LITERATURE

पिता चाहते थे पुलिस की नौकरी करें, बेटे पर सवार था हॉकी का जूनून, आखिरकार बने शायर

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित शायर शहरयार की जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है. सुरेश वाडेकर की प्यारी आवाज में ये ग़ज़ल जब सुनता था तो यह दिल को छू जाती थी.

उस समय ये नहीं जानता था कि इस बेहतरीन ग़ज़ल को लिखा किसने है. जानने की कोशिश भी नहीं की थी उन दिनों. इसके बाद जब उमराव जान फिल्म आई और उसके गीत सुने तो मैं तो उन शानदार गजलों पर लट्टू हो गया.

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उन्हीं दिनों मालूम चला कि ये बेमिसाल गजलें शहरयार की कलम से निकली हैं और सीने में जलन को भी इन्हीं साहब ने लिखा था. आज शहरयार साहब का जन्मदिन है तो आज जानते हैं इस शायर की शायरी और जीवन से जुड़ी बातें.

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मुजफ्फर अली का शुक्रिया कहिए

हिंदी फिल्मों के दर्शकों और गीत सुनने वालों को शहरयार की शायरी से परिचय फिल्म निर्देशक मुजफ्फर अली ने कराया था. फारुख शेख अभिनीत गमन फिल्म में सीने में जलन वाली लाजवाब ग़ज़ल ली गयी थी. यह ग़ज़ल अपने समय में रेडियो पर सबसे ज्यादा बजने वाला गीत था.

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उमराव जान का जवाब नहीं

1981 में मुज़फ्फ़र अली द्वारा निर्देशित ‘उमराव जान’. फिल्म आई. इसमें बेहद ख़ूबसूरत रेखा ने तवायफ उमराव जान अदा का किरदार निभाया था.इस फिल्म की एक-एक बात कमाल की है. निर्देशन, पटकथा, रेखा की अदाकारी, खय्याम का संगीत और सबसे बढ़कर , इसमें शहरयार की शायरी थी.

बेहद कमाल की शायरी की है इसमें उन्होंने. मसलन, एक शेर गौर फरमाइये. ‘इक तुम ही नहीं तन्हा, उल्फ़त में मेरी रुसवा, इस शहर में तुम जैसे दीवाने हज़ारों हैं’.

यह शेर एक तवायफ़ के अपने हुस्न पर खुद रश्क़ खाते हुए उसकी दिलफरेबी का एलान है. ऐसा ऐलान जो उसके बैठे हुए उसके मुश्ताक़ आशिकों की जान ले लेता है. या फिर ‘इस शम्मे-फ़रोज़ां को आंधी से डराते हो, इस शम्मे-फ़रोज़ां के परवाने हज़ारों हैं’.

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इस फिल्म की हर ग़ज़ल का मूड अलहदा है. .

यह शायद खय्याम की मौसिकी और शहरयार की शायरी का ही जादू था कि इस फिल्म में आशा भोसले की गायकी उनके सबसे दिलकश आवाज में निखर कर सामने आयी है. अब इस ग़ज़ल को पढ़िए या सुनिए आप शहरयार की शायरी के मुरीद हुए बिना नहीं रह सकते.

जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने
जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हम ने
सब का अहवाल वही है जो हमारा है आज
ये अलग बात कि शिकवा किया तन्हा हम ने
ख़ुद पशीमान हुए न उसे शर्मिंदा किया
इश्क़ की वज़्अ को क्या ख़ूब निभाया हम ने
कौन सा क़हर ये आँखों पे हुआ है नाज़िल
एक मुद्दत से कोई ख़्वाब न देखा हम ने
उम्र भर सच ही कहा सच के सिवा कुछ न कहा
अज्र क्या इस का मिलेगा ये न सोचा हमने

उमराव जान में ही हम मशहूर ग़ज़ल गायक तलत अजीज की मखमली आवाज का जादू भी हम शहरयार की ग़ज़ल में महसूस कर सकते

ज़िंदगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें
ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें
सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें
दिन ढले यूँ तिरी आवाज़ बुलाती है हमें
याद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी से
रात के पिछले-पहर रोज़ जगाती है हमें
हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ है
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें

उमराव जान के गीतों की जुबान लोगों कि समझ में आती है, गाने सिर्फ गाने नहीं हैं बल्कि फिल्म का हिस्सा हैं. वो बातें, जो डॉयलाग या एक्शन के जरिए फिल्म नहीं कह पाई, उन बातों को गीत के जरिए कहा गया. इस फिल्म में सिर्फ गीत ही नहीं बल्कि उसकी कहानी उसके डॉयलाग सबपर शहरयार छाए हुए थे. वजह ये थी की अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में शहरयार ने 15 साल तक उमराव जान उपन्यास को पढ़ाया था.

