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2019 का लोकसभा चुनाव पांच हजार करोड़ का पड़ेगा, 1952 में बजट था 10.45 करोड़

 NewDelhi :  लोकसभा चुनाव 2019  की घोषणा हो चुकी है. इस चुनाव में अरबों-खरबों रुपये खर्च होंगे. आजादी के 70 साल हो गये. कई चुनाव हुए. हर चुनाव के साथ खर्च बढ़ता चला गया. आकलन है कि देश में 1952  में प्रथम चुनाव से लेकर आज 17 वां लोकसभा चुनाव आते-आते प्रति वोटर खर्च में नौ हजार फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. बता दें कि प्रथम चुनाव में साठ पैसा प्रति वोटर खर्च आया था,  जो आज सत्रहवीं लोकसभा के समय 55 रुपए पर पहुंच चुका है. भारतीय लॉ कमीशन की ओर से एक साथ चुनाव कराने की सिफारिश की सबसे बड़ी वजहों में एक वजह बढ़ता चुनावी खर्च था.  1952 में पहला चुनाव था और सबकुछ शुरुआत से होना था. बैलेट पेपर से लेकर चुनावी तैयारियों के लिए कुल 10.45 करोड़ रुपए का बजट रखा गया था.

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हालांकि 1957 में हुए दूसरे चुनाव का बजट तकरीबन आधा हो गया लेकिन उसके बाद चुनावी बजट में लगातार बढ़ोतरी होती गयी, लेकिन 1977 में चुनाव का बजट पिछले चुनावी बजट से दोगुना हो गया. 1971 में चुनाव का खर्च 11.61 करोड़ रुपए था और 1977 में यह बढ़कर 23.03 करोड़ रुपए पर पहुंच गया.

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नब्बे करोड़ वोटर्स, प्रति वोटर खर्च में 9067 फीसदी की बढ़ोतरी

चुनावी बजट और वोटर्स की संख्या के आधार पर प्रति वोटर पर होने वाले खर्च को देखा जाये तो इसमें लगातार बढ़ोतरी हुई है. 1977 में प्रति वोटर खर्च जहां 71 पैसे था वहीं 1980 यह डेढ़ रुपए प्रति वोटर पर पहुंच गया. सत्रहवें लोकसभा के लिए यानी 2019 के लोकसभा में यह खर्चा पांच हजार करोड़ तक पहुंच सकता है. यानी नब्बे करोड़ वोटर्स के हिसाब से देखें तो प्रति वोटर पर होने वाले खर्च में 9067 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. हालांकि इसमें रुपए की कीमत को नहीं लिया गया है लेकिन यह मामूली खर्च नहीं है. खर्चों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी पंद्रहवी लोकसभा के बाद शुरू हुई. 2009 में होने वाले इस चुनाव में जहां प्रति वोटर पर खर्च 12 रुपए था वहीं सोलहवीं लोकसभा में यह खर्च 241 फीसदी बढ़ोतरी के साथ 41 रुपए पर पहुंच गया. इस बार माना जा रहा है कि चुनाव कराने का खर्च करीब पांच हजार करोड़ रुपए तक पहुंच जायेगा. इस हिसाब से 90 करोड़ मतदाताओं पर होने वाले खर्च को हर वोटर के हिसाब से देखा जाए तो प्रति वोटर 55 रुपए खर्च बैठेगा.

लोकसभा पर होने वाले खर्चों को केंद्र सरकार वहन करती है जबकि विधान सभा की चुनावी व्यवस्था पर होने वाले खर्च को राज्य सरकार चुकाती है. अगर लोकसभा के साथ ही राज्यों के विधान सभा चुनाव होते हैं तो केंद्र और राज्य दोनों बराबर रूप से चुनाव पर हुए खर्चों को वहन करते हैं. चुनावी खर्चों में स्याही और अमोनिया पेपर से लेकर वोटिंग मशीन और उन्हें बूथ तक ले जाने के साथ मतगणना में लगे कर्मचारियों का दैनिक भत्ता तक शामिल होता है.

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