LITERATURE

बकौल गिरीश कार्नाड, मैं और वह सात लड़कियां…

Arshana Ajmat

गिरीश कार्नाड को गुज़रे एक साल हो गए. सन् 2013 में अंग्रेज़ी अख़बार मिंट में अरुंधति नाग और गिरीश कार्नाड की लम्बी बातचीत छपी थी. अरुंधति नाग ने इस बातचीत में गिरीश कार्नाड से कहा था कि संभवत: वह भारत के जीवित महान नाटककारों में से एक हैं, वरना हममें से ज्यादातर लोग तो यह भी भूल गए हैं कि विजय तेंदुलकर दिखते कैसे थे. उनकी याद में इस लम्बी बातचीत का सम्पादित अंश अंग्रेजी से हिन्दी में अरशाना अज़मत ने पेश किया है. हम इसे “सधिकार” वहीं से ले रहे हैं.

ययाति इमले की तरह लिखा तो द फायर में 30 साल लग गए

जब मैंने ययाति लिखा.. तब मैं कवि बनना चाहता था.. नाटककार नहीं. रंगमंच में दिलचस्पी थी लेकिन नाटककार बनने की मंशा कभी नहीं थी. फिर मुझे रोहड्स स्कॉलरशिप मिली लेकिन पिताजी की चिंता थी कि मैं इंग्लैंड जाकर किसी गोरी से शादी न कर लूं. तभी मैंने ययाति लिखा. मैं राजाजी (सी राजगोपालाचारी) की महाभारत पढ़ रहा था, उससे मुझे दो कहानियां मिलीं… ययाति और द फायर एंड द रेन. ययाति मैंने ऐसे लिखा जैसे कोई इमला लिखता है, दूसरी कहानी लिखने में 30 साल लग गए.

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… जब मैं तुगलक लिख रहा था तो घंटों लाइब्रेरी में बैठता और नोट्स बनाता. मुझे चंद्रशेखर कम्बार जैसे लेखकों से जलन होती है जिन्हें अपने गांवों में ही कहानियों के भंडार मिल जाते. मुझे तो अपने नाटकों में ढेर मेहनत करनी पड़ती.

काश! मैं जादूगर होता

मैं हमेशा से जादूगर बनना चाहता था.. काश कि मैं बन सकता. जादू आपको भ्रम पर यकीन करना नहीं सिखाता बल्कि सिखाता है कि दुनिया कितनी खूबसूरत हो सकती है, कितनी शानदार हो सकती है. मैं कभी जादू का इस्तेमाल सही तरह से नहीं कर पाया. मैं अक्सर सोचता हूं कि बच्चों का एक नाटक लिखूं. जिसका मुख्य किरदार एक डॉल मेकर हो. एक नाकाम डॉल मेकर. जिसकी मदद कोई न करता हो. जब वह सोए तो उसकी बनाई डॉल जिंदा हो जाएं और उसके अधूरे काम पूरे कर दें. और वह कभी न समझ सके कि कौन चुपके से उसकी मदद कर गया.

मैं और वह सात लड़कियां

मेरे परिवार में दो बहनें थीं .. भांजी थी. मेरी उम्र उस वक्त 14 साल थी. मेरे चाचा/मामा की चार बेटिया थीं. इस तरह से मेरे आस पास 7 लड़किया थीं. मेरी परवरिश उनके साथ ही हुई. हमारे यहां चाचा/मामा की बेटी से शादी भी हो जाती है. यह मर्जी पर होता है, आप चाहें तो भाई-बहन बनकर रहें, चाहें तो शादी कर लें. इस तरह से जब हम साथ-साथ पलते-बढ़ते हैं तो शारीरिक आकर्षण स्वाभाविक रूप से होता है. मैंने इन सात लड़कियों से बहुत कुछ सीखा. प्यार सीखा, जलन सीखी. मैं अक्सर श्याम बेनेगल से कहता रहा कि श्याम चूंकि तुम्हारी 6 बहनें रही हैं, इसीलिए तुम भूमिका जैसी प्यारी फिल्म बना पाए. दूसरे समाज में एक खास उम्र तक पहुंचने पर लड़के-लड़कियां अलग अलग रहने लगते हैं, उनके दोस्त-सहेलियां भी अलग हो जाते हैं, सारस्वत समाज में ऐसा नहीं होता है.

जब मीता वशिष्ठ ने कहा कि आप तो जिंदा हैं

यह एक दिलचस्प किस्सा है. एक बार मीता वशिष्ठ ने मुझसे कहा .. हम नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में आपका नाटक तुगलक कर रहे थे, हमने इस नाटक का विश्लेषण किया, इस पर निबंध लिखे. तब हम सोचते थे कि आप मर गए होंगे. मीता की बात सुनकर लगा था कि मैं बहुत पुराना हो गया हूं.

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मेरी पत्नी सरस …

सरस मेरे नाटक सबसे आखिर में सुनती हैं. वह कन्नड़ नहीं पढ़ सकतीं. कई दोस्त मुझसे पूछते हैं कि मैंने बायोग्राफी कन्नड़ में क्यों लिखी? मैं जवाब देता हूं क्योंकि मेरी पत्नी कन्नड़ नहीं पढ़ सकती. सरस ने एक बार मुझसे कहा था कि सेलेब मत बनो, अमिताभ बच्चन मत बनो. बस वह करो जो तुमको अच्छा लगता है. सरस ने पैसे कमाए और हमने उन पैसों से ही अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया.

हां, मैं अड़ियल हूं

अपने नाटकों के अनुवाद को लेकर मैं अड़ियल हूं. अच्छी बात यह है कि अनुवाद करने वाले ज्यादातर लोग साथ के रहे. चाहे वह राम गोपाल बजाज हों या पदमावती राव या बीवी कारंत. हम आपस में बैठकर बात कर लेते थे. मैं अपने नाटकों का अनुवाद अंग्रेजी में खुद करता हूं ताकि दूसरी जुबानों में अनुवाद करने वालों के लिए दो भाषाओं के संदर्भ हों.

मेरे नाटक

हयवदन मेरा ऐसा नाटक है जो हमने टेक्सास और टक्सन तक में किया है. नागमंडल और हयवदन ये दोनों मेरे बाराहमासी नाटक हैं. अक्सर देश भर में कहीं न कहीं होते रहते हैं. बाली मेरा सबसे कम खेला जाने वाला नाटक है. सबसे कमजोर नाटक भी.

नाटकों के अनुवाद

नाटकों के अनुवाद और उपन्यासों के अनुवाद में फर्क होता है. उपन्यास आप लाइन बाई लाइन ट्रांसलेट कर सकते हैं. नाटक नहीं.. खासतौर से विजय तेंदुलकर या महेश दत्तानी के नाटक. महेश के मामले में तो खास तौर से नहीं. आपको उनके पॉज समझने पड़ते हैं. पॉज का अनुवाद नहीं किया जा सकता.

गिरिश कर्नाड, नाटककार

(19 मई 1938- 10 जून 2019)

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