JharkhandOpinion

झारखंड में वनाधिकार कानून, सरकार के वादों-इरादों की राह रोक रही ब्यूरोक्रेसी

वनवासियों को पट्टे मिले, पर उन्हें जमीन पर असल में अधिकार नहीं मिला

सुधीर पाल

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की घोषणा की थी कि सरकार की पहली वर्षगांठ पर 20 हजार व्यक्तिगत और 2000 सामुदायिक वन पट्टों की सौगात वन आश्रित समुदायों को दी जाएगी. यह 2019 विधानसभा चुनाव के दौरान झारखंड की मौजूदा सरकार (यूपीए, झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस) द्वारा दिया गया वचन था कि आदिवासियों व अन्य परंपरागत वन निवासियों के साथ न्याय किया जाएगा. ज्यादा से ज्यादा लोगों और गांवों को वन पट्टा देने का वायदा था. 29 दिसम्बर को सभी जिलों में टेंट-कनात लगाकर कई योजनाओं की सौगात बांटी गयी और इसमें ही व्यक्तिगत और सामुदायिक वन पट्टे भी दिए गए.

झारखण्ड वन अधिकार मंच की मान्यता है कि यह नाकाफी है. पूरे राज्य में अब तक 2000 व्यक्तिगत पट्टे और 800 के आसपास सामुदायिक पट्टे दिए गए हैं. जो पट्टे दिए गए, उसमें जमीन का रकबा इतना नहीं है कि खेती-बाड़ी कर इससे आजीविका सुनिश्चित की जा सके. कम्युनिटी फॉरेस्ट रिसोर्स लर्निंग एंड एडवोकेसी (सीएफआर-एलए) की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड की कुल  81 विधानसभा सीटों में 62 विधान सभा सीटों पर वनाश्रित समुदायों का प्रभाव है.  इन 62 विधान सभा सीटों के 77 प्रतिशत वोटर वन-अधिकार कानून के तहत वन पट्टे के हक़दार हैं. इस अध्ययन के मुताबिक इन सीटों पर लगभग 74 लाख वोटर हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी परम्परागत तौर पर वन आश्रित हैं. लगभग 46 हजार एकड़ वन भूमि पर वन-अधिकार कानून के तहत इनका दावा बनता है. इन गांवों की संख्या लगभग 11 हजार है. इस कानून के लागू होने के 15 साल बाद भी पट्टा लेने वालों का आंकड़ा एक लाख तक नहीं पहुंच पाया है. अब तो लातेहार, पलामू, पश्चिम सिंहभूम, सिमडेगा, सहित एक दर्ज़न से ज्यादा जिलों में पट्टा वापसी के आन्दोलन ने जोर पकड़ लिया है.

वन अधिकार अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के दिए गए भाषणों में विजन तो नजर आया, लेकिन एक्शन उतना प्रभावी नहीं है. फारेस्ट ब्यूरोक्रेसी अब तक हावी है. जानकारी के मुताबिक़ कई जिलों में डीएफओ ने वन पट्टे पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया. लातेहार और दुमका में दर्जनों अधिकार पत्र तैयार हैं लेकिन डीएफओ द्वारा वन पट्टे पर हस्ताक्षर करने से इनकार किए जाने की वजह से वांछित लोगों को  वन पट्टे नहीं दिये जा सके हैं. विभाग के केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावेडकर वन कानून को वन आश्रित समुदायों के अस्तित्व के लिए जरूरी बताते हैं.

