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बीमारी की एक्युरेट जानकारी देगी जिनोम सीक्वेंसिंग मशीन, रिम्स में लगने का रास्ता साफ

Vivek Sharma

Ranchi : राज्य के सबसे बड़े हॉस्पिटल रिम्स में जिनोम सीक्वेंसिंग मशीन लगने का रास्ता साफ हो गया है. वहीं जल्द ही मशीन रिम्स में इंस्टाल भी हो जायेगी. फिलहाल कोरोना की तीसरी लहर कमजोर पड़ गयी है. ऐसे में मशीन का इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर कोरोना के नये वैरिएंट का पता लगाने में किया जायेगा. कोरोना की टेस्टिंग के लिए जरूरत न पड़े तो इसका इस्तेमाल अन्य बीमारियों का पता लगाने में किया जा सकेगा. इतना ही नहीं किसी भी बीमारी की जानकारी मशीन से एक्युरेट मिलेगी. जिससे डॉक्टरों के लिए इलाज करना आसान होगा.

नेक्स्ट जेनरेशन सीक्वेंसिंग मशीन

जेनेटिक बीमारियों का पता लगाने के लिए फिलहाल सैंपल दिल्ली, बेंगलुरु और कोलकाता भेजे जाते हैं. इसमें टाइम के साथ खर्च भी काफी होता है. वहीं बीमारी भी बढ़ चुकी होती है. अब झारखंड में नेक्स्ट जेनरेशन जिनोम सीक्वेंसिंग मशीन के लग जाने से तत्काल जींस की टेस्टिंग होगी और पता लगाया जा सकेगा कि बीमारी कितनी गंभीर है. वहीं इसे कंट्रोल करने में भी सीक्वेंसर का रोल अहम हो जायेगा.

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बच्चों को मिलेगी राहत

जन्म के बाद ही बच्चों को कई तरह की बीमारियां चपेट में ले लेती हैं. जिन्हें इग्नोर करने या प्रॉपर इलाज नहीं होने से बीमारी बढ़ जाती है और कई बार तो जीवन भर बीमारी के साथ बिताने की नौबत आ जाती है. ऐसे में बच्चों की जींस की जांच कर पता लगाया जायेगा कि उन्हें क्या समस्या है.

इसके बाद डाइट कंट्रोल को फॉलो करते हुए बच्चे को बीमारी से होनेवाले नुकसान से बचाया जा सकता है. वहीं उनकी बीमारी ठीक हो जायेगी.

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टेस्ट से तय होगी दवा

मशीन में टेस्ट के बाद यह पता लगाया जायेगा कि बॉडी में बीमारी की एक्युरेसी कितनी है. इसके आधार पर डॉक्टर दवाएं और उसका डोज प्रेसक्राइब करेंगे. अगर कोई दवा सूट नहीं करती है तो टेस्टिंग कर उसे बंद कर दिया जायेगा कि जिससे कि उस आर्गन को और ज्यादा नुकसान न हो.

चूंकि अभी ब्लड टेस्ट से बीमारी का तो पता चल जाता है लेकिन उन्हें दवा कितनी मात्रा में दी जाये और कौन सी दी जाये इसे लेकर डॉक्टर भी थोड़ा परेशान हो जाते हैं. लेकिन सीक्वेंसर से टेस्ट के बाद यह भी तय किया जा सकेगा कि किस मरीज को कौन सी दवा देनी है.

इस मामले में बायोकेमेस्ट्री की प्रो डॉ अनूपा प्रसाद ने बताया कि अभी कोविड खत्म नहीं हुआ है. अगर कोई नया वैरिएंट आता है तो हम उसका पता लगा सकेंगे. इसके अलावा जेनेटिक बीमारियों के लिए सीक्वेंसर काफी अहम होगा और इलाज भी बेहतर हो सकेगा.

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