Opinion

कोरोना से बेहाल बिहार में चुनाव से पहले दलबदल के रोचक सियासी ड्रामे के लिए तैयार हो जाइये

Faisal Anurag 

Sanjeevani

चुनाव की आहट के साथ ही बिहार में दलबदल और पार्टियों को तोड़ने की गतिविधियां तेज हो गयी हैं. नीतीश कुमार ने श्याम रजक को मंत्रीपरिषद से बर्खास्त कर दिया है. तो राजद ने भी तीन विधायकों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. एनडीए के अंदर लोजपा जहां तीखे सवाल उठा कर गठबंधन को परेशान किये हुए है, वहीं जीतनराम मांझी राजद-कांग्रेस से अलग राह की तलाश में है. श्याम रजक दलित नेता हैं. राजद में उनकी वापसी के साथ एनडीए दलित वोटों को बैंलेंस करने में लग गया है.

 

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श्यम रजक कभी लालू प्रसाद के खास रहे हैं. लेकिन बाद में वे नीतीश के भी नजदीक हो गए. पिछले कुछ समय से उनके विरोध के तेवर दिखने लगे थे. जब बिहार में दलितों पर हुए अत्याचार के मामले को उन्होंने तीखे अंदाज में उठाया था. उनके जदयू से इस्तीफा देने की खबरें जैसे ही चर्चा में आयी नीतीश कुमार ने उन्हें न केवल कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया बल्कि पार्टी से भी निष्कासित कर दिया. रजक उन नेताओं में हैं जिन्होंने जदयू के संचालन की प्रक्रिया को लेकर  सवाल उठाए थे.

नीतीश कुमार ने उनके कामकाज पर भी अंकुश लगा रखा था. और उनके विभाग के सचिव और प्रधान सचिव उन के निर्णयों को नजरअंदाज करते रहे.  बिहार में नीतीश सरकार मंत्रियों की तुलना में अफसरों पर ज्यादा भरोसा करती रही है. अनेक मंत्रियों का दर्द इस प्रवृति को ले कर निजी बातचीत में उभरता रहा है. लेकिन सार्वजनिक तौर पर कोई कूछ भी नहीं बोलता है.

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यह तो अब आम प्रचलन में ही हो गया है कि न तो सरकार के भीतर और न ही पार्टियां आंतरिक लोकतंत्र को अपनाती हैं. बिहार की राजनीति तो इसके लिए काफी बदनाम है. दलबदल के ऐसे रिकार्ड बिहार में कायम हो चुके हैं जिनका उदाहरण दुर्लभ है. नीतीश कुमार की अगुवाई में जिस तरह सत्ताबदल हुई, उसकी तुलना में दलबदल तो कम ही घातक लगने लगा है. जदयू की निगाह राजद के अनेक नेताओें पर है.

जिन्हें चुनाव के पहले वह अपनी ओर करना चाहता है. बिहार के चुनाव में जाति का एक बड़ा कारक है. दलों के निशाने पर सामाजिक समीकरण को अजेय बनाने की प्रवृति हावी है. कोरोना ने बिहार की कमर तोड़ दी है. बावजूद चुनाव आयोग कह चुका है कि चुनाव तय समय पर ही होंगे. राजद और कुछ अन्य दलों के विरोध के बावजूद चुनाव आयोग चुनाव कराना चाहता है.

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राजद नेता तेजस्वी यादव मांग कर चुके हैं कि लाशों की ढेर पर चुनाव नहीं हो. जदयू किसी भी सूरत में राष्ट्रपति शासन नहीं चाहता है. जबकि भाजपा ने इस सवाल पर बीच का रास्ता अपना रखा है.

मांझी की एनडीए में वापसी लगभग तय मानी जा रही है. उपेंद्र कुशवाहा विपक्षी गठबंधन की एकता को बना रखने के लिए प्रयासरत हैं. लेकिन मांझी नहीं मान रहे हैं. अगले कुछ दिनों में तय होगा कि वे किसके साथ रहेंगे. हालांकि उनके रुझान से स्पष्ट हैं कि वे एनडीए के साथ जाने की तैयारी कर चुके हैं.

लोजपा के तमाम विद्रोही तेवर के बावजूद उनकी कोशिश अधिक से अधिक सीट हासिल करने की है. प्रेक्षक मानते हैं कि चिराग पासवान की भाषा तल्ख जरूर है, लेकिन वे शायद ही एनडीए से अलग होने का जोखिम लें. क्योंकि उनके पिता रामविलास पासवान केंद्र में मंत्री हैं. और मौसम को पढ़ने में माहिर रामविलास पासवान सरकार से अलग होने का साहस नहीं कर सकेंगे.

कोरोना और लॉकडाउन के बाद बाढ़ प्रबंधन में बिहार सरकार का प्रबंधन सवालों के घेरे में है. नीतीश कुमार एकबार फिर सत्ता में वापसी के लिए दूसरे दलों को कमजोर करने में लगे हैं. उनके सामाजिक आधारों में दरार डालने में लगे हैं. हालांकि इस समय नागरिक कानून के विरोध के आंदोलन की चर्चा नहीं हो रही है. लेकिन बिहार के चुनाव पर इसके असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

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