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पलामू प्रमंडल की नौ सीटों पर BJP के चार बागी मैदान में, कमल की राहों में बिछा सकते हैं कांटे

Dilip Kumar
Palamu: विधानसभा चुनाव के वास्ते सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने राजनीति के पटल पर जिस प्रकार की चुनावी बिसात बिछायी है, उससे उसे दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है. एक तरफ भाजपा को जहां अपने राजनीतिक विरोधियों का सामना करना पड़ेगा, वहीं दूसरी ओर उसे अपनों से भी दो-दो हाथ करना ‘पड़’ सकता है.

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पलामू प्रमंडल की नौ सहित कुल 13 सीटों पर पहले चरण में 30 नवंबर को मतदान होना है. लेकिन प्रमंडल की पांच सीटों पर भाजपा के चार बागी चुनाव मैदान में हैं. कमल के लिए उसके बागी राह में कांटे अटका सकते हैं.

चुनाव प्रचार शुरू

प्रथम चरण के लिए नामांकन प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है. भाजपा की सूची में अपना नाम न देखकर कई नेता बगावत पर उतर आये हैं. इनमें से भाजपा के चार असंतुष्ट नेताओं ने भी पार्टी बदलकर या निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन कापर्चा दाखिल कर दिया है. अब पांच विधानसभा क्षेत्रों में मुकाबला दिलचस्प हो गया है. शनिवार को नाम वापसी के बाद चुनाव चिन्ह मिलते ही चुनाव प्रचार ने भी जोर पकड़ लिया है.

भाजपा के बड़े नेताओं ने पाला बदला

टिकट से वंचित होने पर छतरपुर विधानसभा क्षेत्र (सुरक्षित) से भाजपा विधायक और मुख्य सचेतक राधाकृष्ण किशोर ने पार्टी छोड़ दी है. उन्होंने आजसू पार्टी के सिंबाॅल पर छतरपुर सीट के लिए नामांकन कर दिया है.

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बताया जाता है कि पार्टी की इंटरनल सर्वे रिपोर्ट, खराब कार्यकलापों और कार्यकर्ताओं की घोर उपेक्षा करने जैसे आरोपों के कारण उनका टिकट केन्द्रीय आलाकमान की रिपोर्ट के आधार पर काट दिया गया. उनके स्थान पर भाजपा ने पूर्व सांसद मनोज भुईयां की पत्नी पुष्पा देवी पर भरोसा किया है.

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आजसू से गठबंधन का फेरा, अंत में विनोद सिंह को दिया समर्थन

भाजपा की बहुचर्चित हुसैनाबाद सीट से पार्टी के युवा नेता एवं जिला परिषद के निवर्तमान उपाध्यक्ष विनोद सिंह पार्टी से टिकट पिछले चुनाव से चाह रहे थे, लेकिन भाजपा ने विनोद जैसे समर्पित एवं स्थापित नेता की उपेक्षा कर आजसू पार्टी के साथ समझौता करने के चक्कर में उनको टिकट नहीं दिया.

अब विनोद सिंह ने बगावती तेवर दिखाते हुए निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन पत्र भर दिया है. वर्तमान परिदृश्य में भाजपा-आजसू की समझौता वार्ता फेल हो गयी. बाध्य होकर भाजपा ने विनोद को गले लगाते हुए अपना समर्थन व्यक्त कर दिया है.

जिप उपाध्यक्ष संजय सिंह हुए बागी

अब पलामू जिले की राजधानी डालटनगंज विधानसभा क्षेत्र की भी कहानी है. इस सीट से जिला परिषद के वर्तमान उपाध्यक्ष संजय सिंह टिकट पाने के लिए हाथपैर मार रहे थे. संजय ने पूरे क्षेत्र में अपने धनबल पर कई कार्य किये. हजारों ग्रामीणों में कंबल बांटे, नये वस्त्र दिए. सड़क निर्माण में आर्थिक सहयोग दिया.

ये सेवाकार्य वह पिछले दस वर्षों से लगातार कर रहे थे, लेकिन भाजपा ने उनको तव्वजो नहीं दी. अंत में अपने सैकड़ों समर्थकों के दबाव में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पर्चा दाखिल कर दिया. अब देखिए डालटनगंज में चुनाव का क्या रंग होता है?

भवनाथपुर से अनंत प्रताप देव हुए बागी

गढ़वा जिले की भवनाथपुर सीट से नगर उंटारी के प्रतिष्ठित राज परिवार के युवा सदस्य अनंत प्रतापदेव ने भाजपा से विद्रोह करते हुए निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन पत्र दाखिल कर दिया है. नामांकन के वक्त भारी भीड़ देखकर देव के समर्थक बहुत उत्साहित हैं.

पिछला विधानसभा चुनाव 2014 में अनंत प्रतापदेव ने भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी के रूप मे लड़ा था और करीब 2600 मतों से पराजित हो गये थे. इस सीट से नौजवान संघर्ष मोर्चा के सुप्रिमो भानू प्रताप शाही ने जीत हासिल की थी.

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पहली जीत के प्रयास में भाजपा

अनंत पहले कांग्रेस में थे, लेकिन 2014 के विधानसभा चुनाव में ठीक नामांकन से दो दिन पूर्व उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया था. इस बार के चुनाव में वह एक सशक्त उम्मीदवार माने जा रहे हैं. निर्दलीय के रूप में क्या दम दिखाएंगे यह भविष्य बतायेगा?

यहां इस प्रसंग में दिलचस्प पहलू यह है कि भाजपा ने इस सीट पर भानूप्रताप शाही को टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा है. कई आरोपों से घिरे भानू क्या परिणाम लायेंगे यह तो भविष्य की गर्त में है. लेकिन उनके द्वारा किये गये ताबड़तोड़ विकास कार्य शायद उनको विजय का उपहार दे दें. भाजपा ने इस सीट पर कभी सफलता प्राप्त नहीं की थी. शायद इस बार भाजपा के अरमान पूरे हो जायें.

बैद्यनाथ भाजपा से हुए नाराज

लातेहार जिले की कुल दो सीटों में से एक लातेहार (अ.जा. सुरक्षित) से भारतीय जनता पार्टी ने झाविमो के वर्तमान विधायक प्राकश राम को टिकट थमा दिया है. प्रकाश राम मात्र एक माह पहले ही भाजपा में दाखिल हुए और उनको टिकट का आश्वासन पार्टी ने दिया था.

बैद्यनाथ इस क्षेत्र के विधायक और मंत्री रह चुके हैं. उनको आशा थी कि 2019 के विधानसभा चुनाव में उन्हें ही टिकट मिलेगा लेकिन निराशा उनके हाथ लगी, तो उन्होंने झामुमो के हेमंत सोरेन से हाथ मिला लिया. अब बैद्यनाथ झामुमो के प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में हैं.

हरेकृष्णा-रघुपाल साथ-साथ हैं

लातेहार जिले की मनिका सीट अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित है. इस सीट से वर्ष 2014 का चुनाव भाजपा के हरेकृष्णा सिंह ने जाता था. इस बार हरेकृष्णा को भाजपा ने टिकट नहीं दिया है जबकि क्षेत्र में उन्होंने अच्छा कार्य किया है.

भाजपा ने पिछले चुनाव में हरेकृष्णा सिंह के सहयोगी और क्षेत्र के कर्मठ नेता रघुपाल सिंह को टिकट थमा दिया है. लेकिन हरेकृष्णा भाजपा के निर्णय से नाराज नहीं हैं. न वह बगावत पर उतरे हैं. मतदाताओं का कहना है कि हरेकृष्णा सिंह भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी के साथ जनसंपर्क में लगे हुए हैं और हर गांव-घर में रघुपाल के साथ जाकर समर्थन की अपील कर रहे हैं.

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बागियों की पहली पसंद है आजसू पार्टी

चुनाव में अपने हित पूरा न होते देख विभिन्न दलों के नेताओं मे टिकट पाने की गारंटीयुक्त आशा के साथ पाला बदलने की होड़ लग गयी है. पाला बदल कर जाने वालों में अधिकांश दलबदलुओं की पहली पसंद है आजसू पार्टी. इसका कारण भी है क्योंकि भाजपा-आजसू में सीट बंटवारे को लेकर हुए समझौते का कोई निष्कर्ष न निकलने के कारण आजसू में कई वकैंसियां हैं.

भाजपा के 65 प्लस का सपना कैसे पूरा होगा?

कुल मिलाकर भाजपा प्रत्याशी की राह में बागी उम्मीदवार रोड़े अटकाने को तैयार हैं. ऐसे में भाजपा का 65 प्लस का सपना कैसे पूरा होगा, इस पर चिंतन की जरूरत है.

भाजपा हमेशा यह तर्क देती रही है कि इस वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में राज्य के 57 विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी आगे थी, इसलिए 65 प्लस का लक्ष्य हासिल करना कठिन नहीं है. भाजपा शायद यह भूल गयी है कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य की 14 में से 12 सीटें हासिल की थी और 60 विधानसभा क्षेत्रों में उसे बढ़त मिली थी.

इसके बावजूद वह केवल 37 सीटें ही जीत सकी थी. सहयोगी पार्टी आजसू की पांच सीटों के साथ भाजपा के बहुमत का आंकड़ा 42 तक पहुंच सकी थी. बाद में झाविमो के छह विधायकों को पार्टी में शामिल कराकर आंकड़े को 48 तक पहुंचाया गया था.

भाजपा के खाते में राज्य की 37 सीटें तब गयी थीं, जब पूरे देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुनामी चल रही थी. हालांकि मोदी की लोकप्रियता अब भी कम नहीं हुई है, लेकिन अब पहले वाली बात नहीं है. महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव इसके प्रमाण हैं.

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