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सरकार का उपायुक्तों को निर्देश : कैडेस्ट्रल सर्वे और रिविजनल सर्वे के नहीं रहने पर कंपनियों से शपथपत्र लेकर फोरेस्ट क्लियरेंस का आवेदन बढ़ायें

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  • सरकार का मानना है कि कई जिलों में 25 अक्टूबर 1980 के पूर्व के रिकॉर्ड नहीं मिलने से हो रही हैं दिक्कतें
  • 25 अक्टूबर 1980 के बाद प्रकाशित सर्वे को आधार बनाने का उपायुक्तों को निर्देश
  • केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय के सचिव सीके मिश्रा ने लिखा मुख्य सचिव को पत्र

Ranchi : झारखंड सरकार ने कैडेस्ट्रल सर्वे (सीएस) और रिविजनल सर्वे (आरएस) के नहीं रहने पर 25 अक्टूबर 1980 के बाद के दस्तावेजों को आधार मानकर फॉरेस्ट क्लियरेंस का आवेदन बढ़ाने का निर्देश दिया है. राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की तरफ से सभी संबंधित उपायुक्तों को इस संबंध में आदेश जारी किया गया है. इसमें कहा गया है कि 25 अक्टूबर 1980 के पहले सर्वे रिकॉर्ड्स की अनुपलब्धता की वजह से वन भूमि के उपयोग के प्रस्तावों में जंगल-झाड़ी भूमि को चिह्नित करने में जहां कठिनाइयां हो रही हैं, वहां इस तिथि के बाद के सर्वे को आधार माना जाये. उपायुक्त इस सर्वे में दर्ज भूमि के प्रकार के आधार पर कंपनियों से लैंड शिड्यूल (भूमि का विवरण) प्राप्त करें. इतना ही नहीं, कंपनियों से यह वचनबद्धता ली जाये कि वे वन भूमि का प्रयोग कैसे करेंगे. विभाग की ओर से कहा गया कि जहां रिकॉर्ड अस्पष्ट है, वहां उपरोक्त तिथि को आधार मानकर फोरेस्ट क्लियरेंस के स्टेज-1 और स्टेज-2 का क्लियरेंस देने के प्रस्तावों को आगे बढ़ाया जाये. सरकार की ओर से गैर अधिसूचित वन भूमि की प्रकृति के संबंध में विवरण देने को भी कहा गया है.

केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सचिव ने लिखा था पत्र

केंद्रीय वन सचिव सीके मिश्रा ने 15 अक्टूबर 2018 को झारखंड के मुख्य सचिव को इस संबंध में पत्र लिखकर स्थिति स्पष्ट की थी. उन्होंने अपने पत्र में कहा था कि केंद्र ने सर्वोच्च न्यायालय में टीएन गोदावरमन थिरुमुलपाद बनाम केंद्र सरकार के आदेश का हवाला दिया है. इसमें केंद्र ने कानूनी सलाह भी ली थी. वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत वन और गैर वन भूमि परिभाषित है. इसके अलावा 13 नवंबर 2000 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया गया था, जिसमें राष्ट्रीय पार्क, राष्ट्रीय वन्य प्राणी संस्थान और गैर आरक्षित वन भूमि का उपयोग नहीं किये जाने के आदेश दिये गये थे. उन्होंने कहा है कि 25 अक्टूबर 1980 के बाद वन भूमि के उपयोग के बारे में वन अधिनियम कानून प्रभावकारी होगा.

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