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गिरिडीह, रांची और जमशेदपुर लोकसभा सीटों पर महतो रूठा तो सबकुछ छूटा

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Akshay Kumar Jha

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Ranchi: झारखंड की सभी 14 लोकसभा सीटों की बात करें तो उम्मीदवारों की पहली पसंद आदिवासी वोटर होते हैं. दूसरे नंबर पर महतो वोटर आते हैं. इन 14 सीटों में से तीन सीट गिरिडीह, रांची और जमशेदपुर सीट की बात करें तो इन सीटों पर महतो वोटर उम्मीदवारों की पहली पसंद हैं.

अगर क्षेत्र के महतो वोटरों की वोट के रूप में नेमत बरस जाए तो उम्मीदवारों के न्यारे-व्यारे हो जाते हैं. तीनों सीट पर भले ही किसी भी जाति के सांसद चुने गए हों.

वो महतो वोटर के वोट से ही चुन कर गए हैं. गिरिडीह में सबसे ज्यादा करीब पांच लाख वोटर महतो जाति से आते हैं. दूसरे नंबर पर रांची है. रांची में करीब चार लाख वोटर और जमशेदपुर में करीब तीन लाख वोटर महतो जाति से हैं.

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गिरिडीह… यहां तो सब महतो-महतो है

अटैक में भी गन. डिफेंस में भी गन. यही कहानी है गिरिडीह लोकसभा की. यहां 2019 में होने वाले लोकसभा में कांटे की टक्कर जिन दो उम्मीदवारों के बीच होने वाली है, वो महतो जाति से हैं.

जेएमएम से जगरनाथ महतो और एनडीए फोल्डर से चुनावी मैदान में आजसू से चंद्रप्रकाश चौधरी. महतो बाहुल्य इस क्षेत्र में दोनों उम्मीदवार चाहेंगे कि उन्हें उनकी जाति के वोट तो जरूर मिले.

वैसे भी गिरिडीह लोकसभा क्षेत्र महतो की राजनीति के लिए शुरू से जाना जाता है. स्व. बिनोद बिहारी महतो की राजनीतिक सक्रियता इसी क्षेत्र में रही है.

उन्हीं की विरासत जगरनाथ महतो पूरी तरह से अपना करना चाह रहे हैं. इस बीच सुदेश महतो की चाहत है कि गिरिडीह की विरासत अगर महतो को ही जानी है तो आजसू से बेहतर क्या होगा.

2014 में गिरिडीह लोकसभा क्षेत्र में 9,69,997 वोटरों ने अपने मत का इस्तेमाल किया था. एक अनुमान के मुताबिक इस बार गिरिडीह लोकसभा में करीब पांच लाख महतो वोटर हैं. इस सीट पर तीन बार महतो जाति के सांसद रह चुके हैं.

1984 से कोशिश करते-करते स्व. विनोद बिहारी महतो को पहली सफलता 1991 में मिली. उनके स्वर्गवास के बाद 1992 में उनके बेटे राज किशोर महतो सांसद बने.

तीसरी बार 2004 में रवींद्र पांडे को पटखनी देकर टेकलाल महतो सांसद बने और इस बार माना जा रहा है कि निश्चित तौर पर कोई महतो ही जीत दर्ज करेगा. रवींद्र पांडे यहां से 1996, 1998, 1999, 2009 और 2014 के लोकसभा में चुनाव जीत चुके हैं.

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रांची… महतो वोट के दम पर ही रामटहल सांसद के बाद बन रहे हैं बागी

रांची लोकसभा क्षेत्र में भी महतो वोटरों की संख्या काफी है. आदिवासियों के बाद जीत और हार का निर्णय यहां महतो वोटर ही लेते हैं. ऐसे में महतो वोटर जीत के लिए काफी मायने रखते हैं. रामटहल चौधरी इन्हीं वोटरों के दम पर छह बार सांसद रह चुके हैं.

उम्र सीमा की वजह से बीजेपी से टिकट ना मिलने के बाद अब इन्हीं वोटरों के दम पर बागी तेवर दिखा रहे हैं. सांसद बनने के लिए वो 1984 से ही चुनावी मैदान में हैं.

दो बार लगातार हार के बाद उन्हें पहली जीत 1991 में मिली. इसी जीत के साथ पहली बार कोई महतो उम्मीदवार सांसद भी बना.
2004 में सुबोधकांत सहाय ने उन्हें हराया.

लेकिन फिर से 2009 और 2014 में रामटहल चौधरी ने जीत हासिल की. रांची लोकसभा क्षेत्र में 10,49,783 वोटरों ने अपने मत का इस्तेमाल किया था. एक अनुमान के मुताबिक, इस बार रांची लोकसभा क्षेत्र में करीब चार लाख महतो वोटर हैं.

अब देखना होगा कि कौन उम्मीदवार इन वोटरों को रिझा सकता है. यहां गौर करने वाली बात है कि इस बार रांची लोकसभा क्षेत्र से बीजेपी और कांग्रेस दोनों की तरफ से महतो उम्मीदवार नहीं है. महागठबंधन की तरफ से कांग्रेस के दिग्गज सुबोधकांत सहाय और बीजेपी की तरफ से संजय सेठ मैदान में हैं.

सबसे ज्यादा बार महतो जाति से सांसद यहीं से बने

2014 के लोकसभा चुनाव में जमशेदपुर में 10,49,140 वोटरों ने अपने मत का इस्तेमाल किया था. इस बार जमशेदपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में महतो वोटरों की संख्या करीब 3.5 लाख बतायी जाती है. सबसे ज्यादा बार महतो सांसद देने का भी रिकॉर्ड इसी संसदीय क्षेत्र को है.

1989 में शैलेंद्र महतो ने सबसे पहले महतो जाति से जीत हासिल की थी. उसके बाद वो दोबारा 1991 में चुने गए. 1998 में आभा महतो चुनी गयीं और उन्होंने 1999 में जीत का सिलसिला दोहराया.

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लेकिन 2004 में उनका जीत का पहिया महतो जाति से आने वाले सुनील महतो ने ही रोका. लेकिन जीत के बाद उनकी हत्या हो गयी.
2007 के उपचुनाव में उनकी पत्नी सुमन महतो ने जीत हासिल की. 2009 में अर्जुन मुंडा और उपचुनाव में आईपीएस से सांसद बने डॉ. अजय ने जीत हासिल की.

लेकिन 2014 में फिर से महतो कैंडीडेट विद्युत बरन महतो ने विरासत वापस ली. जमशेदपुर सीट से इस बार फिर से बीजेपी की तरफ से विद्युत बरन महतो मैदान में हैं, तो उनके सामने महागठबंधन से आदिवासी चेहरा चम्पई सोरेन.

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