Opinion

ग्लोबल इकोनोमी :  दुनिया सोचे अब तक जो मॉडल था, वो क्यों कोरोना का सामना नहीं कर सका?

FAISAL ANURAG

इस साल दुनिया का इकोनोमिक ग्रोथ माइनस तीन रहने के अनुमान के बाद संकट गहरा गया है. अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के इस अनुमान से दुनिया भर में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, उद्योगों के बंद होने और वैश्किव असहयोग के हालात बनने का अंदेशा है. राहत की यह बात है कि जबकि दुनिया में चीन को छोड़ कर तमाम देशों का ग्रोथ मानइस में होगा. वहीं भारत ओर चीन भी अपने सबसबे बुरे दौर से गुजरेंगे. चीन का ग्रोथ रेट 1.2 रहने का अनुमान है. वहीं भारत का 1.9 और सबसे बुरा दौर फ्रांस में होने जा रहा है.

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जिसका ग्रोथ रेट माइनस 7.5 रहने का अनुमान है. ब्रिटेन का गोथ रेट मानइस 6.5 का है. तो अमरीका का माइनस 5.9. कोरोना वायरस इसका एक बड़ा कारण है. लेकिन केवल कोरोना के कारण ही ये अर्थव्यवस्थाएं इस हालत में होगी यह नहीं कहा जा सकता. शासकों की उन नीतियों का असर भी इन पर है जो कोरोना पूर्व ही दिखने लगा था.

वैसे आंकड़ों में माइनस में नहीं दिखने के बावजूद चीन और भारत दोनों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए बड़ी चुनौती है. भारत की आर्थिेक नीतियों को लेकर लंबे समय से कई सवाल उठाए जाते रहे हैं. भारत के आंकड़ों को ले कर कर भी दुनिया की कई बड़ी  एजेंसियां शक की निगाह से देखती हैं. मंगलवार को आइएमएफ ने जारी रिपोर्ट में इस अनुमान को प्रस्तुत किया है. इसी अनुमान में भारत के लिए 2021 के लिए राहत भरी खबर है.

वक्त आ गया है कि अब दुनिया को गहरायी से विचार करना चाहिए कि 1990 के बाद से जिस नीति पर वह चल रही है उसके बुरे दौर का चरम आ गया हैं. अनेक अर्थशास्त्रियों ने तो स्पष्ट कर दिया है कि इन नीतियों का दौर जा चुका है. इससे दुनिया की अर्थव्यवस्था को बचाया नहीं जा सकता है. विशेष तौर पर इस राय पर कभी गौर नहीं किया गया है.

जिस नीति से दुनिया के भूमंडलीकरण का सपना देखा गया था उसके शव को ढोने का अर्थ मानवसमूह को खतरे में डालना होगा. बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का यह रहस्य इस महामारी ने खत्म कर दिया है. कारपारेटीकरण का सबसे बुरा परिणाम स्वास्थ्य सेवाओं औऱ उसकी संरचना पर देखा जा रहा है.

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इस महामारी ने साबित कर दिया है कि राज्य स्वस्थ्य के अपने दायित्व को कारपारेट के हाथों में दे कर लोगों को सुरक्षित नहीं रख सकता है. विकासदर की कहानी भी इसी तरह की निरंकुशता की ओर इशारा करती है.

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आर्थिक गिरावट के इस दौर में सबसे गंभीर कीमत नौकरीपेशा और श्रमिकों को चुकानी है. जिन देशों को जी सेवन या जी 20 के सदस्य होने का गर्व है उन देशों की वासतविकता यह है कि कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को जबरन छुट्टी पर भेज दिया है. अधिकांश कंपनियों ने वेतन को 40 प्रतिशत तक कर दिया है. बडे देशों में तो लीव विदाउट पे पर कर्मचारी भेज दिये गये हैं. प्रधानमंत्री मोदी भी भारत की कंपनियों से मात्र आग्रह ही कर रहे हैं कि वे वेतन में कटौती न करें.

लेकिन सूचनाएं इसके विपरीत आ रही है. इंडस्ट्री के छोटे-बड़े संगठन तो अपनी पीड़ा विभिन्न माध्यमों से सुना रहे हैं. और वेतन भुगतान के लिए लिक्वीडीटी नहीं होने की बात कर रहे हैं. एसोचेम तो सरकार से राहत पैकेज की मांग कर रहा है. प्रधानमंत्री के भाषण के बाद भी आर्थिक क्षेत्र में हालात गंभीर हैं. और मेहनतकश तबकों की बेचैनी बढ गयी है.

मुंबई या सूरत में सड़कों पर आ गए मजदूरों के संदर्भ में चाहे जो भी कहा जाए एस पीड़ा, निराशा और अविश्वास को समझने की जरूरत है, जो उनके बीच है. भविष्य को ले कर इस तरह की आशंका का दौर इतिहास में कम ही देखा गया है. प्रधानमंत्री ने बोला तो खूब, लेकिन ठोस बात नहीं कर सके. इससे इस तबके मे निराशा फैलना लाजिमी ही है. राज्य सरकारों की भूमिका को को ले कर भी सवाल किए जाने लगे हैं. क्योंकि वे भी इन मेहनतकशों के भरोसे पर खरा नहीं उतर पा रही हैं.

दुनिया का इस तरह महामंदी का शिकार होना एक असामान्य हालत पैदा कर रहा है. कारोना संकट ने तमाम देशों के बीच परस्पर सहयोग को भी कम कर दिया है. और सभी देश केवल अपने लोगों के बारे में ही सोच रहे हैं. अमरीका का संकट तो इतना तीखा हो गया है कि राष्ट्रपति ट्रंप और न्यूयार्क के गवर्नर खुल कर एक दूसरे के खिलाफ बोल रहे हैं.

इस संकट के लिए एक दूसरे पर जिस लहजे में आरोप लगा रहे हैं वह अमरीका के लिए बिल्कुल नयी बात है. न्यूयार्क टाइम्स इस समय ट्रंप की नीतियों की कड़ी आलोचना कर रहा है. उसके पत्रकारों के अनुसार एक तरह की अपराधिक लापरवाही के कारण ही अब तक 23 हजार से अधिकर अमेरिकन की जान गयी है. अमरीका का संकट उसकी इकोनामी भी है. चुनाव का साल होने के कारण ट्रंप के अनेक फैसलों को भी न्यूयार्क टाइम्स ने निशाने पर लिया है.

चौतरफा संकट से निपटने की रणनीति का अभाव भारत अमरीका समेत तामाम देशों में देखने को मिल रहा है. और इकोनामी को संकट से बाहर निकालने का भी. लोगों के सामने जिस तरह रोजगारहीनता की स्थिति गहराती जा रही है, सामाजिक तनाव भी बढता जा रहा है. 1929 की महामंदी से भी इसके ज्यादा गहरे होने की आशंका प्रकट की जा रही है.

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