Citizen Journalist

#Facebook वॉल से –  मैं देवघर का टॉवर चौक हूं

Kumar Awdhesh

मुझे पहचाना……., गुमसुम, डरा और सहमा सा खड़ा मैं देवघर का उपेक्षित टॉवर हूं. मेरे कारण ही इस स्थान को तुम टॉवर चौक कहते हो.

हां मैं ऐतिहासिक नहीं हूं, मगर तुम्हारे शहर की धरोहर जरूर हूं. तुम्हारे शहर का बरगद जरूर हूं. तुम्हारे शहर की दूसरी सबसे बड़ी पहचान जरूर हूं.

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तुम मानो या ना मानो, तुम्हारा स्वाभिमान हूं. तुम्हारा अभिमान हूं. जिससे तुम चाह कर भी मुंह नहीं फेर सकते हो.

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हां मैं वर्षों से शांत खड़ा हूं. तुम्हारी एक-एक हलचल का मूक प्रहरी हूं. तुम्हारे प्यार और नफरत का गवाह हूं. तुम्हारे बदलाव का साक्षी हूं. शहर का निगहबान हूं.

मैं तब भी शांत था, जब मेरी जरूरत थी और मैं आज भी शांत खड़ा हूं. जब मेरी जरूरत को जबरन खत्म की जा रही है. ठीक वैसे, जैसे स्वार्थी बच्चों के लिए बुजुर्गों की जरूरत एकदम से खत्म हो जाती है. एकदम से भारतुल्य हो जाते हैं.

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मानता हूं मैं….मैं न ही तुम्हारे शहर का कोई ऐतिहासिक स्थल हूं और न ही कोई शहीद स्तम्भ.

न ही कोई सामरिक महत्व रखता हूं और न ही कोई यादगार चिन्ह हूं मैं.

मेरी गोद में न ही शहर का इतिहास है और न ही भूगोल.

महाशय फिर भी मैं ज़िंदा हूं. तुम्हारे और बाहर से आने वालों के लिए तटस्थ हूं. लोगों को राह दिखाने के लिए.  किसी को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए.

आज तक जो भी मेरी शरण में आया है, मैंने उसे भटकने नहीं दिया है. सदैव उसकी मदद की है. उसका इस्तेकबाल किया है.

मैं जानता था कि जब भी शहर का अहंकार मेरे कद से बड़ा हो जायेगा, उस दिन मेरा अस्तित्व समाप्त हो जायेगा.

मुझे ढाह दिया जायेगा. मुझे चूर दिया जायेगा. मुझे मिटा दिया जायेगा. मुझे गिरा दिया जायेगा. मुझे नेस्तनाबूद कर दिया जायेगा.

वैसे भी मैं ईंट, पत्थर, सुर्खी और चूने का एक संयुक्त ढांचा ही तो हूं.

बैद्यनाथ और आपके प्यार की वजह से ही वर्षों से तटस्थ खड़ा हूं.

हर भटके को मैंने सही राह दिखाया है. कभी किसी से कुछ मांगा नहीं और किसी से कभी कुछ लिया नहीं.

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मैंने बस प्यार किया है और प्रेम लुटाया है. मैंने सहारा लेने वालों से कभी नहीं पूछा की तुम कौन हो, कहां से आये हो. जो भी आया सबको अपनाया. सही जगह पहुंचाया.

तुम अगर मानो तो मैं केवल मात्र एक स्तम्भ नहीं हूं. बल्कि तुम्हारे शहर का पूरा ब्रह्मांड हूं.

मैं तुम्हारे प्यार का भी गवाह हूं. और तुम्हारे तिरस्कार का भी साक्षी हूं. मैंने बिना शिकवा शिकायत के तुम्हारे प्यार को भी गले लगाया है. और आज मैं तेरी नफरत को भी सह रहा हूं. तुम्हारे बहिष्कार को भी सिर माथे से लगाये खड़ा हूं.

मैं फिर भी खुश हूं. कम से कम तुमने मुझे ये तो एहसास कराया कि मैं अब तुम्हारी दिनचर्या में बाधक हूं. मेरे कारण तुम्हें रोज परेशानी होती है.

मैं अब खटकने लगा हूं. विकास मार्ग का रोड़ा बन गया हूं. मैं अब टाट का पैबंद बन गया हूं.

शुक्रिया देवघर.

मैं तो चला जाऊंगा मगर मेरे साथ-साथ आपकी कई खट्टी-मिठ्ठी यादें भी दफ्न हो जायेंगी.

किसी से मिलने की ख़ुशी तो किसी से बिछड़ने का गम अपने साथ ले जाऊंगा.

किसी के घंटों इंतज़ार की यादें ले जाऊंगा तो किसी के फोटो खींचने की क्लिक लेकर जाऊंगा.

किसी के जीवन से बारिश की छतरी तो किसी के सिर से धूप का साया साथ ले जाऊंगा.

तुम्हारे कई अरमान अपने साथ ले जाऊंगा. तुम्हारी मिठ्ठी और नमकीन मुस्कान साथ ले जाऊंगा.

हे देवघर,

जब सत्संग गेट टूटा था तो तुम तब भी खामोश थे. और आज तुम्हारी आत्मा को तुम्हारे शरीर से अलग किया जा रहा है, अब भी तुम खामोश हो.

मैं समझ नहीं पा रहा हूं तुम ज़िंदा हो या जीने की नक़ल कर रहे हो.

सिर्फ सांसों का चलना ही जीवन है, तो निश्चित ही तुम जी रहे हो. मगर भावनाएं तुम्हारी जरूर मर गयी हैं.

तुम आधुनिक भष्मासुर बनने के करीब हो. क्योंकि ज्यादा चकाचौंध की चाह में अपनी आंखें ही जलती हैं.

एक सवाल पूछता हूं मैं

क्या मैं आज इतना कुरूप हो गया हूं कि आज शहर के लिए कोढ़ बन गया हूं?

क्या मैं इतना अभागा हूं कि तुम्हारे जीवन का बाधक बन गया हूं?

क्या मुझे गिरा देने से तुम्हारी सारी समस्याओं का हल हो जायेगा?

क्या देवघर डरबन बन जायेगा?

क्या काशी को क्योटो बना दिया गया?

क्या काशी को त्रिशूल से उठा कर क्रॉस पर चढ़ा दिया गया?  नहीं न.

क्योंकि चार दिन विदेश घूम लेने से आप विदेशी नहीं हो जायेंगे. भारत विविधताओं से भरा है. और इसके हर शहर की अपनी एक अलग पहचान है. सबकी आत्मा है और निर्धारित पुष्ट शरीर है.

अगर शहर की मर्यादा को लेकर इतनी ही चिंता है तो कास्टर टॉउन, विलियम्स टॉउन और बम्पास टॉउन की भी चिंता करो.

हे देवघर

तुम बार-बार भूल जाते हो कि ये देवों का घर है. यहां की हर एक वस्तु ऐतिहासिक धरोहर है या फिर आध्यात्मिक पहचान है.

जिसे विकास के नाम पर ढाह-चूर रहे हो.

जब सब बदल ही दोगे तो फिर किस मुंह से इसे देवघर कहोगे.

इसे विकास घर कहोगे या फिर भूत घर कहोगे. ये तुम जानो.

अब तुम ज़िंदा हो या मर गये हो… ये तय तुम्हें करना है.

मैं इसका भी गवाह बनूंगा

तुम्हारा

गुमसुम, ठिठका, सहमा, डरा और उपेक्षित टॉवर

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