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या खुदा तेरे भरोसे को क्या हुआ

हर बार भरोसा रखा मैंने.

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माना कि हालात बेकाबू हो गए कई बार

जब भी वक्त नासाज हुआ

हर बार भरोसा रखा मैंने

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या खुदा तेरे भरोसे को क्या हुआ

 

कभी लगता है संभल गया

कभी यों ही बिगड़ गया

वक्त ऐसा

जैसे रेत का बुत मुठ्ठी से फिसल गया

रोकना तो चाहा हमेशा पर

लम्हा इतना अजीब है

 

क्यों न समझ सका वो तड़प दिल की

साथ रहकर भी

छोड़कर तुम जहां से गए थे

मैं आज भी वहीं खड़ा हूँ

यूं तुम तो संभल गए होंगे

मैं आज भी बिखरा पड़ा हूँ

 

इस दिल में रहोगे ता-उम्र

फिर क्यूँ डरते हो

पाक है मोहब्बत मेरी

यूँ नजरे चुरा के ना निकलो

इंतिज़ार है तेरे इक इशारे का

आगे खूबसूरत जहाँ पड़ा है

 

तेरे बिना वर्ना

दर्द का दरिया ‘राहत’ आँखों से बहता है

 

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

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