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जीवन का सफर

कुंवर अख़लाक़ मोहम्मद खां उर्फ शहरयार का जन्म 16 जून 1936 को तहसील आंवला, जिला बरेली में हुआ. हालांकि उनके पूर्वज जिला बुलंदशहर के थे. पिता पुलिस अफसर थे और जगह-जगह तबादले होते रहते थे, इसलिए आरम्भिक पढ़ाई हरदोई में पूरी कराने के बाद उन्हें 1948 में अलीगढ़ भेज दिया गया.

पिता चाहते थे कि शहरयार उन्हीं के क़दमों पर चलते हुए पुलिस अफसर बन जाएं. लेकिन अख़लाक मोहम्मद खां को तो ‘शहरयार’ बनना था, इसलिए पिता का सपना पूरा करने में उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी.

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हॉकी का जुनून था सवार

हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के जादू वाला दौर था वह. सो अख़लाक़ पर भी हॉकी का जुनून सवार था. वह अच्छा खेलता था और स्कूल टीम का कप्तान भी बना.

स्कूल के दिनों में उनकी जिंदगी में ग़ज़ल, शायरी, नज़्म का कोई वजूद न था. खानदान में किसी का भी शायरी से दूर- दूर तक वास्ता नहीं था. वालिद पुलिस महकमे में बतौर इंस्पेक्टर लगे हुए थे और अख़लाक़ खान को वही बनता हुआ देखने के ख्वाहिशमंद थे. लेकिन तकदीर ने कुछ और लिख रखा था.

विश्वविद्यालय की पढ़ाई ने सब उलट-पुलट कर रख दिया. उत्तर प्रदेश के दूसरे लड़्कों की तरह ही उनका रास्ता भी तय न था कि किधर जाना है. बकौल शहरयार कई बरस तक उन्हें इस बात का इल्म ही नहीं हुआ कि आख़िर जिंदगी में करना क्या है. खैर, जिंदगी अपनी रफ़्तार से बढ़ रही थी. बाद में उन्होंने इसे लिखा भी था-

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कहां तक वक्त के दरिया को हम ठहरा हुआ देखें
ये हसरत है कि इन आंखों से कुछ होता हुआ देखें
तुझ से बिछड़े हैं तो अब किस से मिलाती है हमें
जिंदगी देखिए क्या रंग दिखाती है हमें
जिंदगी में करना क्या है सोचा नहीं था

बकौल शहरयार कई बरस तक उन्हें इस बात का इल्म ही नहीं हुआ कि आख़िर जिंदगी में करना क्या है. खैर, जिंदगी अपनी रफ़्तार से बढ़ रही थी. ग्रेजुएट होने के बाद जब उन्होंने सायकॉलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन किया तो उन्हें अहसास हुआ कि उनसे ग़लती हो गयी है. फिर उन्होंने उर्दू में एमए किया और उसके बाद फ़ैसला किया कि टीचिंग के पेशे से जुड़ना है. 1966 में शहरयार अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लेक्चरर बन गए.

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ऐसे बने शायर

शायरी में उनका आना इत्तिफाक नहीं संगत का असर था. अलीगढ़ में शुरुआती दिनों में ही उनकी मुलाक़ात ख़लीलुल रहमान आज़मी से हो गई थी. एक दिन उर्दू के एक बड़े शायर को मंच पर सुनने का मौक़ा मिला.

वहां के माहौल ने ऐसा असर किया कि किशोर शहरयार के दिमाग़ में एक ही तस्वीर बार-बार बनने लगी कि वह मंच पर शायरी सुना रहा हैं और लोग सुन रहे हैं. धीरे धीरे शेर कहने की बेचैनी ने उस स्थान तक पहुंचा दिया कि आखिरकार उंगलियों ने कुछ लिख डालने के लिये क़लम उठा ली.

