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कुलपति से ज्यादा आरोपपति रहे हैं गंगाधर पंडा, पत्नी और बेटे की नियुक्ति में भी धांधली करने का लगा आरोप

Sanjay Prasad

Jamshedpur: कोल्हान विवि के कुलपति गंगाधर पंडा जहां भी रहे विवादों में रहे. संपूर्णानंद संस्कृत यूनिवर्सिटी वाराणसी में फर्जी डिग्री को लेकर दोषी पाये जाने के बाद उनके पुराने मामले उजागर हो रहे हैं. 2005 में उनकी पत्नी डॉ.प्रमोदिनी पंडा की नियुक्ति संपूर्णानंद संस्कृत विवि में प्राध्यापिका पर हुई थी. 9 साल बाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया. पंडा पर आरोप लगा कि जब उनकी पत्नी की नियुक्ति विवि में हुई, तब वे संपूर्णानंद संस्कृत विवि में कुलसचिव के पद पर कार्यरत थे और उन्होंने अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल किया. संस्कृत विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो. बिंदा प्रसाद मिश्र की अध्यक्षता में हुई कार्य परिषद की आपात बैठक के बाद 12 जनवरी 2005 को गठित चयन समिति की संस्तुति को विवादित ठहराते हुए डॉ. प्रमोदिनी की चयन प्रक्रिया को निरस्त करने और इस पद के लिए नए सिरे से विज्ञापन जारी करने का निर्णय लिया गया था. दाखिल याचिका रविशंकर बनाम स्टेट बैंक आफ इंडिया, यूपी पर उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा दिए गए आदेश के अनुपालन में कुलपति ने कार्य परिषद की आपात बैठक बुलाकर यह निर्णय लिया था. उल्लेखनीय है कि फर्जी डिग्री मामले में यूपी एसआईटी ने पंडा समेत संपूर्णानंद यूनिवर्सिटी के 17 अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ प्राथमिकी दायर की है. पंडा फिलहाल कोल्हान विवि चाईबासा में कुलपति के पद पर है. अभी उनका कार्यकाल 10 माह बाकी है. अब सबकी नजरें राज भवन पर टिकी है कि इस मामले को लेकर राजभवन क्या करता है?

बेटे की नियुक्ति को लेकर भी विवाद
यही नहीं जगन्नाथ संस्कृत विवि ओडिशा के कुलपति पद पर रहते हुए भी गंगाधर पंडा पर 2014 में आरोप लगा कि उन्होंने अपने बेटे निवास पंडा को उसी विवि के ज्योतिष विभाग में नियुक्ति को लेकर अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया. जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय (एसजेएसवी) के संविदा शिक्षकों के एक समूह ने संस्थान में स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति में अनियमितता का आरोप लगाया था. विश्वविद्यालय प्रशासन पर अद्वैत वेदांत विभाग के लिए व्याख्याताओं के चयन में आयु मानदंड का उल्लंघन करने का आरोप था. संविदा शिक्षकों ने आरोप लगाया कि जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय को छोड़कर राज्य सरकार द्वारा संचालित सात विश्वविद्यालयों में से किसी में भी व्याख्याताओं की नियुक्ति के लिए आयु मानदंड नहीं है. विवि ने रीडर्स, लेक्चरर और प्रोफेसर के पदों पर 20 फैकल्टी सदस्यों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन दिया था. व्याख्याता पद के लिए न्यूनतम आयु सीमा 32 बताई गई थी जबकि उत्कल सहित अन्य विश्वविद्यालयों में ऐसा कोई मानदंड नहीं है. हालांकि पदों के लिए चुने गए अधिकांश उम्मीदवारों की आयु 32 वर्ष से अधिक थी. संविदा शिक्षकों का कहना था कि नौकरी के लिए नए उम्मीदवारों को चुने जाने के बजाय उन्हें स्थायी नियुक्ति प्रदान की जानी चाहिए. दूसरी ओर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति गंगाधर पंडा ने कहा था कि नियुक्ति चयन समिति और विश्वविद्यालय के सिंडिकेट के परामर्श से की गई थी.

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छात्र संघ नेता ने पंडा के पेंशन कटौती की मांग की थी
संपूर्णानंद संस्कृत विवि छात्र संघ के पूर्व उपाध्यक्ष अनुराग पांडेय ने भी पिछले साल 8 नवम्बर 2021 को कुलपति को पत्र लिखकर पंडा के फर्जी डिग्री में संलिप्तता को देखते हुए उनकी पेंशन कटौती की मांग की थी. उन्होंने वीसी को लिखे पत्र में कहा था कि गंगाधर पंडा एसआईटी की जांच में दोषी में पाए गए हैं. प्रो.पंडा का पेंशन विवि में प्रक्रियाधीन है. उन्होंने कहा था कि ऐसे मामले में विवि के कई लोगों के विरूद्ध जांच लंबित होने के कारण पेंशन में 25 फीसदी की कटौती की गई थी. ऐसे में इन्हें पूरा पेंशन देना वित्तीय अनियमितता होगी.

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