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गढवा: उपेक्षा का दंश झेल रहा आदिम जनजाति कोरवा, टूटे फूटे घरों में रहने को विवश

Dilip Kumar  

 Palamu/Garhwa : पलामू प्रमंडल के गढ़वा जिले में आदिम जनजाति कोरवा समाज के लोग उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं. स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ जिला प्रशासन और सरकार की अदूरदर्शिता के कारण उनकी फटेहाल स्थिति है. टूटे फूटे घरों में वे जहां रहने को विवश हैं, वहीं उनके गांव में पहुंच पथ तक का अभाव है.

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कोरवा जनजाति का गांव.

रसोई गैस सिलेंडर घर में शोभा की वस्तु बने हुए हैं. गैस भराने तक के पैसे नहीं है. पेजयल के लिए उन्हें आधा किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. अगर कोई बीमार पड़ जाए तो उसे मुख्य सड़क तक ले जाने के लिए खटिया का सहारा लेना पड़ता है.

90 कोरवा जनजाति के हैं घर

गढवा के मेराल प्रखंड के कुसमही गांव में कोरवा जाति के लोग अभी भी विकास की पटरी पर लौटने के इंतजार में हैं. कुसमही गांव में 90 कोरवा जाति के घर हैं जिसमें 10 लोगों को ही सरकारी आवास योजना का लाभ मिला है.

अन्य लोग पुराने कच्चे मकान में रहने को विवश हैं. बरसात के दिनों में उनकी परेशानी काफी बढ़ जाती है. एक कमरे में परिवार के तीन से चार सदस्य रहते हैं. बारिश होने पर पूरी रात जागकर समय काटना पड़ता है.

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गैस सिलेंडर भराने तक के पैसे नहीं

कोरवा जाति के लोगों ने बताया कि हमलोग अनपढ़ हैं. हमलोगों पर प्रशासन और सरकार का कोई ध्यान नहीं रह गया है. सरकार हमलोगों से मुँह मोड़ ली है. लॉकडाउन में लगातार काम (मजदूरी) नहीं मिलने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा खराब हो गयी है. जनवितरण के दुकानदार से राशन तो मिलता है, लेकिन गैस भराने के पैसे नहीं रहने के कारण सिलेंडर पड़े रहते हैं.

गिने-चुने लोगों को मिला आवास

आवास योजना का लाभ गिने चुने लोगों को ही मिला. 90 लोगों के घर के बीच में मात्र 10 ही लोगों को आवास मिला है. बाकी लोग जैसे तैसे गुजारा करते हैं. मकान क्षतिग्रस्त हो जाने की स्थिति में गांव वाले मिल कर चंदा करते हैं, उसी से घर की मरम्मत करते हैं. यह सिलसिला लंबे समय से चलता आ रहा है.

झोपड़ीनुमा घर में रहते हैं पांच सदस्य

गाँव की गुड़िया देवी ने बताया कि उसके पास घर नहीं है. रहने में बहुत दिक्कत होती है. उसके घर में कुल 5 सदस्य रहते हैं. उनको बहुत पहले 35 हजार वाला आवास योजना का लाभ मिला था, जो टूट कर गिर चुका है. झोपड़ीनुमा घर में बरसात के दिनों में पानी टपकता है. कभी-कभी पानी खटिया के आस पास फैल जाता है.

आधा किलोमीटर दूर से लाते हैं पानी

आवास और आर्थिक परेशानी की तरह पानी की समस्या भी इस गांव में बनी हुई है. गांव के लोग आधा किलोमीटर दूर जाकर पानी लाते हैं. गर्मी के दिनों में उनकी परेशानी काफी बढ़ जाती है.

गांव में नहीं है पहुंच पथ

गांव तक पहुंचने के लिए पहुंच पथ का अभाव है. सड़क के अभाव में स्वास्थ्य की समस्या बढ़ जाती है. बीमार पड़ने पर लोगों को खटिया पर टांग कर अस्पताल तक ले जाना पड़ता है. कुसमही से गोबरदाहा तक खटिया पर मरीज को लाने के बाद उन्हें पक्की सड़क नसीब होती है.

यहां से टेम्पो या दो पहिया वाहन से मरीज को गढ़वा अस्पताल ले जाया जाता है. गोबरदाहा गांव में लाखों रुपए खर्च करके स्वास्थ्य उपकेंद्र बनाया गया है, लेकिन यह हाथी दांत की तरह है. निर्माण के बाद से अबतक किसी चिकित्सक या चिकित्साकर्मियों ने यहां सेवा नहीं दी है.

स्थिति देखने नहीं आते पदाधिकारी

ग्रामीणों ने कहा कि उनकी फटेहाल स्थिति देखने के लिए कोई पदाधिकारी नहीं आते. उन्हें लगता है कि गांव में पदाधिकारियों के नहीं पहुंचने का मुख्य कारण सड़क और पहाड़ी इलाका है. उनके गांव तक चार पहिया वाहन तो दूर साइकिल तक पहुंच पाती.

ऐसे में पदाधिकारियों को लगता है कि उन्हें गांव में जाने के लिए पैदल चलना पड़ेगा. मुखिया का भी सहयोग अपेक्षित नहीं रहा है. मकान बनाने के लिए मापी कर गए तो पुनः आए ही नहीं. पढ़े लिखे नहीं रहने के कारण उन्हें पता नहीं चलता कि उनके विकास के लिए कौन कौन सी योजनाएं चल रही हैं.

विदित हो कि कोरवा, परहिया सहित अन्य आदिम जनजातियां झारखंड में संरक्षित हैं. उनके गांवों के विकास के साथ साथ जनजातियों के उत्थान के लिए कई तरह की योजनाएं चलायी गयी हैं, लेकिन कुसमही गांव में कोरवा जाति के लोगों की स्थिति को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि इनके लिए संचालित योजनाओं की कैसी स्थिति है?

क्या कहते हैं जिम्मेदार

गढ़वा के जिला कल्याण पदाधिकारी सुभाष कुमार ने बताया कि आदिम जनजातियों को आवास देने के लिए बिरसा आवास योजना संचालित है. इस वर्ष का लक्ष्य सरकार स्तर से मांगा गया है.

इसके लिए बीडीओ को एक सप्ताह में सूची देने का निर्देश दिया गया है. इसके अलावा ग्राम विकास की योजनाएं हैं. प्रखंडों से प्रस्ताव मांगा गया था. प्रस्ताव आ गया है. उसे जिला स्तर पर अनुमोदित करके इसकी स्वीकृति दिलायी जाएगी.

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