देश भर में वनाधिकार कानून के बेहतर अनुपालन के लिए केन्द्रीय वन मंत्री प्रकाश जावेडकर आदिवासी मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा के साथ सहमति  पत्र जारी करते हैं. दोनों मंत्रियों का साझा बयान आता है कि मात्र 8 फीसदी वन भूमि पर ही वनाश्रित समुदायों को उनका हक मिल पाया है.  इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जिस वन विभाग के मंत्री वनाधिकार कानून को आदिवासियों और वनाश्रित समुदायों का हक बताते हैं, उनके अदना अधिकारियों की हठधर्मिता के आगे सरकार घुटने टेक देती है. जैसे राष्ट्रपति की कलम से देश में कानून तो लागू हो जाता है लेकिन हश्र देखिये कि यह मामूली सिपाही के डंडे पर नाचता रहता है. बिलकुल उसी तरह वन अधिकारियों की जिद्द और हठधर्मिता के आगे वन अधिकार कानून बेमानी होकर रह गया है.

झारखंड का भौगोलिक क्षेत्र 79716 वर्ग किमी है, जिसमें वन क्षेत्र 23611.41 वर्ग किमी है और कुल क्षेत्रफल का 29.62 प्रतिशत राज्य में जंगल है. झारखंड जैसे ट्राइबल स्टेट में, जहां ट्राइबल का जीवन जंगलों पर निर्भर है. जंगल उनकी आजीविका का मुख्य स्त्रोत है. जहां सर्वे रिपोर्ट कहती है कि 40 प्रतिशत इनकी आजीविका का स्त्रोत जंगल है. जिनका 12 महीने में लगभग सात महीना जंगलों के बिना काम नहीं चल सकता है… वहां की हालत बेहद दुखद है.

आदिवासी आज भी अपने उन नैसर्गिक अधिकारों को पाने के लिए संघर्षरत हैं, जो उनसे छीन लिए गए हैं। वन अधिकार अधिनियम, 2006 के पारित होने के बाद ऐसी आशा जगी थी कि सदियों से आदिवासियों के साथ हो रहे अन्याय पर कुछ लगाम लगेगी। इस अधिनियम के अंतर्गत भूमि अधिकार देने में कई विभागों और मंत्रालयों और अनेक कानूनों की भूमिका रहती है। इस अधिनियम में वन अधिकारों को निम्न श्रेणियों में बांटा गया है: 1) व्यक्तिगत भू अधिकार  2) सामुदायिक भू अधिकार 3 ) आदिवासियों के लिए व ब) अन्य पारंपरिक वनवासियों के लिए। परन्तु ये अधिकार पाने की राह में कई विभाग और कानून रोड़ा बनते हैं. इस अधिनियम के अंतर्गत, किसी भी विकास परियोजना या औद्योगिक गतिविधि के लिए किसी भी बाह्य एजेंसी के लिए ग्राम सभा की पूर्व स्वीकृति लेना ज़रूरी है.

झारखंड वन अधिकार मंच के भय भंजन महतो का मानना है. वो कहते हैं, “राज्य में एफआरए कानून का ईमानदारी से पालन अबतक नहीं हो रहा है. क्योंकि इस कानून के तहत जिस ग्राम सभा को निर्णय लेना है, जो इस कानून के तहत निर्णय लेने के लिए सर्वोपरि है, उसका ब्योक्रेसी के द्वारा कोई रेस्पेक्ट नहीं किया जा रहा है. अब जिन्हें वन पट्टा दिया गया उनमें से बहुत सारे लोगों को ग्राम सभा के अनुशंसा को नजरअंदाज कर तीन से चार डिसमिल ही देकर निपटा दिया गया.”

इस ऐतिहासिक कानून के जरिए गांव की  सीमाओं के अन्तर्गत, वन भूमि और वहां के संसाधनों पर हर तरह का नियंत्रण, पारंपरिक रूप से जंगल में ही रहने वाले आदिवासियों और अन्य परम्परागत वन आश्रित समुदायों को दिया गया है. इससे पहले इस जमीन पर वन विभाग का कब्जा होता था. आदिवासी निजी और सामुदायिक स्तर पर अपने जंगल के संरक्षण एवं संवर्धन का मालिकाना हक हासिल कर सकते हैं. लघु वन उपजों का प्रबंधन और नियंत्रण यथा तेंदुपत्ता या बांस आदि समुदाय के हाटों इस कानून से हस्तांतरित होता है.

