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पूर्व जज का दावाः आलोक वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के सबूत नहीं, पद से हटाना जल्दबाजी में लिया गया फैसला

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New Delhi: सीबीआई विवाद में सुप्रीम कोर्ट के आलोक वर्मा को सशर्त फिर से बहाल किये जाने के बाद घटनाक्रम बड़ी तेजी से बदले. उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर हाई पावर सेलेक्ट कमेटी ने दो दिनों में ही आलोक वर्मा को पद से हटाते हुए उनका तबादला किया. फैसले का आधार भ्रष्टाचार के आरोप और सीवीसी की रिपोर्ट बताई जा रही है.

लेकिन रिटायर्ड जस्टिस एके पटनायक ने शुक्रवार को कहा कि ‘आलोक वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के कोई सबूत नहीं थे. सीवीसी ने जो कहा वो अंतिम शब्द नहीं हो सकता.’ उन्होंने आलोक वर्मा पर सेलेक्ट कमेटी के फैसले को जल्दबाजी में लिया गया फैसला बताया है.

 

सीवीसी इंक्‍वायरी को मॉनिटर कर रहे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज पटनायक ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि, ‘भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर आलोक वर्मा के खिलाफ कोई सबूत नहीं था. जबकि, पूरी जांच CBI के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना की शिकायत पर की गई थी. मैंने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सीवीसी की रिपोर्ट में कोई भी निष्कर्ष मेरा नहीं है.’

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच को दो पेज की रिपोर्ट में जस्टिस पटनायक ने कहा कि सीवीसी ने मुझे 9 नवंबर, 2018 को राकेश अस्थाना द्वारा कथित रूप से हस्ताक्षरित एक बयान भेजा. मैं स्पष्ट कर सकता हूं कि राकेश अस्थाना द्वारा साइन किया गया यह बयान मेरी उपस्थिति में नहीं बनाया गया था.’

चयन समिति के फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए पूर्व जज ने कहा कि भले ही सुप्रीम कोर्ट ने फैसला लेने के लिए समिति को अधिकृत किया, लेकिन ये जल्दबाजी में लिया गया फैसला था.

उल्लेखनीय है कि भ्रष्टाचार के आरोप और सीबीआई के दो शीर्ष अधिकारियों के बीच की लड़ाई के बाद भारत सरकार ने जबरन दोनों को छुट्टी पर भेज दिया था. केंद्र के इस फैसले के खिलाफ आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, जिसपर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 77 दिनों बाद वर्मा को फिर से बहाल किया था. लेकिन उनके भविष्य को लेकर फैसला लेने के लिए हाई पावर सेलेक्ट कमेटी को अधिकृत किया था.

जिसकी बैठक के बाद आलोक वर्मा की बहाली के दो दिनों बाद ही सीवीसी ने उनके पद से हटाते हुए फायरब्रिगेड में उनका तबादला कर दिया. सीवीसी के तीन सदस्यों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जस्टिस एके सीकरी, आलोक वर्मा के पद पर निरंतर बने रहने के खिलाफ थे. वहीं लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपनी असहमति दर्ज कराई. हालांकि, इस फैसले के बाद आलोक वर्मा ने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया.

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