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धनबाद नगर निगम क्षेत्र के पांच लाख लोग दादागिरी और पार्षद की उपेक्षा से नरक भोग रहे हैं

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Ranjan Jha

Dhanbad : धनबाद नगर निगम में लोकतंत्र के नाम पर दादागिरी चल रही है. कई पार्षद सुविधा देने में लोगों से पक्षपात कर रहे हैं. इस कारण हर वार्ड में नगर निगम की योजनाओं पर हो रहे करोड़ों रुपये खर्च के बाद भी करीब पांच लाख की आबादी मामूली सुविधाओं से वंचित है. कई वार्ड पार्षद सुविधाओं के लिए खुलेआम रिश्वत वसूल रहे हैं. पैसे लेकर भी वार्ड पार्षद लोगों का काम नहीं कर रहे. मामला पुलिस तक जा रहा है. धनबाद नगर निगम क्षेत्र में नागरिक सुविधाओं को लेकर किये गये सर्वेक्षण में एक सामाजिक संगठन ने पाया है कि नगर निगम के ज्यादातर खर्च सिर्फ कमीशनखोरी के लिए होते हैं. वार्ड नंबर 24 सहित दो दर्जन से अधिक वार्ड हैं, जहां के पार्षद एक खास वर्ग के लिए और खास वर्ग के क्षेत्र में काम करते हैं. अन्य वर्ग के लोगों की ओर झांकने भी नहीं जाते. पार्षद से संबंधित वर्ग के लोग अन्य वर्ग के कमजोर लोगों पर अत्याचार करते हैं, पर निगम का सिस्टम ऐसा है कि ऐसे पीड़ित वर्ग की कोई न सुने. सफाई, रास्ता, स्ट्रीट लाइट सहित अन्य सुविधाओं के मामले में भी ऐसे लोग उपेक्षित हैं. लोगों के पास दो ही विकल्प हैं- या तो वे अपने घर के आस-पास की सफाई स्वयं करायें या गंदगी और तमाम असुविधाएं झेलें. सफाई के लिए जिम्मेदार सर्वेयर भी सिर्फ पार्षद के लोगों की सुविधा पर ही ध्यान देते हैं. उनके लिए कोई नियम नहीं है कि जन सामान्य की समस्याएं सुनें. सर्वेयर का मोबाइल नंबर भी सार्वजनिक नहीं किया गया है. समस्या को दर्ज या रजिस्टर करने की कोई प्रणाली विकसित नहीं की गयी है. इस कारण सर्वेयर सिर्फ पार्षद के निर्देश का पालन करना अपना कर्तव्य समझते हैं.

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कहीं सड़क, नालियां, पेवर ब्लॉक बिछाने और स्ट्रीट लाइट के लिए करोड़ों खर्च किये जा रहे हैं, तो कहीं पार्षद के चहेतों की दादागिरी से आमलोग पीड़ित हैं. ऐसे दादाओं ने आम लोगों के घरों के रास्ते को अवरुद्ध कर दिया है. रास्ते पर घर का कचरा फेंकना इनका कर्तव्य जैसा है. वंचित वर्ग के लोगों के घरों की ओर ही मुहल्ले की नालियों का रास्ता मोड़ दिया गया है. इन नालियों के पानी में उबते-डूबते ही लोग अपने घरों तक जाते हैं. इसका विरोध करने पर लोग और सताये जाते हैं. निगम के अफसरों ने कभी देखा ही नहीं कि निगम के जो करोड़ों रुपये नागरिक सुविधाओं पर लगाये जा रहे हैं, उससे वास्तव में लोगों को सुविधाएं मिल रही हैं कि नागरिक सुविधाओं के नाम पर सिर्फ फंड का वारा-न्यारा हो रहा है. कागजी ऑडिट करनेवाला फर्म भी निगम के फंड के वारे-न्यारे को नजरअंदाज कर रहा है. निगम की योजनाओं पर किये जा रहे खर्च के सोशल ऑडिट का प्रावधान होता, तो शायद फंड की लूट पकड़ी जाती, पर पार्षद की मनमानी पर कोई रोक नहीं है. निगम के अधिकारी और सिटी मैनेजर कभी किसी वार्ड में जाकर समस्या देखते-सुनते भी नहीं हैं. अगर ऐसा करें, तो संभव है कि सुविधाओं से वंचित तबके को राहत मिले और पार्षदों की गड़बड़ी पकड़ी जाये. इन सबके अभाव में स्पष्ट होता है कि निगम में नागरिक सुविधाओं के नाम पर सिर्फ फंड लूट का खेल चल रहा है. और इसमें ऊपर से नीचे तक सभी मिले हुए हैं.

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जानबूझ कर नहीं बनायी जा रही वार्ड समिति

नगर निगम के हर वार्ड में अलग-अलग तबके के लोगों की वार्ड समिति बनाने का प्रावधान किया गया है. नियमानुसार यह समिति ही वार्ड की सभी योजनाएं पारित करेगी. इस समिति की स्वीकृति के बिना कोई योजना लागू नहीं हो सकती. इस समिति को बनाने का स्पष्ट प्रावधान है. इसके बाद भी निगम बोर्ड के गठन के तीन साल से ज्यादा बीत जाने के बावजूद वार्ड समिति का गठन नहीं करना और करोड़ों की योजना बनाकर फंड लूट लेना क्या साबित करता है? यही कि नियम-प्रावधान को दरकिनार कर लूट ही निगम का ध्येय है. ऑडिटर इसे इग्नोर कर रहे हैं, तो क्यों? सवाल उठता है कि क्या वे भी इसमें हिस्सेदार हैं. नगर विकास विभाग भी आपत्ति नहीं कर रहा है, तो लोग समझ रहे हैं कि इसका निहितार्थ क्या है. सर्वे बताता है कि निगम का कोई काम निर्धारित मापदंड के तहत नहीं हो रहा है.

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