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मसानजोर विवाद पर मंत्री लुईस मरांडी ने न्यूज विंग को दिये इंटरव्यू में कहा, विस्थापितों को पट्टा दिलाना जरूरी

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Akshay Kumar Jha

Ranchi : संतालपरगना ही नहीं, पूरे झारखंड में मसानजोर डैम को लेकर राजनीति काफी गर्म है. हाल ही में बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने झारखंड की जमीन पर लगे बंगाल सरकार के वेलकम गेट पर झारखंड सरकार का लोगो भी चिपका दिया था, जिसके बाद बंगाल पुलिस ने लोगो को हटाया. जबकि, बंगाल की सीमा वहां से करीब 30 किमी दूर है. मामले को लेकर झारखंड सरकार की कल्याण मंत्री और दुमका से विधायक डॉ लुईस मरांडी ने बंगाल सरकार को चेताया था. न्यूज विंग इस मामले पर लगातार लिखता आया है. न्यूज विंग ने उस करार को अपने पोर्टल पर पब्लिश किया कि किन बातों के एकरारनामे के बाद तत्कालीन बिहार सराकर ने बंगाल सरकार को मसानजोर डैम सुपुर्द किया था. दस करार में से एक ही करार तत्कालीन बिहार सरकार ने पूरा किया, बाकी सभी करार कागजों पर रह गये. इसी मामले को लेकर झारखंड सरकार की कल्याण मंत्री डॉ लुईस मरांडी ने न्यूज विंग के ब्यूरो चीफ अक्षय कुमार झा से बात की.

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मसानजोर विस्थापितों को पहचान दिलाना बेहद जरूरी

मंत्री डॉ लुईस मरांडी ने बताया कि आज जो पीढ़ी दुमका में है, वह मसानजोर की करीब तीसरी पीढ़ी है. 1950 के दशक में जब मसानजोर डैम बना, तो उस वक्त सभी विस्थापितों को पहचानते थे. मसानजोर डैम की वजह से यहां के लोगों की जमीन गयी. घर-बार डूब गये. लेकिन, मुआवजा के नाम पर उन्हें सिर्फ धोखा ही मिला है. तत्कालीन सरकार ने न ही जमीन और न ही आवास दिलाया. यहां तक कि मुआवजा की राशि उन्हें नहीं मिल पायी. आज हालत यह है कि जमीन नहीं होने की वजह से उनका आवासीय प्रमाण पत्र और आय प्रमाण पत्र जैसी चीजों को बनाने में मुश्किल आती है. जमीन खत्म हो जाने से कई परिवारों ने पलायन किया. पलायन की भेंट चढ़ चुके परिवारों की हालत आज बद से बदतर है. जरूरी है कि विस्थापितों को पहले पट्टा मिले. उन्हें एक ऐसे पहचानपत्र की जरूरत है, जिससे उन्हें विस्थापित माना जा सके. पट्टा मिलने के बाद ही वे स्थापित हो पायेंगे. मंत्री डॉ लुईस मरांडी ने कहा, “मुझे विश्वास नहीं होता है कि कैसे इससे पहले के विधायक और सांसदों ने विस्थापितों के लिए आवाज बुलंद नहीं की.”

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संताल समेत पूरे झारखंड को मिले मसानजोर का पानी और बिजली

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मंत्री डॉ लुईस मरांडी ने कहा कि ऐसा शायद ही कहीं हुआ होगा कि जमीन किसी और राज्य की और उस जमीन पर बने बांध का पानी और उस पानी से बनी बिजली पर हक किसी और राज्य का हो. मसानजोर इस मामले में एक अकेला उदाहरण है. उन्होंने कहा, “मेरी पहली लड़ाई यह है कि संताल के लोगों को उनका हक मिले. जमीन जलमग्न हुई संताल की. विस्थापित हुए संताल के लोग और सुविधाएं मिल रही हैं बंगाल के लोगों को. एक बार यह लड़ाई शुरू से लड़ने की जरूरत है. संताल के किसानों की फसल बिना सिंचाई के बर्बाद होती है. अगर इस डैम का पानी और बिजली संताल के लोगों को मिले, तो यह एक न्याय का काम होगा. विस्थापितों को हर हाल में न्याय मिलना चाहिए.”

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विस्थापित आयोग बनाने की जरूरत, पहल कर रही है सरकार

मंत्री डॉ लुईस मरांडी ने कहा कि झारखंड में मसानजोर के अलावा भी कई ऐसे प्रोजेक्ट हैं, जिनसे यहां की जनता विस्थापित हुई है. चाहे वह एचईसी हो, मैथन या मसानजोर हो. सरकार एक विस्थापित आयोग बनाने की चर्चा कर रही है. विस्थापितों के लिए जरूरी है कि यह आयोग बने. आयोग बनने से पता चलेगा कि आखिर विस्थापितों को न्याय मिला है कि नहीं. आयोग विस्थापित हुए लोगों की सूची बनाकर उन्हें उनका हक दिलाने का काम करेगा. पहले की सरकार ने क्या किया, उससे मतलब नहीं है. अब विस्थापितों को उनका हक मिले, इस पहलू पर काम करने की जरूरत है.

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