अगले दो साल में हॉकी का वह चमकदार खिलाड़ी बाक़ायदा शायर बन चुका था. नाम था कुंवर अख़लाक़ मोहम्मद खां, लेकिन पहचाने गए शहरयार के नाम से. जब वह उर्दू में हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रिसालों में छपने लगे तो ख़लीलुल रहमान के मशविरे पर ‘शहरयार’ बन गए. और जब ‘शहरयार’ बन गए तो क्या खूब लिखा-

कहिए तो आसमां को जमीं पर उतार लाएं
मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए

1965 में ‘इस्मे-आज़म’ की शक्ल में पहला मजमुआ (संग्रह) छपा जिसे हाथों-हाथ लिया गया. यहां तक कि फ़िराक गोरखपुरी जैसे तमाम बड़े शायरों ने उन्हें ख़ूब दाद दी.

1978 में ‘हिज्र के मौसम’ फिर अगले साल ‘सातवां दर’ और फिर 1985 में उनकी चौथी किताब ‘ख्व़ाब का दर बंद है’ आई. इस चौथी किताब ने शहरयार को वह मुक़ाम दिलाया जिसके वे सही मायनों में हक़दार थे. उन्हें 1987 में साहित्य अकादमी सम्मान दिया गया. इसी उन्वान से उनकी ग़ज़ल है.

उन्हें न जाने क्यूं उन्हें ‘रात’, ‘नींद’, ‘ख्व़ाब’ और उनके पार की दुनिया लुभाती थी. यह बात उनके अशआरों में कई बार बड़ी खूबसूरती से ज़ाहिर होती है.

कमलेश्वर का मानना था कि शहरयार की शायरी को जदीद या तरक्की पसंद ख़ाने में बंद करना ग़लत होगा क्योंकि जदीदियत उनकी जुबां में हैं, शेर कहने के शऊर में है. तरक्की पसंद शायरी को समझने का कमलेश्वर का तरीका यह है कि मन जब घबरा जाए तो कोई बड़ा सपना देखना, या ख्वाहिश करना तरक्की पसंद है. बात सही है मसलन ये कुछ शेर गौर फरमाइए.

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‘बहते दरियाओं में मुझे पानी की कमी देखना है,
उम्र भर यहीं तिश्ना-लबी देखना है
किस तरह रेंगने लगते हैं ये चलते हुए लोग
यारों कल देखोगे या आज अभी देखना है’
.फ़िल्मी दुनिया के रंग-ढंग पसंद नहीं आये

बहुत मुमकिन था कि उमराव जान और गमन की शोहरत के बाद शहरयार मुंबई का रुख कर लेते. पर उन्होंने ऐसा न किया. उन्हें फ़िल्मी दुनिया के रंग-ढंग पसंद नहीं आये. वे मानते थे कि अगर वहां काम करना है, तो ज़मीर ताक पर रखना होगा. उन्हें वहां कोई ज़हीन इंसान नज़र नहीं आता था.

ऐसा शायद हो भी क्योंकि 80 के दशक तक साहिर, कैफ़ी और सरदार जाफ़री उस दुनिया से एक तरह से रवाना कर दिए गए थे. उस माहौल में उनका गुज़र न हो पाता. एक बात यह भी है, चूंकि उन्होंने कोई समझौता नहीं किया इसलिए उनकी शायरी कहीं भी हलकी पड़ती नज़र नहीं आई. अलीगढ़ की दुनिया उन्हें रास आती थी और वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर बनकर रिटायर हो गए.

कुल मिलाकर बात यह है कि शहरयार ऐसे शायर हैं जो दिल का बयान करने से नहीं चूकते, जो मुश्किल सवालों के हल भी तलाशते हैं. शायद यही कारण है कि आज भी वे हिंदुस्तान और उस पार भी पढ़े जा रहे हैं.

