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गढ़वा: विकास की राह ताक रहा आदिम जनजाति कोरवा परहिया का यह गांव

  • सड़क से लेकर पेयजल का घोर अभाव

Palamu/Garhwa: पलामू प्रमंडल के गढ़वा जिले में आदिम जनजातियों की बड़ी आबादी निवास करती है. झारखंड अलग राज्य बनने के 20 वर्ष बाद भी ऐसी जातियों के लोगों और उनके गांवों का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है.

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ऐसे में धीरे धीरे इनकी संख्या घट रही है. सरकार ने इनके संरक्षण की घोषणा कर रखी है. कई प्रकार की योजनाएं चलायी जा रही हैं. लेकिन इसका लाभ उन तक नहीं पहुंचता.

गढ़वा जिले के मेराल प्रखंड के चामा पंचायत के कुसमही गांव में आदिम जनजाति कोरवा परहिया के लोग निवास करते हैं. यहां उनकी अच्छी खासी आबादी है. उनका यह गांव आज भी विकास की राह ताक रहा.

यहां सरकार की किसी योजना का लाभ आदिम जनजातियों को नहीं मिलता. सड़क, पेयजल, रोजगार, पेंशन जैसी मुलभूत सुविधाओं से ये वंचित हैं. रोजगार के लिए यहां के लोग जंगल से लकड़ी काटकर और उसे सुखाकर और बाजार में बेचने का कार्य करते हैं.

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पगडंडियों के सहारे पहुंचते हैं गांव में


कुसमही गांव में आज तक एक भी सड़क का निर्माण नहीं हुआ है. पगडंडियों के सहारे इस गांव में पहुंचा जा सकता है. चामा पंचायत मुख्यालय से महज 4 किलोमीटर दूर इस गांव में बाइक से जाने पर एक घंटा लगता है. उबड़ खाबड़ रास्ते और उसमें बने 2 से 3 फीट के गड्ढे जान जोखिम में डाल देते हैं.

आवास के अभाव में झोपड़ी में रहते हैं लोग

ग्रामीणों ने कहा कि उन्हें अभी तक आवास भी नहीं मिला है. सूची में 3 साल पहले से ही नाम दर्ज है, लेकिन अभी भी आवास की प्रतीक्षा कर रहे हैं. आवास के अभाव में झोपड़ी में रहना पड़ता है.

ठेकेदार करते हैं मनमानी

ग्रामीणों ने कहा कि एक डैम में मजदूरी की थी. उस मजदूरी का अभी तक पैसा नहीं मिला है. यहां रोजगार मिलता है तो उसमें से हमलोगों का ही हिस्सा मार दिया जाता है. मजदूरी का भुगतान नहीं हो पाता. बड़े बड़े ठिकेदार काम करा कर भाग जाते है. पैसा भी नहीं देते हैं. यहां पर ना तो बुजुर्ग को पेंशन मिलता है ना ही दिव्यांग को. बुजुर्ग, दिव्यांग और विधवा पेंशन स्वीकृति के लिए प्रखंड, अंचल व जिला कार्यालय का चक्कर काटकर थक गये हैं.

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 गर्मी के दिनों में चार किलोमीटर दूर से लाते हैं पानी

गांव में पानी की समस्या बहुत ज्यादा है. गर्मी के दिनों में स्थिति विकराल हो जाती है. 4 किलोमीटर दूर से पानी लाकर प्यास बुझानी पड़ती है. मरम्मत के अभाव में गांव के कई चापाकल वर्षों से खराब पड़े हैं. सरकार तो वादे तो करती है, लेकिन वादे उनके तक पहुंच पाते. उनके विकास के लिए कई योजनाएं सरकार ने चलायी, लेकिन धरातल पर आज तक एक भी योजनाएं नहीं दिखती.

स्थिति की जांच कराकर दिया जायेगा योजनाओं का लाभ

गढ़वा के कल्याण पदाधिकारी सुभाष कुमार ने कहा कि उन्हें इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है. अगर ऐसा मामला है तो गांव में स्थिति की जांच कर विकास योजनाओं का लाभ जरूरमंदों को दिलाया जायेगा.

गांव की स्थिति और लोगों से मिली जानकारी से स्पष्ट होता है कि आदिम जनजातियों के विकास के लिए किये जा रहे सरकारी दावे यहां आकर फेल नजर आते हैं. मनरेगा से रोजगार देने के दावे की भी पोल खुलती है. मुलूभूत सुविधाओं के लिए यहां के लोग तरस रहे हैं. मजदूरी करने के बाद भुगतान तक नहीं हो रहा है.

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