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आर्थिक कार्यों के नाम पर पर्यावरणीय ढांचे को कमजोर कर रही सरकार: रिपोर्ट

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  • सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की कोविड संकट और भारत में वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लक्ष्यों पर रिपोर्ट जारी

New Delhi: सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च द्वारा ‘भारत में कोविड संकट के दौरान स्वच्छ वायु का एजेंडा’ के नाम से नयी रिपोर्ट जारी की गयी है. रिपोर्ट में पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को कमजोर करने के बजाय संरक्षण की जरूरत पर भी चितंन किया गया है क्योंकि सरकार कोविड संकट की वजह से आर्थिक पुनर्प्राप्ति के लिए लंबा समय लेने वाली है. निर्णायक देरियों जैसे साल 2015 में जारी बिजली संयंत्र उत्सर्जन के मानदंडों का पालन नही करने से पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन भी किया गया है.

सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड और सीपीआर की फेलो शिबानी घोष ने कहा, “लॉकडाउन के बाद आर्थिक कार्यों में तेजी लाने के नाम पर सरकार पर्यावरणीय नियामक ढांचे को कमजोर नहीं कर सकती, पर्यावरणीय नियमन जैसे अधिसूचना और पर्यावरणीय सुरक्षा नियम, महत्वपूर्ण उत्सर्जकों जैसे कल-कारखानों और बिजली संयंत्रों से होने वाले प्रदूषण के नियमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

व्यापार में आसानी यानी ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के नाम पर इन नियमों को संकुचित किया जा रहा है. जो सीमित समय के लिये सार्वजनिक हित में लग सकता है, लेकिन यह ठीक उसी प्रकार की बात है जैसा कि निकट दृष्टि दोष से पीड़ित और सही तरह से समस्या को ना समझा जाने वाला रवैया होता है.

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राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन ने वायु प्रदूषण के स्तर को कम किया था

कोविड के बाद विभिन्न सेक्टरों में उत्सर्जन के स्तर को कम रखने के लिए नीतिगत एजेंडा का लाभ, सुरक्षात्मक उपायों के क्षय को रोकने और प्रभावी सांस्थानिक और वित्तीय सुधारों के लिए लगातार प्रयास किये जाने चाहिए.

सीपीआर के फेलो डाक्टर संतोष हरीश के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु योजना का पहला साल इसके सीमित कोष की वजह से परेशनी से गुजर रहा है. कोविड-19 संकट की वजह से हुई कोष की भारी कमी के बीच, नये वित्तीय आयोग द्वारा आवंटित कुल 4400 करोड़ रुपये से 42 लाख से अधिक शहरों को दिया गया है.

इस कोष के जरिये म्युनिसिपल इलकों में कार्य किया जाना है. उन कार्यों की प्रगति का रिकॉर्ड नागरिक समाज को रखना होगा.

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