1965 में ‘इस्मे-आज़म’ के नाम से उनका पहला संग्रह छपा.. प्यार, रात, नींद, ख्व़ाब और उसके पार उनके प्रिय क्षेत्र थे. खुदा, मोहब्बत, जन्नत, दीवानगी, इश्क की दुनिया उन्हें लुभाती थी. यह बात उनके अशआरों में हर बार बड़ी खूबसूरती से ज़ाहिर होती थी.

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साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला

उम्दा लेखन के लिए शहरयार साहित्य अकादमी पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार के अलावा उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, दिल्ली उर्दू पुरस्कार, फ़िराक सम्मान, शरफ़ुद्दीन यहिया मुनीरी इनाम और इक़बाल सम्मान आदि से नवाजे गए थे. यों तो साल 2012 में फरवरी की 13 तारीख को इस महान शायर ने दुनिया को अलविदा कहा, पर वे अपनी बेमिसाल शायरी से करोड़ों लोगों के दिलों में हमेशा के लिए जगह बना चुके हैं.

शहरयार ने जिस दौर में शायरी शुरू की, उस दौर में अलीगढ़ बेहतरीन शायरों, लेखकों और साहित्यकारों का गढ़ था. उसी जमात में शहरयार ने अपना खास लहजा पैदा किया और दूसरों से अलग पहचाने गए. उनकी शायरी में तन्हाई और शालीनता के स्वरों की खासी अहमियत रही. वे विषय को गंभीरता से शब्दों में पिरोते थे और उसे बहुत धीमे-धीमे सधे हुए लहजे में व्यक्त करते थे. फिर चाहे बात जिंदगी के फलसफे की हो या राजनीति की.

“तुम्हारे शहर में कुछ भी नहीं हुआ है क्या
कि तुमने चीखों को सचमुच सुना नहीं है क्या
मैं एक जमाने से हैरान हूं कि हाकिम ए शहर
जो हो रहा है उसे देखता नहीं है क्या ”

शहरयार फिल्म लेखन को दोयम दर्जे का नहीं मानते थे. उनका कहना था कि “फ़िल्म का हमारे समाज पर गहरा असर है. फ़िल्म एक ऐसा माध्यम रहा है जिसका समाज में तुरंत असर दिखायी देता है. लंबे समय तक फ़िल्म हमारे समाज में मनोरंजन का सबसे अहम साधन रहा है.

अनपढ़ हो या पढ़ा-लिखा, बच्चें हो या जवान या बूढ़े सब फ़िल्मों में दिलचस्पी रखते हैं.” लेकिन शहरयार हमेशा चाहते थे कि फिल्म का विषय तो ऐसा हो जो उन्हें लिखने के लिये प्रेरित कर सके. वे केवल फिल्मों में लिखन के लिए नहीं लिखना चाहते थे.

शहरयार खामोशी से लिखने और कम बोलने के लिये जाने जाते थे. तमाम उम्र पढ़ाने के बवजूद वे साहित्य पर कभी भाषण नहीं देते थे.

उनके कई काव्य संग्रह प्रकाशित हुए. “ख्वाब का दर बंद है” संग्रह के लिये उन्हें साहित्य अकादमी का सम्मान भी मिला. हंगामों से दूर अपने अंदर के सन्नाटे में मगन रह कर खामोशी से जिंदगी गुजारने वाले शहरयार का 13 फरवरी 1912 को निधन हो गया.

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कहा, फिल्मी गीतों में पोएट्री कि गुंजाईश नहीं

वो बात जो शहरयार को अपने हम-युगीन साहित्यकारों में सबसे नुमायां शख्सियत बनाती है वो इनकी सहजता है. सालों पहले अपने चंद फिल्मी गीतों/गजलों से शहरयार को जो सफलता मिली थी, वो कामयाबी किसी को भी मदहोश कर सकती थी लेकिन शहरयार उससे प्रभावित हुए बगैर वहां से निकल आए.

शोहरत उनके पांव की जंजीर कभी नहीं बन पाई. वो कहते थे ‘अब जो फिल्में बन रही हैं उसमें पोएट्री कि गुंजाईश नहीं है. वो प्रोज है जो म्यूजिक में किसी तरह फिट की जा रही है. तो उसमें मेरा कोई रोल नहीं बचा है. और मेरा मिजाज ये है कि मैं कॉम्प्रोमाइज नहीं कर सकता.

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