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सवर्ण आरक्षण से बीजेपी एक बार फिर दिखा रही सपना

Faisal Anurag 

भारत की राजनीति 1990 की तरह एक बार फिर आरक्षण के सवाल पर केंद्रित हो गयी है और लोकसभा चुनाव का एक प्रमुख मुद्दा बन गया है. यह संदेश साफ हो जाने के बाद की तीन राज्यों के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की नारजगी से उभरे हालात को अपने पक्ष में करने के लिए भाजपा ने इस आरक्षण का दामन थाम लिया है. इसमें किसी को न्याय देने से ज्यादा अपने वोट आधार को संदेश देने का प्रयास साफ नजर आता है.

भाजपा के नेताओं ने संसद के दोनों सदनों में जिस तरह इसे चुनावी जीत का मंत्र बताया है और जिस तरह प्रधानमंत्री का स्वर भी इसी को हवा दे रहा है, इससे लगता है कि देश में 2014 के वायदों को पूरा करने की विफलता को भारतीय जनता पार्टी अपने इस कदम से एक और बार सपना दिखा रही है. हालांकि दूसरे प्रमुख दलों ने अपनी आपत्तियों के बावजूद इस संविधान संसोधन का साथ देकर भाजपा की पहल में अपनी भी दावेदारी उस वोट आधार में किया है, जिसके लिए भाजपा ने इस कदम को उठाया है. अनेक न्यायविद इस संशोधन को न केवल संविधान की मूल भावना के विपरीत बता रहे हैं, बल्कि इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्य संविधान पीठ के फैसले का हवाला दे इसे गलत बता रहे हैं. यह तो तय है कि यह मामला न्यायिक समीक्षा का हिस्सा बनेगा लेकिन चुनाव तक इसे लेकर जिस राजनीति की संभावना बनी है वह आरक्षण के सवाल को तीखा बनायेगी.

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केंद्र सरकार ने जिस तरह सवर्ण गरीब की परिभाषा इस संसोधन में तय की है, उसके दायरे में सवर्ण  का 97 प्रतिशत हिस्सा शामिल हो जायेगा. पिछले चार सालों के रोजगार के आंकड़े बताते हैं कि न केवल वे सीमित हुए हैं, बल्कि केवल 2018 में ही 1 करोड़ 10 लाख रोजगारविहीन हो गये हैं. इसी तरह अभी सरकारी नौकरियों में 25 लाख आरक्षित पद खाली पड़े हुए हैं, जिनपर एसटी,एससी और ओबीसी का दावा है. 10 प्रतिशत आरक्षण के साथ ही दो सवाल प्रमुख से पब्लिक डोमेन में उठ रहे हैं. पहला यह कि देशभर में पिछड़ों की आबादी 56 प्रतिशत के लगभग है और अब वे अपने 27 प्रतिशत के आरक्षण दायरे को बढ़ाकर 54 प्रतिशत किये जाने की मांग कर रहे हैं. दूसरा जाति जनगणना कराकर सभी जातियों को आबादी के साथ हिस्सा देने की मांग. अब जबकि 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है,  इसके टूट जाने के बाद आरक्षण सीमा के और विस्तार की मांग बढ़ेगी ही. देश के अनेक इलाकों में अनेक जातियों के लोग आरक्षण की मांग कर रहे हैं. दस प्रतिशत आरक्षण में गरीब होने की जो समय सीमा तय की गयी है, वह न केवल भारत में गरीबी रेखा के मानदंड को लेकर बहस को तेज करेगा, बल्कि वास्तविक गरीब कौन है, इसे लेकर विवाद भी बढ़ायेगा. आरक्षण का लाभ मध्यवर्ग तक ही सीमित रह जाने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है.

इस तरह के अनेक सवालों के बीच भारत में आरक्षण और सामाजिक न्याय की प्रक्रिया को पलटने की बात भी उभर कर सामने आ गयी है. सामाजिक न्याय का विचार इन ऐतिहासिक वंचनाओं को  खत्म कर समान प्रतिनिधित्व देने पर केंद्रित है. इसका अर्थ साफ है कि भारत में अनेक ऐसी जातियां हैं, जो सामाजिक अन्याय और वंचना का शिकार रही हैं और लोकतंत्र उनकी वंचनाओं को खत्म कर प्रतिनिधित्व देने की प्रक्रिया का हिस्सा बनने की बात कर रहा है. इसमें सामाजिक वंचना ही महत्वपूर्ण है. सवर्ण आरक्षण इस पूरी अवधारणा का निषेध करता है. संविधान सभा की बहसों में साफ है कि संविधान निर्माता इस तरह की वंचना के खिलाफ थे और इसीलिए नौकरियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण देने का विधान बनाया था. राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो शुरू में केवल दस सालों के लिए ही था, लेकिन भारत के हालात को देखते हुए इसे अब तक विस्तारित किया गया है. लेकिन नौकरियों में आरक्षण की कोई समय सीमा संविधान ने तय नहीं की है. वर्तमान संशोधन इस अवधारणा को उलट रहा है और यह एक ऐसा सवाल है जो भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनाव में घाटा भी पहुंचा सकता है. बहुजन तबकों के बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया इसका संकेत दे रही है कि आरक्षण और सामजिक न्याय का सवाल व्यापक आंदोलन को जन्म दे सकता है.

1990 में नरसिम्हा राव की सरकार ने भी 10 प्रतिशत आरक्षण सवर्ण गरीबों को देने का जो प्रस्ताव किया था, उसी के बाद सुप्रीम कोर्ट का कड़ा फैसला आया और अनेक राज्य सरकारों के भी इस तरह के प्रयास को न्यायिक समीक्षा में नकारा जा चुका है. जाहिर है कि आरक्षण की बुनियाद ऐतिहासिक वंचना और प्रतिनिधित्व के अभाव की बुनियादी धारणा पर है. वर्तमान संसोधन इन दोनों ही धारणाओं को नकारता है. अमरीका, अफीका और आस्ट्रेलिया में भी विशेष अवसर का सिद्धांत वास्तव में ऐतिहासक वंचना के अपराध को खत्म करने के लिए ही अस्तितिव में आया है. गणतंत्र और संविधान की आत्मा वास्तव में यही है भी.

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