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बुधनी की मौत को सामान्य बता सरकार ने झाड़ा पल्ला, हकीकत की न्यूज विंग ने की पड़ताल 

लातेहार में कई आदिम जनजाति परिवार भूख से मौत की कगार पर, नहीं मिल रहा सरकारी योजना का लाभ

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Pravin Kumar

Ranchi/Latehar: पहली जनवरी 2019 की रात महुआडांड़ गांव के अम्बाटोली (तेतर टोली) में रहने वाली 80 वर्षीय बुधनी बिरजिया की मौत हो गई.  मौत के बाद प्रशासन को सूचना मिलते ही शव का क्रिया-कर्म भी बिना किसी जांच के करा दिया गया. इसके लिए महुआडांड़ सीओ ने सरकारी मदद और गाड़ी भी परिजनों को उपलब्ध कराई. आदिम जनजाति की बुधनी देवी की भूख और ठंड से हुई मौत सामान्य मौत बनकर रह गयी.

सरकारी योजनाओं की पहुंच आदिम जनजाति परिवार तक है कि नहीं, इसकी भी जांच करना उचित नहीं समझ गया. जबकि आदिम जनजाति के लिए पेंशन से लेकर राशन तक देने का दावा रघुवर सरकार कर रही है. अगर समय रहते सरकार के प्रतिनिधि बुधनी बिरजिया के शेष बचे परिवारों के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाती है तो उनके परिवार में जो बच गए हैं, वो भी अपनी गरीबी व भुखमरी के कारण मृत्यु के करीब पहुंच जाएंगे.

क्या है बुधनी के परिवार की हकीकत

पिछले साल होली के समय बुधनी के बेटे रोपना बिरजिया की मौत हो गई थी. वो शारीरिक रूप से काफी कमजोर हो चुके थे. स्व0 रोपना बिरजिया की पत्नी सनकी बिरजिया हैं. फिर 2018 में ही दशहरे के समय बेटी सीता बिरजिया की भी मृत्यु हो गई थी. एक बेटी भगिया बिरजिया हैं, जिसकी दिमागी हालत अपने भाई की मौत के बाद से ही ठीक नहीं रहती है. बेटी सीता बिरजिया की मृत्यु के बाद से ही बुधनी, सनकी देवी के पास रह रही थी.

रोजगार के लिए बाहर कमाने गये परिवार के दो सदस्य लापता

आधार कार्ड के अनुसार, सनकी बिरजिया की उम्र 40 वर्ष है. उनका बैंक खाता भी है, किन्तु राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत उनका राशन कार्ड नहीं बना है. वह महुआडांड़ बाजार में लकड़ी वगैरह बेचकर गुजारा करती है. सनकी देवी के 2 बेटे और एक बेटी थे. दो वर्ष पूर्व उनका एक 20 वर्षीय बेटा सस्तु बिरजिया ईंट भट्ठे में कमाने के लिए बाहर गये थे. फिर वह उधर ही लापता हो गये उनकी बहन भी गई थी.वह वापस आई, लेकिन वहां दोनों अलग-अलग भट्ठों में काम कर रहे थे. इस कारण उसकी बहन को भी नहीं मालूम कि उसके भाई का क्या हुआ. अत्यंत गरीब परिवार होने के कारण परिवार के लोग भी ज्यादा खोजबीन नहीं कर पाये.

सरकारी योजना का नहीं मिला लाभ 

भूख से हुई मौत से पहले बुधनी बिरजिया एक दुर्घटना का शिकार हो गई थी. बरसात के समय पानी लाने के क्रम में फिसल जाने के कारण उनकी दाहिने पैर की हडडी टूट चुकी थी. गरीबी के कारण घर में ही निजी चिकित्सक से उनका इलाज परिवार वालों ने करवाया था. वह चलने-फिरने में भी असमर्थ थी. पैसे के अभाव के कारण कोई बेहतर इलाज नहीं हो पाया. विकलांगता शिविर में भी उनका विकलांगता प्रमाण पत्र नहीं बन पाया. चलने-फिरने में असमर्थ रहने के कारण उनका आधार कार्ड भी नहीं बन पाया था. जिसके कारण न उन्हें विकलांगता पेंशन,  न वृद्धावस्था पेंशन और न ही आदिम जनजाति पेंशन योजना का लाभ मिल पाया.

बुधनी की बेटी ने मौत से 10 दिन पहले दिया था पांच किलो चावल 

बुधनी की मृत्यु से 10 दिन पूर्व उनकी बेटी भगिया कुंअर ने अपनी मां के लिए 5-5 किलो चावल दो दिन पहुंचाया था. सनकी का दूसरा बेटा बसंत बिरजिया और उसकी पत्नी गुड्डी बिरजिया साथ में रहते हैं. सामान्य दिनों में भी बुधनी जिनके साथ रहती थी, उनके घर के सभी सदस्य सिर्फ चावल का भात बनाकर ही माड़-भात खाकर गुजारा करते थे.

नवजात भी कुपोषण का शिकार

सनकी बिरजिया की एक पोती अर्थात गुड्डी देवी की एक 2 माह की बेटी भी है. आंगनबाड़ी केन्द्र, दीपाटोली में उसका पंजीयन भी किया था. लेकिन विगत 6 माह से पोषाहार बन्द रहने के कारण वहां से भी किसी प्रकार का आहार नहीं मिल पा रहा था. बच्ची भी काफी कमजोर थी. उसका वजन महज 1.50 किलो था.

