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गिरिडीह लोकसभाः सांसद रविंद्र पांडेय, विधायक ढुल्लू महतो और शिवशक्ति बख्शी अब क्या करेंगे ?

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: सवाल है कि जिस झारखंड में 14 में से 12 लोकसभा सीटों पर बीजेपी का परचम लहरा रहा हो. 1996, 1998, 1999, 2009 और 2014 पांच बार जिस गिरिडीह लोकसभा सीट पर बीजेपी के बैनर तले रवींद्र कुमार पांडेय ने जीत दर्ज की हो. गठबंधन के नाम पर उसी सीट की कुर्बानी बीजेपी को क्यों देनी पड़ती है. वो भी बिना रवींद्र पांडेय से किसी तरह की वार्ता किए हुए. जबकि गिरिडीह लोकसभा में छह विधानसभा में से तीन पर बीजेपी का कब्जा है. इन सारे सवालों का जवाब है बीजेपी सांसद रवींद्र पांडेय और बीजेपी के बाघमारा विधायक ढुल्लू महतो की आपसी रंजिश और बतोलेबाजी.

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आज की राजनीतिक भाषा में बात की जाए तो कहा जा सकता है कि गिरिडीह लोकसभा सीट पर सर्जिकल स्ट्राइक हुआ है. बीजेपी ने आधिकारिक रूप से यह घोषणा कर दी है कि गिरिडीह में गठबंधन के मद्देनजर आजसू अपना उम्मीदवार उतारेगी.

यह सर्जिकल स्ट्राइक ढुल्लू महतो की तो नहीं ?

सुबह जब अखबारों छपी तो हर चौक-चौराहे पर इस बात को लेकर चर्चा शुरू हो गयी. सुबह रविंद्र पांडेय के आवास पर कुछ लोगों के साथ चर्चा करते हुए सांसद कहते हैं कि बड़ी पार्टी में फैसला कार्यकर्ता या छोटे अधिकारियों से पूछ कर नहीं लिया जाता. पार्टी को लगा होगा कि यह सीट मैं नहीं निकाल सकता, इसलिए यह सीट आजसू को दी गयी होगी. लेकिन मामला ऐसा नहीं है. गिरिडीह लोकसभा से ढुल्लू महतो के चुनाव लड़ने की चाहत ही मामले की जड़ है. टिकट लेने में कूटनीति तरीका अपनाने की बजाय ढुल्लू महतो सीधा रवींद्र पांडेय से भिड़ गए.

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रवींद्र पांडेय एक सधे हुए राजनीतिज्ञ की तरह ढुल्लू को परास्त करने का दांव खेलने लगे. लड़ाई इतनी बढ़ गयी कि पार्टी की तरफ से दोनों को शो-कॉज करना पड़ा. दिल्ली दरबार में ढुल्लू और रवींद्र पांडेय दोनों की फाइल में रेड मार्किंग होने लगी. कोयलांचल की राजनीति और ढुल्लू महतो के कुछ करीबियों का कहना है कि ढुल्लू महतो ने अपनी हार देख सीधा सर्जिकल स्ट्राइक जैसा कुछ करने का सोचा. सीएम से नजदीकी इनके काम आयी. बताया जा रहा है कि ढुल्लू महतो ने ‘मेरा नहीं तो उसका भी नहीं’ वाले फॉर्मूले को बेहतर तरीके से प्लेस कराया. वहीं आजसू ने विधानसभा चुनाव को नजर में रखते हुए बीजेपी के सामने ज्यादा मोल-भाव नहीं कर किया और सुदेश महतो एक ही सीट पर चुनाव लड़ने को तैयार हो गए.

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लेकिन बीजेपी के दावेदारों का क्या होगा ?

लोगों के बीच कोतुहल का विषय अब यह है कि बीजेपी की तरफ से लोकसभा चुनाव लड़ने वाले दावेदार अब क्या करेंगे. इन दावेदारों में सीटिंग एमपी रवींद्र पांडेय, बाघमारा विधायक ढुल्लू महतो और बीजेपी की पत्रिका कमल संदेश के संपादक शिवशक्ति बख्शी शामिल थे. कमल संदेश के संपादक शिवशक्ति बख्शी पार्टी के फैसले के बाद पूरी तरह से सरेंडर कर चुके हैं. ढुल्लू महतो सांसद का चुनाव लड़ने के लिए बागी बने, ऐसा फिलहाल संभव नहीं.

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ऐसे में सबकी नजर रवींद्र पांडेय पर टिकी है. रवींद्र पांडेय शुरू से ही बीजेपी से जुड़े हुए रहे हैं. अगर वो सांसद नहीं रहते हैं तो एक तरह से उनकी राजनीतिक विरासत को विराम लग सकता है. इसलिए वो अपनी तरफ से नहले पर दहला मारने की सोच सकते हैं. चूंकि महागठबंधन का इस लोकसभा क्षेत्र पर फैसला हो चुका है इसलिए कांग्रेस की तरफ जाना उनके लिए संभव नहीं.

उनके किसी पार्टी से लोकसभा चुनाव लड़ने की तमन्ना अगर कोई पूरा कर सकता है तो वो जेएमएम है. लेकिन जेएमएम से उम्मीदवारी के प्रबल दावेदार जगरनाथ महतो ऐसा होने नहीं देंगे. जबतक कि सोरेन परिवार की तरफ से जगरनाथ महतो को कोई ऐसा प्रलोभन ना दे दिया जाए, जिसका वजन सांसद पद के जितना हो.

आजसू के लिए भी राह आसान नहीं

आजसू के लिए भी गिरिडीह लोकसभा सीट आसान नहीं है. इससे पहले भी आजसू यहां अपना उम्मीदवार उतार चुकी है. लेकिन बूरी तरह से मुंह की खानी पड़ी है. आजसू के प्रबल दावेदारों में सबसे पहला नाम तो सुदेश महतो का ही है. दूसरे नंबर पर उनके ससुर यूसी मेहता, तीसरे नंबर पर टुंडी विधायक राज किशोर महतो और चौथे नंबर पर लंबोदर महतो.

जो भी हो इतना तय है कि कोई महतो चेहरा ही गिरिडीह लेकसभा के लिए आजसू की तरफ से उम्मीदवार होगा. मतलब जितने भी दिग्गज जो सांसद सीट के लिए फाइट करेंगे लगभग सभी महतो फ्लेवर वाले ही होंगे. ऐसे में कौन बाजी मारेगा इसके लिए थोड़ा और इंतजार करने की जरूरत है.

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