Opinion

कोरोना व जांच किट के मामले में आंकड़ों में उलझाकर लोगों को बेवकूफ बना रही सरकार, जानिए सच को

Apurv Bhardwaj

टेस्टिंग के टोटे की क्रोनोलॉजी समझिये

सरकार टेस्टिंग को लेकर कितनी लापरवाह है और आपको कितना मूर्ख समझ रही है. वो आपको इस लेख को पूरा पढ़ने से पता चल जाएगा.

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लॉकडाउन के एक दिन बाद यानी 25 मार्च को टीवी और अखबार में खबर आय़ी कि सरकार ने देश में कोरोना मामलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए दक्षिण कोरियाई बायोटेक फर्म,  सीजेन द्वारा निर्मित फास्ट टेस्टिंग किट को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी), पुणे द्वारा मान्य किया गया है.

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सरकार ने नये टेस्टिंग किटों की अनुमति प्रक्रिया को भी तेज कर दिया है. जिन्हें अभी यूस (एफडीए) या ईयूए-सीई (यूरोपीय) द्वारा भी अनुमोदित नहीं किया गया है. और सरकार पुणे में फास्ट-ट्रैक से यह सब काम कर रही है. जिसमें 14 टेस्टिंग किटों का मूल्यांकन हो चुका है, जिसमें से तीन किटों ने 100% रिजल्ट दिये हैं और देशभर में सरकारी और ICMR से मान्य निजी लेब द्वारा उपयोग किया जा सकता है.

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30 मार्च को खबर आती है कि भारत खराब क्वालिटी के चलते चीन से टेस्टिंग किट का आयात नहीं करेगा और वो कोरिया और अन्य देशों से फास्ट टेस्टिंग किट्स आयात करेगा. लेकिन 12 अप्रैल को खबर आती है कि 5 लाख टेस्टिंग किट्स अमेरिका की और डायवर्ट हो गयी है.

और टेस्टिंग किट की भारी कीमत और डिलीवरी में देरी के चलते 14 अप्रैल को सरकार मेक इन इंडिया के तहत देश में ही इसका उत्पादन की अनुमति देती है. तो सबसे बड़ा सवाल क्या सरकार 1 महीने से सो रही थी.

आज (18 अप्रैल) खबर आती है, सरकार चीन से 6.5 लाख किट का आयात करने जा रही है, तो अब क्वॉलिटी वाले लॉजिक का क्या होगा. छत्तीसगढ़ सरकार ने केवल 337 रु प्लस GST  की दर से 75,000 किट्स का टेंडर पारित कर दिया है. तो फिर महंगी टेस्टिंग किट का लॉजिक कहां चला गया. ऐसा ही टेंडर तमिलनाडु सरकार ने भी किया है.

सुप्रीम कोर्ट पहले निजी लैब को जांच फ्री करने को बोलता है. फिर निजी लेब वाले 4000 रु. महंगी किट का हवाला और सरकार के रैम्बर्समेंट की बात कहकर अपील दायर कर देते हैं और सुप्रीम कोर्ट यह जांच केवल गरीबों को लिए फ्री कर देता है. सरकार तब भी चुप रहती है और अब भी टेस्टिंग को लेकर अपनी कोई स्पष्ट नीति की घोषणा नहीं करती है.

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वास्तव में भारत को तत्काल 44 लाख टेस्टिंग किट की आवश्यकता थी. सरकार यह बात शुरू से जानती थी. 21 मार्च से वो लाल फीताशाही में उलझी रही और टेस्टिंग की महत्वता जानते हुए भी घोर लापरवाही करती रही है. रोज नये-नये बहाने दिये जा रहे हैं. लेकिन टेस्टिंग को लेकर कोई रोडमैप क्यों नहीं दिया जा रहा है.

प्रधानमंत्री जब 219 टेस्टिंग सेंटर को लेकर अपनी सरकार की पीठ ठोक रहे हैं, तो उन्हें एक व्हाइट पेपर निकालना चाहिए ताकि टेस्टिंग को लेकर पूरा सच सामना आ जाये. टीवी औऱ अखबार यह सवाल सरकार से नहीं पूछेगी. वो आपको जमाती और मरकज में ही मूर्ख बनाती रहेगी. पर आप मूर्ख मत बनिये सरकार से सवाल पूछिये. क्या पता जैसे कुंभकर्ण जाग गया वैसे एक दिन सरकार भी जाग जाये. जागते रहो.

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डिसक्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं.

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