरीय वन अधिकार समिति की बैठक में 13 ग्रामसभाओं के दावा पत्र को सवीकृति प्रदान किये जाने के बाद वन प्रमंडल पदाधिकारी सरायकेला नूर आलम अंसारी ने ग्रामसभा के दावों पर हस्ताक्षर नहीं किये.

क्या दलील दी वन प्रमंडल पदाधिकारी ने

सरायकेला वन प्रमंडल पदाधिकारी ने दावे को अस्वीकार करने को लेकर अक्टूबर 2018 को लिखे पत्र में कहा है कि समुदाय वन संसाधनों से संबंधित प्रबंधन एवं संरक्षण संबंधी वन अधिकार कानून अधिसूचना सुरक्षित वन भूमि में लागू नहीं होती है. उक्त वन क्षेत्र की सुरक्षा एवं प्रबंधन वन विभाग द्वारा किया जाता रहा है. ऐसे में ग्रामसभा के दावे को सवीकार नहीं किया जा सकता.

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क्या हो रहा है राज्य में वन अधिकार के दावे को लेकर

झारखंड की बात करें, तो आदिवासियों के आर्थिक जीवन का आधार जल, जंगल और जमीन हैं. दशकों से आदिवासियों के पारंपरिक वनाधिकार का व्यवस्थित रूप से उल्लंघन किया जा रहा था. वन अधिकार कानून 2006 को पास करते हुए केंद्र सरकार ने कहा था कि आदिवासियों या पारंपरिक रूप से जंगलों में निवास करनेवालों के प्रति किये गये ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार किया गया. इस ऐतिहासिक अन्याय को ठीक करने के लिए वनाधिकार कानून को अधिनियमित किया गया तथा जंगल में निवास करनेवाले प्रत्येक परिवार को चार एकड़ भूमि इस कानून द्वारा देने का वचन दिया गया था. राज्य में किसी भी आदिवासी परिवार को चार एकड़ भूमि 2013 से लेकर 2018 की समयावधि में नहीं दी गयी. जबकि, ग्रामसभा के अनुमोदन के बाद भी अनुमंडल स्तर पर व्यक्तिगत और सामुदायिक पट्टा देने में कोताही बरती जाती है. कल्याण विभाग के आंकड़े के अनुसार पिछले एक साल में सिर्फ लोहरदगा जिला में ही दावे सवीकृत किये गये.

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