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पूर्व DGP आवास केसः कार्रवाई करने में जिला प्रशासन नहीं कर रहा सरकारी आदेश का पालन इसलिए हो रही देरी 

Akshay Kumar Jha

Ranchi: जिला प्रशासन की जांच में यह साफ हो चुका है कि पूर्व डीजीपी डीके पांडेय ने अपनी पत्नी पूनम पांडे के नाम पर जिस जमीन का म्यूटेशन कराया वो जीएम लैंड यानी सरकारी जमीन है. जिला प्रशासन की जांच में आरोप सच पाये जाने के बाद प्रशासन की तरफ से कार्रवाई शुरू कर दी गयी है.

कार्रवाई बीआरएल (Bihar Land Reforms) के फोर-एच के तहत की जा रही है. मामले में कांके सीओ ने 29 लोगों को तीन बार नोटिस भी भेज दिया है. लेकिन किसी नोटिस का कोई जवाब नहीं आया है और ना ही कोई सीओ की कोर्ट में हाजिर हुआ है.

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तीन बार नोटिस करने में करीब तीन महीने का समय निकल चुका है. फोर-एच के तहत की जाने वाली कार्रवाई में काफी देर होती है. इसका फायदा पूरी तरह से आरोपी को मिलता है. गिने-चुने ही ऐसे मामले में जिसमें गलत तरीके से की गयी जमाबंदी रद्द की गयी हो.

कार्रवाई करने में नहीं हो रहा सरकारी आदेश का पालन

बीएलआर एक्ट की इसी लेट-लतीफी को लेकर पांच जून 2016 को बतौर मुख्य सचिव राजबाला वर्मा ने सभी उपायुक्तों को एक चिट्ठी भेजी थी. चिट्ठी में कहा गया था कि ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं, जिसमें देखा जा रहा है कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने के लिए सरकारी कर्मियों और अधिकारी की मिलीभगत से जमीन का म्यूटेशन करा लिया जा रहा है.

ऐसे में वैसे सभी मामलों में प्रशासन मुस्तैदी से काम करें और जमाबंदी रद्द करें. राजबाला वर्मा ने फोर-एच के तहत होने वाले मामलों के लिए हर कर्मी और अधिकारी का एक टाइम टेबल तय किया.

नियम के अनुसार, गलत तरीके से कराये गये जमाबंदी को रद्द करने के लिए साक्ष्य जुटाने और भौतिक सत्यापन के लिए सीआइ के लिए दो सप्ताह का समय तय किया गया.

दो सप्ताह में सीआइ को सारे कागजातों की जांच कर सीओ को सौंप देना है. सीओ को भी दो हफ्ते में नोटिस देकर आरोपियों को अपने कोर्ट बुलाकर मामले का निबटारा दो हफ्ते के अंदर कर डीसीएलआर या एसडीएम को भेज देना है.

डीएसएलआर या एसडीएम के पास भी दो हफ्ते का टाइम होगा. वहां से मामला अपर समाहर्ता के पास जाएगा, उन्हें भी दो हफ्ते के अंदर सारा मामला निबटा कर डीसी के सुपूर्द कर देना है.

डीसी मामले को अपने पास सिर्फ एक महीना रख सकते हैं. एक महीने के अंदर उन्हें कार्रवाई के लिए आयुक्त को देना है. आयुक्त को सिर्फ एक सप्ताह में मामला सरकार तक पहुंचा देना है. सरकार के स्तर से 15 दिनों के अंदर कार्रवाई करनी है. यानि लगभग 115 दिनों में गलत तरीके से की गयी जमाबंदी रद्द हो जानी है.

लेकिन ऐसा सिर्फ तब हो सकता है, जब सरकार कार्रवाई करने की रुचि रखती हो और जिला प्रशासन तत्कालीन सीएस की तरफ से जारी किये सरकारी आदेश का पालन करता है.

लेकिन पूर्व डीजीपी डीके पांडेय के मामले में जिला प्रशासन ऐसा नहीं कर रहा है. मामले पर प्रशासन का कहना है कि हर नोटिस के बाद वो एक महीने का इंताजर करेंगे. सरकारी आदेश के पालन नहीं करने से समय की बर्बादी के साथ-साथ डीके पांडेय के साथ सभी आरोपियों को केस को प्रभावित करने का पूरा समय मिलेगा.

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डीके पांडेय का मामला है खास

मीडिया में लगातार पूर्व डीजीपी डीके पांडेय के चामा स्थित बन रहे आलीशान भवन की खबरें आने के बाद दबाव में सरकार की तरफ से डीसी रांची को जांच कराने का आदेश दिया गया. जांच के लिए जो टीम बनी उसमें कांके सीओ और डीसीएलआर शामिल थे.

अब फिर से फोर-एच के तहत कार्रवाई करने की शुरुआत अंचल स्तर से सीओ कर रहे हैं. चूंकि सीओ ने इससे पहले भी मामले की जांच की है तो सारे पहलुओं से वाकिफ हैं. वहीं जिस दूसरे अधिकारी के पास मामला जाना है वो है रांची के डीसीएलआर. वो भी जांच कमेटी में शामिल थे.

ऐसे में वो भी सारी पहलुओं से वाकिफ हैं. रांची अपर समाहर्ता और डीसी भी मामले से अच्छी तरह से वाकिफ है. ऐसे में अगर प्रशासन चाहे तो कार्रवाई सुनिश्चित है. लेकिन देखने वाली बात होगी ऐसा होता है या नहीं.

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