आदिवासी निजी और सामुदायिक स्तर पर अपने जंगल के संरक्षण का मालिकाना हक हासिल कर सकते हैं. छोटी मोटी वन उपज को बेच सकते हैं जैसे तेंदुपत्ता या बांस आदि. स्टडी बताते हैं कि आदिवासियों के लिए उपलब्ध किए जा सकने वाले वनक्षेत्र का 15 फीसदी महाराष्ट्र, 14 फीसदी केरल, 9 फीसदी गुजरात, 5 फीसदी ओडीशा, 2 फीसदी झारखंड, 1 फीसदी कर्नाटक में दिया जा सका है. देश भर में कुल तीन फीसदी वनक्षेत्र पर ही ये अधिकार मंजूर किये गये हैं.

झारखण्ड वनाधिकार मंच के संयोजक मण्डली के सदस्य जॉर्ज मोनापल्ली का मानना है कि झारखण्ड के किसे भी जिले में अभी तक प्रपत्र “ग” के पट्टे ग्राम सभाओं के नाम नहीं दिए गये हैं जबकि यह सबसे महत्वपूर्ण अधिकार हैं. यह कानून वन विभाग की जगह ग्राम सभा को वनों के प्रबंधन की जिम्मेवारी सौंपता है. कानून के तहत वन भूमि की प्रकृति में कोई बदलाव नहीं आता है. वन भूमि के पट्टे को ना हस्तांतरित किया जा सकता है और ना ही बेचा जा सकता है. लेकिन राज्य सरकारें इस कानून को खुले हृदय से लागू करने से कतराती आ रही हैं.

राज्य में एफआरए कानून का सही ढंग से लागू नहीं किया जाना भी एक बड़ी समस्या है. यह जब प्रमाणित हो गया है कि खनिज सम्पदा से लैस होने के बाद भी सामाजिक और आर्थिक विकास के संकेतक कमजोर लोगों के हितों  की हिफाजत नहीं कर सकता है तो वन अधिकार का बेहतर क्रियान्वन जरूरी हो जाता है. नीति आयोग 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य का हर दूसरा आदिवासी और हर पांच में दो अनुसूचित जाति के लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं. जबकि राज्य की गरीबी की दर 39.1 (बीपीएल) राष्ट्रीय दर 29.8 से कहीं अधिक है. जानकारों का मानना है कि वन और वन आधारित पहल से राज्य के आदिवासियों का पिछड़ापन बहुत हद तक दूर हो सकता है.

वन और आदिवासियों के रिश्ते कितने भावनात्मक और सहजीवी हैं, इसे वही महसूस कर सकता है,जिसका दिल दूसरे के लिए धड़कता हो. दुर्भाग्य से वर्तमान राजनीतिक माहौल में ऐसे दिल गिनती के बचे हैं. जनवरी के दूसरे सप्ताह में लातेहार जिले के गारू में हुई एक बैठक में खेरवार समुदाय के करीमन सिंह के ख़ुशी का ठिकाना नही था. बैठक में आये सभी लोगों को वह मिठाइयाँ और निमकी बाँट रहा था. लम्बे संघर्ष के बाद उसे और उसके दोनों भाइयों को 7.58 एकड़ वन भूमि का पट्टा मिला है. करीमन के आखों की चमक और चेहरे की मुस्कान यहाँ के हजारों आदिवासियों और जंगल आश्रित समुदायों को भी मिल सके तो संसाधनों की लड़ाई लड़े संग्रामियों को सच्ची श्रद्धांजलि मिल सकेगी. क्या हम ऐसी कोई सरकार देख पायेंगे.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. इस लेख में व्यक्त विचार से न्यूजविंग का सहमत होना जरूरी नहीं.)

 

 

Advertisement

Related Articles

Back to top button
%d bloggers like this: