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घोषणा कर भूल गयी सरकार-28 जुलाई : ना अपोलो खुला, ना फल-सब्जी वालों को अलग जगह मिली, ना विधि व्यवस्था व अनुसंधान अलग हुआ

Surjit Singh
झारखंड में बहुमत की सरकार है. सरकार के मुखिया को इसका गुमान भी है. अक्सर कहते हैं कि हमने हर क्षेत्र में बहुत काम किया. झारखंड में ‘सबका साथ और सबका विकास’ हो रहा है. नेता-अधिकारी घोषणा कर, आदेश देकर हमें सपने दिखा जाते हैं. काम हुआ या नहीं, यह पूछने वाला कोई नहीं. इसे परखने के लिए न्यूज विंग ने “घोषणा करके भूल गयी सरकार” नाम से एक सीरीज शुरु की है. आज हम सरकार के तीनों साल में 28 जुलाई को सरकार द्वारा किये गये वादों और दिये गये आदेशों-निर्देशों पर बात करेंगे.

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28 जुलाई 2015 को सरकार ने चार बड़ी घोषणाएं की थी. पहला यह कि कैबिनेट ने अपोलो अस्पताल को एक रुपया टोकन मनी पर रांची के घाघरा में 2.80 एकड़ जमीन देने की बात कही थी. अपोलो अस्पताल को 30 साल के लिए लीज पर जमीन देने का फैसला लिया गया था. तीन साल बीत गये हैं, अभी तक अपोलो अस्पताल नहीं बना.

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28 जुलाई 2015 की कैबिनेट में ही सरकार ने राज्य की कानून व्यवस्था और अपराध पर लगाम लगाने के लिए एक बड़ा फैसला लिया था. फैसला लिया गया था कि झारखंड में कानून-व्यवस्था और अनुसंधान के काम को अलग किया जायेगा. तब लगा था कि सरकार सचमुच इसे लेकर गंभीर है. देश के अन्य राज्यों की तरह झारखंड में भी कानून-व्यवस्था और अनुसंधान के काम के लिए अलग-अलग पुलिस होगी. इसका फायदा राज्य के लोगों को मिलेगा. कानून-व्यवस्था की स्थिति तो ठीक होगी ही, अनुसंधान का स्तर भी सुधरेगा. तब अपराधियों को सजा दिलाने में आसानी होगी.

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28 जुलाई 2015 को ही सरकार ने एक फैसला लिया था कि सीएस और डीजीपी को जेड प्लस स्तर की सुरक्षा दी जायेगी. इस फैसला को लागू करने में दोनों अधिकारियों के एक दिन की भी देरी नहीं की. तत्कालीन सीएस और डीजीपी डीके पांडेय को तुरंत ही जेड प्लस स्तर की सुरक्षा उपलब्ध करा दी गयी.

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28 जुलाई 2015 को ही मुख्यमंत्री रघुवर दास ने स्टेट लेवल स्टेयरिंग कमेटी की बैठक की थी. बैठक में उन्होंने राजधानी में फल-सब्जी विक्रेताओं के लिए स्थायी मार्केट बनाने का आदेश दिया था. अखबारों में जो इससे संबंधित खबर छपी थी, उसमें मुख्यमंत्री के हवाले से कहा गया था कि रांची शहर को आकर्षक स्वरुप देने के लिए इसे सुंदर और स्वच्छ बनाना जरुरी है. जब संकरी सड़कों वाले शहर लखनऊ को खूबसूरत बनाया जा सकता है, तो रांची को बढ़िया शहर बनाना काफी आसान काम होना चाहिए. इसलिए अधिकारी निष्पक्ष भाव से शहर को विकसित करने में जुटे, तो यह काम मुश्किल नहीं होगा. इस आदेश के तीन साल बाद भी शहर की जो स्थिति है, वह यही साबित करता है कि अधिकारियों ने निष्पक्ष भाव से काम नहीं किया. और राज्य के मुखिया अधिकारियों से काम कराने में विफल रहें.

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