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अलविदा ट्रेजेडी किंगः ‘ज्वार भाटा’ से फूटा  ज्वार ‘किला’ निर्माण कर ही थमा

Ranchi: भारतीय सिनेदर्शकों के दिलों पर आजादी के पूर्व से ही राज कर रहे दिग्गज अभिनेता ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार नहीं रहे. अब उनकी यादें रह गईं हैं. पांच दशक से भी लंबे समय के करियर में उन्होंने दर्जनों ब्लॉकबस्टर फिल्में दी हैं. उनके फिल्मी सफर 1944 में फिल्म ‘ज्वार भाटा’ से हुआ था. वहीं 1998 में फिल्म ‘किला’ में वह आखिरी दफा नजर आए थे. दिलीप कुमार के नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे अधिक पुरस्कार जीतने वाले भारतीय अभिनेता के तौर पर दर्ज है. इनमें सर्वोत्तम अभिनेता के लिये आठ बार फिल्मफेयर पुरस्कार भी शामिल हैं. जानें उनके चुनिंदा किरदार के बारे में…

दाग (1952)

इस फिल्म में दिलीप कुमार ने शंकर का किरदार निभाया है जो अपनी विधवा मां के साथ गरीबी में जीवन जी रहा है. खिलौने बेचकर वह अपना जीवन यापन करता.  उसे शराब की लग जाती है. वह पार्वती (निम्मी ) को अपना दिल दे बैठता है. अपनी मां से बहस करने के बाद वह अपना जीवन बदलने का फैसला करता है. इस फिल्म का निर्देशन अमिय चक्रवर्ती ने किया है. इस फिल्म के लिए दिलीप कुमार ने अपने करियर का पहला सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का किरदार जीता था.

देवदास (1955)

Sanjeevani

1955 में शरतचंद्र चटोपाध्याय के उपन्यास ‘देवदास’ पर यह फिल्म बनी थी. फिल्म में दिलीप कुमार ने देवदास का किरदार निभाया था. यह किरदार भी शराब के शिकंजे में रहा है. फिल्म को बहुत अधिक सफलता मिली थी. देवदास हिंदी फिल्म जगत की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में एक है. दिलीप कुमार के साथ ही साथ पारो और चंद्रमुखी का किरदार निभाने वाली सुचित्रा सेन और वैजयंती माला के अभिनय को भी समीक्षकों द्वारा सराहा गया. इस फिल्म के जरिए दिलीप कुमार को सिनेमा जगत में एक सशक्त अभिनेता के तौर पर पहचान मिली.

आजाद (1955)

एस० एम० श्रीरामुलु नायडू निर्देशित इस फिल्म में दिलीप कुमार ने एक अमीर व्यक्ति और कुख्यात डाकू आजाद का किरदार निभाया है. फिल्म में शोभा (मीना कुमारी) अगवा कर ली जाती हैं. उनके करीबी उन्हें ढूंढने की पूरी कोशिश करते हैं लेकिन उनका पता नहीं चलता है. फिर कुछ समय बाद जब शोभा वापस आती है और बताती है कि उसे आजाद ने बचाया और उसका काफी ख्याल रखा. वह आजाद से शादी करना चाहती है. हालांकि, शोभा का परिवार इसके खिलाफ होता है.

नया दौर (1957)

आजादी के बाद की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म की कहानी, गानें और एक्टिंग लोगों को खूब पसंद आई थी. बी. आर चोपड़ा निर्देशित इस फिल्म में दिलीप कुमार ने शंकर नामक एक तांगेवाले की भूमिका अदा की है जो बस की वजह से तांगेवालों की जीविका खत्म होने के खिलाफ लड़ता है. फिल्म में वैजयंती माला, अजीत और जीवन भी मुख्य किरदार में हैं.

मुगल-ए-आजम (1960)

के. आसिफ निर्देशित यह फिल्म सिनेमा जगत की ऐसी फिल्म है जो फिर कभी दोबारा नहीं बनाई जा सकी. फिल्म में दिलीप कुमार ने अकबर के बेटे शहजादे सलीम का किरदार निभाया था. जिन्हें अपने दरबार की ही एक कनीज नादिरा (मधुबाला) से प्यार हो जाता है. दोनों के इस प्यार से अकबर नाराज हो जाते हैं. दोनों एक दूसरे से शादी करना चाहते हैं लेकिन अकबर इसकी इजाजत नहीं देते हैं और दोनों को जुदा करने के लिए जी जान लगा देते हैं. फिल्म में दिलीप कुमार ने जिस तरह से इश्क में डूबे शहजादे का रोल प्ले किया है वह आज भी एक मिसाल है. भारतीय सिने इतिहास में यह फिल्म स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है.

कोहिनूर (1961)

कहा जाता है कि फिल्मों में लगातार दुखों से भरे किरदार करने का असर दिलीप कुमार के निजी जीवन पर भी पड़ने लगा था. जिसके बाद उन्हें दूसरे तरह के किरदार करने की हिदायत दी गई. दिलीप कुमार ने इसके बाद फिल्म ‘कोहिनूर’ का चयन किया. फिल्म में दिलीप कुमार के अपोजिट मीना कुमारी हैं. दोनों राजकुमार और राजकुमारी के किरदार में हैं.  फिल्म में दोनों तलवारबाजी और डांस करते हुए नजर आ रहे हैं. इस फिल्म के हास्य से भरपूर अदाकारी को दर्शकों ने खूब पसंद किया था.

विनोदी भूमिका

शबनम, आजाद, कोहिनूर, लीडर, राम और श्याम, गोपी.

दबंग भूमिका

आन, आजाद, कोहिनूर, क्रांति.

नकारात्मक भूमिका

फुटपाथ, अमर.

गोल्डन जुबली हिट

जुगनू, मेला, अंदाज, आन, दीदार, आजाद, मुगल-ए-आजम, कोहिनूर, गंगा-जमना, राम और श्याम, गोपी, क्रांति, विधाता, कर्मा और सौदागर.

सिल्वर जुबली हिट

शहीद, नदिया के पार, आरजू, जोगन, अनोखा प्यार, शबनम, तराना, बाबुल, दाग, उड़न खटोला, इंसानियत, देवदास, मधुमती, यहूदी, पैगाम, लीडर, आदमी, संघर्ष.

अधूरी फिल्में

काला आदमी, जानवर, खरा-खोटा, चाणक्य-चंद्रगुप्त, आखिरी मुगल।

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