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सरस मेला : खाली-खाली कुर्सियां, खाली-खाली स्टाॅल…

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Dhanbad : आंगनबाड़ी सेविका और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं से जुड़ी महिलाओं को सरस मेला में आना अनिवार्य करने से दूसरे दिन जो गहमागहमी थी वह रविवार को नहीं दिखी. हर तरफ सन्नाटा पसरा था. हालांकि तब स्कूली बच्चो की पेंटिंग प्रतियोगिता चल रही थी. सूत्रों के मुताबिक इस प्रतियोगिता में 42 बच्चों ने भाग लिया. कार्यक्रम के बीच ही डीसी की गाड़ी पहुंची तब मेले के दुकानदार ग्राहक के लिए तरस रहे थे. धनबाद में मेलों का ऐसा हाल नहीं रहता है. संडे को तो ऐसी भीड़ होती है कि पूछिए मत.

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डोनेशन कार्ड के रूप में भी दबाव बनाकर भारी वसूली

टाऊन हाल मैदान में अक्सर सरस मेला की तुलना में अपेक्षाकृत काफी कम खर्च से मेला लगाया जाता है लगातार. इन मेलों में संडे और छुट्टी के दिन इतनी भीड़ होती है कि धनबाद गोविंदपुर सड़क सुबह से देर रात तक जाम हो जाती है. लोग यहां लगातार मेला से जरा भी नहीं ऊबते. डिजनीलैंड हर साल पूजा से पहले कोहिनूर मैदान में लगता है. अच्छा कारोबार का चस्का ही उसे यहां खींच लाता है. लेकिन सरस मेला में सन्नाटा…? लोगों को कुछ पसंद का यहां मिल ही नहीं रहा?  सूत्र बताते हैं कि मेला के डोनेशन कार्ड के रूप में भी दबाव बनाकर भारी वसूली की गयी है.

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लोग कह रहे हैं…कुछ तो लोचा है भाई

धनबाद के सामाजिक कार्यकर्ता एसके सिंह ने कहा है कि आयोजकों को चाहिए कि आयोजन स्थल पर आय-व्यय का पूरा विवरण बड़ा बोर्ड लगाकर आमलोगों के सूचनार्थ प्रस्तुत करे. मेला में क्यों नहीं स्वयं सहायता समूह के 21 राज्यों के प्रतिभागी आए यह भी विचार करने योग्य है. क्या मेले के संबंध में सिर्फ झूठा प्रचार कर सरकारी फंड का वारा-न्यारा किया गया?  यह सवाल स्वभाविक तौर पर खड़ा होता है. क्या 99 डेकोर,  धनबाद के बैंक और सरकारी विभाग का स्टाल लगाने के लिए अफसरों ने यह सब किया? लोग कह रहे हैं…कुछ तो लोचा है भाई. उम्मीद करनी चाहिए कि मेले के आयोजन को लेकर उठनेवाले हर सवाल का जिम्मेवार समुचित जवाब देंगे.

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