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सरकार ने 10 लाख कंबल बनवाकर बुनकरों को नहीं किया भुगतान

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  • 5000 बुनकरों को झारक्राफ्ट के माध्यम से मिला था काम
  • स्वयं सहायता समूहों के गोदाम में सड़ रहे हैं कंबल

Ranchi: 10 लाख कंबल बनवाकर बुनकरों को मजदूरी नहीं दी गयी है. बुनकर मजदूरी के लिए प्रतिदिन विभाग और कार्यालय का चक्कर लगा रहे हैं. राज्य भर से लगभग 5000 बुनकरों को झारक्राफ्ट के माध्यम से काम मिला था. इन मजदूरों द्वारा लगभग 10 लाख कंबलों की बुनाई करायी गयी थी. मजदूरों को प्रत्येक कंबल के बदले 55 रुपए की दर से मजदूरी दी जानी है. 10 लाख कंबल की बुनाई का भुगतान 5.5 करोड़ होता है. लेकिन अभी तक 30 प्रतिशत मजदूरी का ही भुगतान किया गया है. लगभग तीन करोड़ से भी ज्यादा राशि अब भी बकाया है. झारखंड बुनकर प्रतिनिध जुनैद आलम ने बताया कि कई महीनों से अपने हक का पैसा मांगने के लिए कार्यालयों का चक्कर काट रहे हैं. लेकिन उनकी फरियाद कोई नहीं सुन रहा. जिस कारण गरीब बुनकरों की स्थिति और भी ज्यादा बिगड़ती जा रही है. बुनकर भुखमरी, पलायन एवं बेरोजबारी का दंश पहले से झेल रहे हैं. विवश होकर मजदूरों ने भूख हड़ताल पर जाने का निर्णय लिया है.

तीन साल पहले कराया गया था काम 

जुनैद आलम ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2016-17 और 2017-18 में बुनाई का काम दिया गया था. इस दौरान लगभग 10 लाख कंबलों की बुनाई का काम मिला था. राज्य भर की अलग-अलग समितियों एवं समूहों द्वारा बुनाई का काम संपन्न किया गया. लेकिन भुगतान नहीं मिला. अब मजदूर मजबूर होकर भुख हड़ताल और आंदोलन करने की तैयारी में हैं. जुनैद आलम ने बताया कि यदि सभी बुनकरों का भुगतान 15 दिनों के अंदर नहीं किया गया तो 10 दिवसीय भुख हड़ताल की जायेगी. इस पर भी मांग पूरी नहीं हुई तो आत्मदह किया जायेगा.

होटवार जेल के कैदियों को भी नहीं मिला भुगतान

कंबल बुनाई के लिए राज्य सरकार ने अलग-अलग स्वयं सहायता समूहों और समितियों के लोगों को प्रशिक्षित किया था. होटवार जेल में रहने वाले कुछ कैदियों को भी इसका प्रशिक्षण दिया गया था. इन कैदियों से कंबल बुनाई का काम भी लिया गया लेकिन अब तक उनकी भी मजदूरी का भुगतान नहीं किया गया है.

गोदामों में पड़े-पड़े सड़ रहे हैं कंबल

झारखंड बुनकर प्रतिनिधि जुनैद आलम ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2018-19 में कंबल बुनाई के लिए सरकार की और से सभी बुनकरों को धागा उपलबध कराया गया था. जिसकी बुनाई कर बुनकरों ने कंबल भी तैयार कर दिया. लेकिन सरकार उन कंबलों को ले नहीं रही. बल्कि टेंडर कर बाहर से कंबल खरीदे जा रहे हैं. वहीं बुनकरों द्वारा बुने गये कंबल स्वयं सहायत समूहों के गोदामों में पड़े-पड़े सड़ रहे हैं. इनका कोई इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है.

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