बुधनी की मौत के बाद पड़ोसियों ने घर में क्या देखा

बुधनी की मौत की सूचना दो दिन बाद समाने आई, जब नरेगा सहायता केन्द्र, महुआडांड़ के महिला कार्यकर्ता व अन्य लोग मृतक के घर गये. वहां उन्होंने देखा कि घर में सिर्फ एक खाना बनाने का एक बर्तन और एक थाली पड़ी थी. 3-4 दिनों से घर का चूल्हा भी नहीं जला था. मृतक के शरीर में सिर्फ एक कम्बल पड़ा हुआ था. नीचे 2-3 जूट के बोरे थे जिसपर शव पड़ा था. मृतक के घर के बगल में एक मुस्लिम विधवा परिवार रहता है. वह भी अपने इलाज के लिए रांची गया हुआ था. अक्सर वह बुधनी को अपने हिस्से में से खाना दे दिया करती थी.

मौत के बाद दो दिनों तक घर में पड़ा रहा शव 

महुआडांड़ और आसपास में किसी की मृत्यु हो जाने पर कब्र खोदवाने, कफन, बांस एवं सामुदायिक नेग मिटाने के न्यूनतम खर्च के पैसे बुधनी के पोता के पास नहीं थे. इसी सामाजिक डर से वह बुधनी के मरने की खबर किसी को बताने का साहस नहीं जुटा सका. 2 जनवरी की शाम को बसन्त की पत्नी गुड्डी देवी अपने 2 माह की बच्ची को लेकर दीपाटोली यह सोचकर चली गई कि कहीं बच्ची को कोई अपशगुन न लग जाए. तब बसन्त ने साहस जुटाकर बुधनी की बेटी भगिया कुंअर को मृत्यु की जानकारी दी. फिर 3 जनवरी की सुबह बगल में रहने वाले मुस्लिम परिवार की महिला ने भी बुधनी के मरने की खबर प्रेस से जुड़े लोगों को बताई.

अपना घर नहीं था बुधनी का, आज भी बेहाल है परिवार

बसन्त एवं भगिया बिरजिया दोनों परिवारों के लिए कोई अपना घर नहीं है और न ही जमीन है. नतीजतन सरकारी योजनाओं का लाभ भी सामान्यत: नहीं मिल पाता है. दिसंबर माह के अंतिम सप्ताह में अत्यधिक ठण्ढ बढ़ जाने के कारण दोनों किसी प्रकार की मेहनत मजदूरी भी नहीं कर पा रहे थे. घटना की सूचना स्थानीय प्रशासन को मिलने के बाद अंचलाधिकारी और थाना प्रभारी घटनास्थल पर पहुंचे और पीड़ित परिवार को 2000 रूपये नकद एवं 45 किलो अनाज मुहैया कराया गया है. दफन क्रिया के बाद बाकी सदस्यों को 3 कम्बल दिये गये है.

क्या कहते हैं सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज

सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज

भोजन का अधिकार अभियान से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज का कहना है कि आदिम जनजाति परिवार को सरकारी योजना का लातेहार जिला में लाभ नहीं मिल पा रहा है. कई परिवार भूख से मौत की कगार पर है. सरकार की घोषणा की हकीकत गांव में दिखती है. बुधनी की मौत के पूर्व इस परिवार को सरकार की ओर से किसी सदस्य को कम्बल नहीं मिला. परिवार की ओर से प्रशासन को मृत्य से पूर्व राशन कार्ड के लिए 3 बार एवं बाद में 1 बार आवेदन सौंपा गया है. लेकिन संवेदनहीन डीलर ने गैर जिम्मेदराना बयान देते हुए कहा कि कहां-कहां से लोग आते रहेंगे, तो क्या हम उनका राशन कार्ड ही बनवाते रहेंगे. खाद्य सुरक्षा कानून की धज्जियां उड़ाने के लिए ये बातें काफी हैं. महुआडांड़ प्रखंड में आदिम जनजाति परिवारों को डाकिया योजना के तहत पैकेट में खाद्यान्न नहीं मिलता है.

बुधनी की बहू सनकी देवी को पेंशन मिलता है. लेकिन उनका खाता ग्रामीण बैंक के महुआडांड़ शाखा में है. बैंक ने पैसे की निकासी के लिए मुखिया या ग्राम प्रधान हस्ताक्षर अनिर्वाय कर रखा है. जिसके कारण मृतक बुधनी की बहू (सनकी देवी) ने मौत से पूर्व भी काफी दिनों तक निकासी फॉर्म में हस्ताक्षर कराने के लिए मुखिया को खोजती रही. लेकिन उनसे नहीं मिल पाई. घटना प्रकाशित होने के बाद उसने अपने खाते से पेंशन के 1200 रूपये निकाले. वर्तमान में महुआडांड़ प्रखंड मुख्यालय में सरकार के स्तर से आधार कार्ड बनाने के कार्य बंद कर दिया गया है. निजी ऑपरेटरों के द्वारा 200 रूपये लेकर आधार कार्ड बनाया जा रहा है. यह राशि आम गरीब परिवारों के लिए काफी ज्यादा है.

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