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22 सूत्री मांगों को लेकर किसानों का 8 जनवरी को ग्रामीण इलाके में बंद, न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने व कर्ज माफी मुख्य मांग

Ranchi: आठ जनवरी को राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में बंद का आह्वान किया गया है. बंद अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की ओर से देश भर में बुलाया गया है. राज्य में बंद का नेतृत्व झारखंड राज्य किसान सभा (एआइकेएस) की ओर से किया जायेगा.

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एआइकेएस के महासचिव सुरजीत सिन्हा ने बताया कि अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के तीसरे राष्ट्रीय अधिवेशन में इसका निर्णय लिया गया था. अधिवेशन पिछले साल 29 और 30 नंवबर को दिल्ली में आयोजित किया गया था. जिसमें दो सौ किसान संगठनों के लगभग छह सौ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया.

सुरजीत सिन्हा ने बताया कि इस अधिवेशन में निर्णय लिया गया कि आठ जनवरी को भारत के ग्रामीण क्षेत्र बंद रहेंगे. बंद 22 सूत्री मांगों के समर्थन में है. उन्होंने बताया कि इसके पहले पिछले साल किसानों की ओर से संसद मार्च का आयोजन किया गया था. जिसमें मजदूर भी शामिल हुए थे.

इसमें भी अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की 22 सूत्री मांगों को उठाया गया. लेकिन मोदी सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया. जिसके बाद जनवरी में बंद करने का निर्णय लिया गया.

राज्य में अब तक पांच किसान संगठनों का समर्थन

सुरजीत ने बताया कि भले ही राज्य में एआइकेएस इसका नेतृत्व कर रही हो. लेकिन पांच अन्य किसान संगठनों ने बंद का समर्थन किया है. इसमें एआइकेएएस के दो अन्य किसान संगठन, किसान संग्राम समिति, सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन और किसान को-ऑडिनेशन समिति समेत अन्य संगठन है.

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उन्होंने कहा कि सिर्फ किसानों की मांग नहीं बल्कि मजदूरों की मांगों को भी इन 22 सूत्री मांगों में शामिल किया गया है. लंबे समय से न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग की जा रही है. लेकिन मोदी सरकार किसान विरोधी है.

वहीं इनके मुख्य मांग किसानों की कर्ज माफी भी है. भूमि अधिकारों की रक्षा, वन अधिकार कानून 2006 को लागू करने, मनरेगा के तहत ग्रामीण स्तर पर काम बढ़ाने समेत अन्य मांग है. सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन के सुनील मुखर्जी ने बताया कि किसानों और मजदूरों के ग्रामीण बंद में सेल्स प्रमोशन के कर्मचारी भी शामिल होंगे.

उन्होंने बताया कि इनकी मांगों में दवा और मेडिकल उपकरण को जीएसटी फ्री, फार्मास्यूटिकल प्रैक्टिस कोड लागू करने समेत अन्य मांग है. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार श्रम कानूनों को लगातार मालिक पक्षीय बना रही है.

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