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गुड न्यूज : कोरोना के मरीजों के इलाज के लिए बेहद सस्ती दवा डेक्सामेथासोन को मंजूरी, गंभीर रोगियों पर भी है असरदार

New Delhi : भारत सरकार ने कोरोना के मरीजों के इलाज के लिए एक औऱ दवा की अनुमति दी है. यह दवा तुलनात्मक रूप से सस्ती भी है. यह दवा स्टेरॉइड ब्सेड है. इसका नाम डेक्सामेथासोन है. यह दवा मिथाइल प्रेड्निसोलोन के विकल्प का काम करेगी. इस दवा का इस्तेमाल वैसे मरीजों पर किया जायेगा जिनमें मध्यम या गंभीर लक्षण हों.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना के मरीजों के इलाज के लिए एक संशोधित प्रोटोकॉल जारी किया है. यह प्रोटोकॉल कोरोना के मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टरों के लिए है.

इससे पहले स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना के प्रारंभिक लक्षणों की सूची में भी संशोधन किया था. कोरोना के पहले से ज्ञात लक्षणों के अलावा गंध और स्वाद महसूस नहीं होने को भी कोरोना के लक्षणों में शामिल किया गया. यानी यदि किसी व्यक्ति को स्वाद महसूस नहीं हो रहा हो या किसी भी चीज से गंध नहीं आ रही हो तो ये भी कोरोना संक्रमण के लक्षण हो सकते हैं.

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गठिया जैसी बीमारी में जलन कम करने के लिए होता है उपयोग

डेक्सामेथासोन दवा का उपयोग गठिया जैसी बीमारियों में जलन कम करने के लिए होता है. कोरोना के इलाज में इसका उपयोग उन मरीजों पर किया जायेगा जो ऑक्सीजन सपोर्ट पर हैं. साथ ही जिन्हें बहुत ज्यादा जलन महसूस हो रही हो उन्हें भी यह दवा दी जायेगी.

यह कोई नयी दवा नहीं है. पिछले 60 साल से भी अधिक समय से यह दवा बाजार में है. हाल में युनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं की एक टीम ने कोरोना संक्रमण से जूझ रहे 2000 से अधिक मरीजों पर इस दवा का प्रयोग किया था. इससे वेंटिलेटर पर इलाज करा रहे मरीजों में 35 फीसदी कम मौतें हुईं. विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इस दवा का इस्तेमाल गंभीर मरीजों में डॉक्टरों की देखरेख में ही होना चाहिए.

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जानिये क्या है डेक्सामेथासोन

डेक्सामेथासोन एक स्टेरॉइड है. इस दवा का उपयोग सांस की समस्या, एलर्जिक रिएक्शन, ऑर्थराइटिस, हार्मोन या इम्यूनिटी सिस्टम डिसऑर्डर और सूजन के इलाज के लिए किया जाता है. यह दवा WHO की आवश्यक दवाओं की सूची में 1977 से लिस्टेड है. यह दवा शरीर का नैचुरल डिफेंसिव रिस्पॉन्स को भी कम करती है. इस दवा के बारे में वैज्ञानिकों ने कहा कि इस दवा को 2104 मरीजों को दिया गयाय यह देखा गया कि इस दवा के प्रयोग से वेंटिलेटर सपोर्ट पर रहे मरीजों की मृत्यु दर में 35 फीसदी की कमी आयी है. वहीं, जिन मरीजों को ऑक्सीजन दिया जा रहा था उनमें भी मृत्यु दर 20 प्रतिशत कम हो गयी.

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