JamshedpurJharkhand

लड़कियों को देवी की तरह भले न पूजा जाये, लेकिन उन्हें समान अवसर देना ही होगा

अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर लड़कियों के अभिभावकों के नाम रोटरी का खुला पत्र

अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर रोटरी क्लब ऑफ जमशेदपुर स्टील सिटी की ओर से अध्यक्ष जलपा पारीख ने शहर के अभिभावकों से अपनी बच्चियों को शिक्षा की ओर प्रोत्साहित करने की अपील के साथ एक खुला पत्र जारी किया है. हम इसे हूबहू छाप रहे हैं. :

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प्रिय अभिभावक,

11 अक्टूबर की तारीख भारत समेत पूरी दुनिया के लिए अहम है क्योंकि इस दिन अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है. यों भारत में इस तारीख का महत्व कुछ और कारणों  से भी है. इस दिन संपूर्ण क्रांति आंदोलन के जनक लोकनायक जयप्रकाश और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का जन्म दिन भी है. लेकिन हमारा फोकस अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर है. इस खास दिन पर परिवार, समाज और देश के लिए बालिकाओं के महत्व को दर्शाया जाता है. साथ ही यह संदेश दिया जाता है कि बालिकाओं की क्षमताओं और शक्तियों को पहचान कर उनके लिए दिल खोलकर अवसर मुहैया कराने चाहिए. अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस मनाने के पीछे उद्देश्य दुनियाभर की बालिकाओं की आवाज को  सशक्त करना है. दुनियाभर में कई ऐसे इलाके या देश हैं जहां बालिका को लड़कों की तुलना में कम महत्व दिया जाता है और बालिकाओं के साथ विवाह, शिक्षा, सामाजिक स्तर में कई तरह के भेदभाव किए जाते हैं. साथ ही हिंसा, शिक्षा के खराब अवसरों जैसे लिंग आधारित चुनौतियों का सामना करने के कारण कई राज्यों में बालिकाओं की स्थिति काफी खराब है. बहुत दिन नहीं बीते जब हरियाणा इस मामले में खासा बदनाम था जहां की खाप पंचायतें बालिकाओं पर कई तरह की बेहूदा पाबंदियां लागू करती थीं. और तो और कन्या भ्रूण हत्या कई इलाकों में आज भी बदस्तूर जारी है. सरकार ने इस बुराई से निपटने के लिए ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का स्लोगन दिया जरूर, लेकिन सरजमीं पर इसका कितना प्रभावी कार्यान्वयन हुआ, यह सच किसी से छिपा नहीं है. हालांकि बालिकाओं के मामले में सिर्फ नकारात्मक पहलू ही नहीं है. कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश की जागृति अवस्थी ने यूपीएससी की परीक्षा में पूरे देश में दूसरा स्थान हासिल कर बालिकाओं का मान बढ़ाया था. इस बार अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस 2021 को ‘डिजिटल जेनरेशन: हमारी पीढ़ी’ की थीम के आधार पर मनाया जा रहा है.

बालिकाओं की पूजा

भारत में और खासकर जमशेदपुर में इस बार जब यह अवसर आया है तो संयोग से नवरात्र चल रहे हैं और बालिकाओं के मान-सम्मान का इस त्यौहार से बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता क्योंकि नवरात्र की अष्टमी और नौवीं तिथि को लोग अपने घरों और पूजा पंडालों में कन्या पूजन करते हैं और बालिकाओं को देवी की तरह ही आवभगत कर पूजा जाता है. देवी की तरह पूजा करने की जरूरत भले ही न हो, लेकिन उन्हें समान अवसर मिले इतना तो सुनिश्चित करना ही होगा.

एनजीओ ने की थी शुरुआत

आपको मालूम होगा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बालिका दिवस मनाने की शुरुआत एक एनजीओ ‘प्लान इंटरनेशनल’ के द्वारा की गई थी. इसकी शुरुआत एक प्रोजेक्ट के रुप में हुई थी. इस एनजीओ ने ‘क्योंकि मैं एक लड़की हूंÓ नाम से एक जागरुकता अभियान चलाया था. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस अभियान के विस्तार के लिए कनाडा सरकार से संपर्क किया गया. कनाडा सरकार ने संयुक्त राष्ट्र की 55वीं आम सभा में अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा और अंतत: संयुक्त राष्ट्र ने 19 दिसंबर, 2011 को इस प्रस्ताव को पारित किया. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस मनाने के लिए 11 अक्टूबर की तारीख तय की गई और उसके बाद साल 2012 के बाद हर साल अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाने लगा है.

2030 का लक्ष्य

संयुक्त राष्ट्र में सतत विकास लक्ष्यों को 2017 में अपनाया गया था, जिसमें लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण प्राप्त करना भी शामिल है. इसी के मद्देनजर साल 2030 तक यह लक्ष्य रखा गया है कि युवा लड़कियों की सहायता कर बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा में समान अवसर और बिना किसी लिंग-आधारित भेदभाव या हिंसा के सभी अवसर उपलब्ध कराएं जाएंगे.गौरतलब है कि कोरोना महामारी के कारण दुनिया की अधिकांश आबादी लैपटॉप व मोबाइल के सामने बैठकर काम करने के लिए मजबूर हो गई है, ऐसे में दूसरी चुनौती यह भी है कि दुनियाभर में लगभग 2.2 बिलियन लोगों के पास अभी भी इंटरनेट कनेक्शन नहीं है. ऐसे में खासकर लड़कियों की स्थिति और भी अधिक खराब है.वैश्विक स्तर पर, इंटरनेट उपयोगकर्ताओं का लिंग अंतर 2013 में 11 प्रतिशत से बढ़कर 2019 में 17 प्रतिशत हो गया है. सबसे कम विकसित देशों के लिए यह करीब 43 प्रतिशत हो चुका है. डिजिटल क्रांति के युग में जहां लोग नए कौशल सीखने और राजस्व अर्जित करने के लिए विभिन्न तरीकों से प्रौद्योगिकी का उपयोग कर रहे हैं तो ऐसे में लड़कियों को पीछे इस मामले में पीछे नहीं छोड़ा जा सकता है.

स्कूल भेजे जाने की जरूरत

बालिकाओं के सशक्तीकरण की सबसे जरूरी शर्त है उन्हें शिक्षित करना. आज हमारे शहर में कई लड़कियां अपने माता-पिता के दबाव में आकर पढ़ाई छोड़ देती हैं. कई लड़कियों की समय से पहले शादी करा दी जाती है और उनका जीवन अनचाहे बोझ से नर्क बन जाता है. रोटरी जैसे सामाजिक संगठनों को आगे आकर एक अभियान के रूप में लड़कियों को स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा और इसके लिए उनके अभिभावकों को भी जागरूक करना होगा. तभी इस दिवस को मनाने का लक्ष्य हासिल हो सकेगा.

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