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मोहन भागवत से मिले जर्मन राजदूत , विवाद होने पर कहा,  पसंद करें या ना करें, आरएसएस  जन आंदोलन

जर्मन राजनयिक के संघ मुख्यालय जाने से नाराज अमेरिका के दक्षिण एशिया मामलों के स्कॉलर पीटर फ्रेडरिक ने एक ऑनलाइन याचिका दायर की

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NewDelhi : भारत में जर्मनी के राजदूत  वाल्टर लिंडनर ने कहा है कि आरएसएस  एक जन आंदोलन है. आप इसे पसंद करे या ना करें. आरएसएस के सरसंघ चालक मोहन भागवत से मुलाकात के बाद विवाद बढ़ने पर जर्मन राजनयिक वाल्टर लिंडनर ने  यह बात कही, जान लें कि  लिंडनर 16 जुलाई को नागपुर गये थे. लिंडनर नागपुर में जर्मनी के सहयोग से चल रही मेट्रो परियोजना की प्रगति का निरीक्षण करने पहुंचे थे. जर्मनी इस परियोजना में वित्तीय मदद दे रहा है.

जर्मन राजनयिक ने द हिंदू से बातचीत  के क्रम में  आरएसएस को भारत का एक जन आंदोलन करार दिया.  उन्होंने कहा कि नागपुर में आरएसएस मुख्यालय की यात्रा भारतीय विविधता को समझने का एक हिस्सा थी.  खबरों के अनुसार जर्मन राजनयिक के संघ मुख्यालय जाने से नाराज अमेरिका के दक्षिण एशिया मामलों के स्कॉलर पीटर फ्रेडरिक ने एक ऑनलाइन याचिका दायर की. इसमें वाल्टर लिंडनर को इस्तीफा देने और वापस बुलाने की मांग की गयी थी. ।  इस याचिका पर 1000 लोगों ने हस्ताक्षर किये थे.

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मैं संघ के बारे में जानकारी हासिल करना चाहता था

वाल्टर लिंडनर ने कहा कि नागपुर यात्रा के दौरान मैंने संघ मुख्यालय जाने और संघ प्रमुख मोहन भागवत से मिलने का निर्णय किया. उन्होंने कहा कि मैं संघ के बारे में जानकारी हासिल करना चाहता था. मैंने संघ के बारे में बहुत सकारात्मक और बहुत ही नकारात्मक लेख पढ़े थे. इसमें फांसीवाद के आरोप से लेकर सामाजिक संलग्नता तक शामिल है. मैं इस बारे में बहुत कुछ जानना चाहता था, इसलिए मैंने मोहन भागवत से कई सवाल पूछे.

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वाल्टर लिंडनर ने कहा कि मैंने कट्टरवाद को लेकर भी कई सवाल पूछे, इन सवालों के जवाब इतने आसान नहीं थे.  लिंडनर ने कहा,  आएसएस भारत की बनावट का हिस्सा है. आप इससे इनकार नहीं कर सकते कि यह एक जन आंदोलन है और आप इसे पसंद करे या ना करें.

इससे पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को शनिवार एक कार्यक्रम में कहा कि संस्कृत को जाने बिना भारत को पूरी तरह से समझना मुश्किल है.  देश में सभी मौजूदा भाषाएं, जिनमें आदिवासी भाषाएं भी शामिल हैं, कम से कम 30 प्रतिशत संस्कृत शब्दों से बनी हैं.  भागवत ने कहा कि यहां तक कि  डॉ आंबेडकर ने भी इस बात पर अफसोस जताया था कि उन्हें संस्कृत सीखने का अवसर नहीं मिला.

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