न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

किसानों को छह हजार की आर्थिक मदद राजनीतिक नौटंकी, अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा : अमेरिकी थिंक टैंक

किसानों को उनकी जमीन के आधार पर आर्थिक मदद देने से भारत की ग्रामीण आबादी के बहुत बड़े हिस्से को शायद ही फायदा पहुंचे. उनके अनुसार इससे मुख़्य समस्या का हल तो नहीं निकलेगा

32

NewDelhi : सेंट्रल फॉर ग्लोबल डिवलपमेंट थिंक टैंक के पॉलिसी फेलो अंकित मुखर्जी का मानना है कि किसानों को उनकी जमीन के आधार पर आर्थिक मदद देने से भारत की ग्रामीण आबादी के बहुत बड़े हिस्से को शायद ही फायदा पहुंचे. उनके अनुसार इससे मुख़्य समस्या का हल तो नहीं निकलेगा, लेकिन सरकार पर आर्थिक बोझ जरूर बढ़ जायेगा. बता दें कि मोदी सरकार ने हाल ही में भारत के लगभग 12 करोड़ किसानों को छह हजार रुपये सालाना की सीधी आर्थिक मदद देने की घोषणा की  है. अमेरिकी थिंक टैंक मुखर्जी विभिन्न दलों की इन कोशिशों को राजनीतिक नौटंकी करार देते हें. सेंट्रल फॉर ग्लोबल डिवलपमेंट थिंक टैंक के पॉलिसी फेलो मुखर्जी ने पीटीआई को दिये एक इंटरव्यू में कहा, इस बात के प्रमाण हैं कि जमीन के मालिकाना हक के आधार पर किसानों को लक्षित करना ग्रामीण आबादी के बहुत सारे हिस्से को फायदा नहीं पहुंचायेगा. यह  राजनीतिक तौर पर बैकफायर भी कर सकता है अगर सरकार पहले से संपन्न किसानों की मदद करते हुए नजर आती है.

बता दें कि मुखर्जी विकासशील देशों में गवर्नेंस, पब्लिक फाइनेंस और सर्विस डिलिवरी के मुद्दे पर काम के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में वह बायोमीट्रिक आईडी और डिजिटल पेमेंट सिस्टम के लोगों को मिल रही सरकारी सब्सिडी पर असर, वित्तीय समावेशन की बेहतरी आदि पर रिसर्च कर रहे हैं.

आधी-अधूरी योजनाओं से फायदे से ज्यादा नुकसान

hosp3

मुखर्जी  के अनुसार राहुल गांधी के न्यूनतम आय की गारंटी और सरकार के आय संबंधित सहयोग स्कीम को यूनिवर्सल बेसिक इनकम या यूबीआई बताना भ्रामक है.  दोनों में ही शहरी गरीबों को पूरी तरह बाहर कर दिया जाता है, जिनकी संख्या लगातार बढ़ रही है; राजनीतिक पार्टियां उन्हें प्रभावशाली वोट बैंक भी नहीं मानतीं.  इसलिए हम कह सकते हैं कि इन योजनाओं का कोई आर्थिक आधार नहीं है. मुखर्जी के अनुसार यह चुनावों से पहले राजनीतिक नौटंकी से बढ़कर कुछ नहीं.  मुखर्जी कहते हैं कि भारत में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिससे साबित होता है कि किसी खास समूह तक किसी योजना विशेष का लाभ पहुंचाना कितना मुश्किल है;  ऐसा न होने पर गलत शख्स को योजना का लाभ मिलने, भ्रष्टाचार आदि की समस्याएं सामने आती हैं. मुखर्जी के अनुसार जनोपयोगी योजनाओं से लाभांवित होने वाले समूह विशेष की पहचान करने की समस्या आधार और जनधन के जरिए भी दूर नहीं होगी.

आधी-अधूरी योजनाओं से फायदे से ज्यादा नुकसान होगा, फिर चाहे छोटे वक्त में या लंबे अंतराल में. वे कहते हैं कि इससे असल समस्या हल होने के बजाये अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा. मुखर्जी किसानों की कर्ज माफी का उदाहरण देते हैं. वे कहते हैं कि इससे कितना नुकसान पहुंचा है. लेकिन राजनेता यही समझते हैं कि यह वोट पाने का इकलौता तरीका है. हालांकि वे उम्मीद करते हैं कि कैश ट्रांसफर योजना के साथ ऐसा न हो.

इसे भी पढ़ें : चिदंबरम को आशंका, संविधान हिंदुत्व की विचारधारा से प्रेरित दस्तावेज में बदल दिया जायेगा  

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

You might also like
%d bloggers like this: