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संजय राज की पांच कविताएं

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Sanjay Raj

हुंकार

आंखों के पोरों में
फंसा हुआ है पानी
फिर निकल आया है
उबला हुआ सूरज
घर के कच्चे आंगन में
उग आयी है
संभावना की घास.
बदलाव लिये नारों के बीच
दिल्ली में बैठा आदमी
बजा रहा है ताली…
और इन सबके बीच
नहर पर बैठा
भूख से तिलमिलाया आदमी
डाल रहा है कांटा
मछलियों को गीत सुनाकर.
सुनो!
पोर-पोर जिस्म का
जब दुखता है
तब बोलती है आंतें–
ले जाओ
मुझे चांद नही चाहिये
और
उसके चेहरे पर ढिबरी की पीली रोशनी

बांचती है कथा
उसके न होने की
आओ चलें
हम भाषाई युद्ध में
रण-भेदी हुंकार भरें
पूरी
गर्जना के साथ.

एक दिन

एक दिन…
सहमति ने
स्वीकृति दी
और
पसर गया जंगल
बहुत दूर तक.
एक दिन….
घर की छत पर
“हंसी” ने कहा
और चांद
सितारों की खोज में लग गया
एक दिन…
शाम होते ही
लौटते हुए
परिंदे ने कहा
पुराना घोसला ही ठीक है
और एक दिन…
निकल आया
भीतर से सूरज
और पता पूछते हुए
चल दिया
दबे पांव
स्याह अंधेरों के पीछे.

लौटने से पहले

(एक सेक्स वर्कर के नाम)

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SMILE

सच है कि
अभिशप्त है
तुम्हारी शामें,
तुम्हारी रातें
तुम्हारा दिन
सब कुछ
दब जाता है
डीजे के शोर में
उग आए हैं कानों में
पाषाणी पत्थर
चिलम का सुट्टा
शराब की चुस्कियां
और भौड़ी नाच!
नही दिखता
आंखों का छलछलाता पानी
और देह!
जो रोज़ उलझ जाती है
नरभछि के जंगल में
ओ वैशाली की नगर वधू!
अब तुम्हारा स्वयंवर नही
राजे-रजवाड़े नहीं
मंत्री-संत्री नही
सेठ-साहूकार नहीं
अब ना कोई सौंदर्य बोध
ना नियंत्रण-ना चुनाव
कोई इच्छा नही
कुछ भी नही
बावजूद
लौटने से पहले
छोड़ आओ सबकुछ
लौटा दो उन्हें
सिसकियां/आर्तनाद/तकलीफें
खुद खड़ा हो जाओ
कि
बची है अभी
चांदनी
सुनहली धूप
हसीन सपने
एक घर होने की
इसलिए कि
अब कोई सिद्धार्थ नही
जो बुद्ध बन तुम्हें मुक्त कर सके.

द लल्लन टॉप- ‘बकवास कविता

हांथों के
थामे झंडे पर
साल बदल गये
उदास आंखों में
सपनों की तरह

मुहावरों में
ठूसा हुआ आदमी
चौक-चौराहों पर
बहस/मुबाहस
कभी तब्दील नहीं कर पाता
अपने मत को
सहमत में.
“द लल्लन टॉप-बकवास कविता”
उस
ऊबे हुए आदमी के
खेतों में
नही ला पाती
लोकतंत्र की बारिश
जिसका सारा पानी
संसद
डकार गयी है.
और अंत में—
दांत से
कुतरे गए नाखून पर
आज भी
उगे हुए हैं
अफ़सोस..

कवि विपक्ष ही होता है

वह साधारण है
विशिष्ट होने की सारी मांगें
खारिज कर चुका है
वह गढ़ता है
रहस्य–
नए ब्लैक होल सा
देह की भटकन सी जंगलों से
निकल भागा है
और
भूख.. प्यास…ज़रूरत पर
समय के आगे
नारे लगाता है
वह ढूंढता है
आसमानी सुराख
क्योंकि
पत्थर उसने ही उछाले थे
सत्ता की रहस्यमय मुस्कराहटें
जब-जब उसे देखती हैं
उसके आर्तनाद
शोर मचाने लगते हैं
क्योंकि
कवि..
विपक्ष ही होता है.

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