Ranchi

एनएच की तरह ‘बिल्ट एंड ऑपरेट’ फार्मूले से पूरी करें लंबित सिंचाई परियोजनाएं : महेश पोद्दार

  • निजी कम्पनियां पूरी करें परियोजनाएं, टोल शुल्क की तरह सरकार या किसान चुकायें दाम
  • नीति आयोग और 15वें वित्त आयोग को पत्र लिख सांसद ने दिया सुझाव

Ranchi: झारखंड से राज्यसभा सांसद महेश पोद्दार ने झारखण्ड की लंबित बड़ी और बहुद्देशीय परियोजनाओं को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय उच्च पथ की तरह ‘बिल्ट एंड ऑपरेट’ फार्मूला अपनाने का सुझाव दिया है. श्री पोद्दार ने इस आशय का पत्र नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार और 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष एनके सिंह को लिखा है.

मात्र 20 फीसदी भूभाग पर सिंचाई की सुविधा

अपने पत्र में श्री पोद्दार ने लिखा है कि झारखंड के कुल भौगोलिक क्षेत्र 79.70 लाख हेक्टेयर में 29.74 लाख हेक्टेयर भूमि ही कृषि योग्य है, जिसमें अबतक सभी स्रोतों से 9.92 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि पर ही सिंचाई क्षमता सृजित हुई है. झारखंड में अधिकतम किसान सीमान्त हैं, जिनकी जोत छोटी है, पर कृषि पर निर्भरता 72 प्रतिशत आबादी की है. पानी के अभाव में राज्य में, विशेष कर जनजातीय पठारी क्षेत्रों में एक फसली खेती होती है. अतः यहां गरीबी-बेरोजगारी उन्मूलन, पलायन रोकने के लिए 70-80 के दशक से (पूर्ववर्ती बिहार काल से) लंबित दर्जनों वृहत सिंचाई योजनाओं को पूरा कर प्रत्येक खेत तक पानी पहुंचाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए. सरकारी प्रतिवेदन के अनुसार प्रायः सभी स्रोतों से कृषि योग्य भूमि के 20 प्रतिशत भाग पर सिंचाई हो पाती है जो राष्ट्रीय औसत 67 प्रतिशत से बहुत ही कम है.

कई बड़ी परियोजनाएं वर्षों से हैं लंबित

श्री पोद्दार ने अपने पत्र में स्वर्णरेखा बहुद्देशीय सिंचाई परियोजना, अजय बराज परियोजना, गुमानी बराज परियोजना, पुनासी जलाशय, कोणार सिंचाई परियोजना, अपर शंख जलाशय, सोनुआ जलाशय, पंचखेरो जलाशय, सुकरी जलाशय, सुरंगी जलाशय, भैरवा जलाशय, रामरेखा जलाशय, केशो जलाशय, नकटी जलाशय, बटाने जलाशय, रायसा, तजना एवं सुरु जलाशय आदि परियोजनाओं का विस्तृत विवरण दिया है. उन्होंने कहा है कि वर्षों से केंद्र और राज्य सरकार का संसाधन निगलती ये परियोजनाएं अबतक अपेक्षित लाभ देने में नाकाम रही हैं. यदि यही दशा रही तो सभी खेतों तक सिंचाई पहुंचाने में 40 वर्ष लग सकते हैं. निश्चित रूप से राज्य योजना मद से इसकी प्रतिपूर्ति संभव नहीं है.

यहां के किसान हैं मेहनती

राज्य के किसानों की तारीफ़ करते हुए श्री पोद्दार ने कहा है कि जहां रब्बी में कुआं, तालाब, डोभा आदि की सुविधा है, वैसे सैकड़ों गावों के किसान अपनी उत्पादित हरी सब्जी बाहर के राज्यों में भेजते हैं. किसानों के परिश्रम का ही परिणाम है कि राज्य में जीएसवीए 20 प्रतिशत तक गया है. 2015 एवं 2016 में यह अनुपात क्रमशः 15.7 प्रतिशत और 15.2 प्रतिशत रहा है.

केंद्र-राज्य की साझेदारी हो

श्री पोद्दार ने आग्रह किया है कि राज्य की लंबित सिंचाई परियोजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर चिन्हित कर क्रमशः पूरा कराने की दिशा में कार्रवाई की जाये. एक विकल्प तो यह हो सकता है कि केंद्र-राज्य की साझेदारी (वित्तीय समर्थन) वाली परियोजनाओं के मामले में केंद्र सरकार हिस्सा पूंजी के साथ-साथ यदि अपेक्षित हो तो राज्य को ऋण, समर्थन, अनुदान आदि उपलब्ध कराये और युगों से लंबित परियोजनाओं को पूरा कराये.

निजी क्षेत्र को साझेदार बनाया जाये

दूसरा विकल्प सुझाते हुए उन्होंने कहा है कि राष्ट्रीय उच्च पथों के बड़े पैमाने पर निर्माण एवं उन्नयन में प्राप्त सफलता ने प्रमाणित किया है कि ‘बिल्ट एंड ऑपरेट’ अथवा ‘टर्न की’ प्रणाली सफल प्रयोग है. वृहत सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने के लिए किसी भी स्थिति में राज्य सरकार एकमुश्त अपेक्षित बड़ी राशि के विनियोजन में समर्थ नहीं हो पायेगी. यदि निजी क्षेत्र को साझेदार बनाया जाये और उपलब्ध करायी जानेवाली सिंचाई/विद्युत् सुविधा के हिसाब से केंद्र/राज्य उन्हें भुगतान करें तो लंबित सिंचाई परियोजनाएं समय पर पूरी भी होंगी और इनका नियमित रखरखाव भी संभव हो पायेगा. उच्च पथों पर वसूले जानेवाले टोल शुल्क की तरह कुछ अनुदानित शुल्क किसान भी चुकाने को तैयार हो जायेंगे यदि उनके खेतों तक पानी पहुंचने लगेगा.

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