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राजनीतिक दलों में किसानों की कर्जमाफी की होड़, कटती है टैक्स पेयर की जेब

राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों में किसानों की कर्ज माफी के एलान से किसानों को विशेष फायदा हो न हो, लेकिन इतना तय है कि कर्ज माफी की होड़ आम कर दाताओं की जेब जरूर काटती है.

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NewDelhi : राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों में किसानों की कर्ज माफी के एलान से किसानों को विशेष फायदा हो न हो, लेकिन इतना तय है कि कर्ज माफी की होड़ आम कर दाताओं की जेब जरूर काटती है. कर्ज माफी का यह दांव राजनीतिक दलों को वोट दिलाये न दिलाये इसका खामियाजा एक आम टैक्स पेयर को भरना पड़ेगा क्योंकि सरकारों को अपना खर्च निकालने की प्राथमिकता के बाद वोट बटोरना ही प्राथमिकता है और इस बीच विकास की रफ्तार पर लगाम लगी रहेगी. बता दें कि लोकसभा चुनाव 2019 से ठीक पहले तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकार बन गयी. इन चुनावों में कांग्रेस की जीत का बड़ा कारण किसानों से कर्ज माफी का वादा माना जा रहा है. इस जीत के बाद एक बार फिर कई राज्य किसानों की कर्ज-माफी का ऐलान कर रहे हैं ताकि आम चुनावों में किसान की नाराजगी वोट न काट ले. कर्जमाफी के ऐलान से वोट बचेंगे या नहीं, यह तो आम चुनाव के नतीजे ही बतायेंगे.

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कर्ज माफी से राज्य सरकारों की जीडीपी गिरी

दरअसल 2017 से देश में जारी किसान कर्ज माफी के राजनीतिक दांव से ज्यादातर राज्यों का खजाना दबाव झेल रहा है. किसान कर्ज को माफ करने की शुरुआत करते हुए महाराष्ट्र सरकार ने 34,000 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया और राज्य की जीडीपी 1.3 फीसदी कम हो गयी. इसके बाद यूपी में बनी योगी सरकार ने 36,000 करोड़ रुपये की कर्ज माफी की और राज्य की जीडीपी को 2.7 फीसदी की चोट पहुंची. फिर पंजाब ने 10,000 करोड़ और राजस्थान ने फरवरी 2008 में 8000 करोड़ रुपये के किसान कर्ज माफ किये और राज्यों की जीडीपी में 2.1 फीसदी और 0.9 फीसदी का नुकसान हुआ. इंडिया टुडे के संपादक अंशुमान तिवारी के अनुसार इन सभी कर्ज माफी को मिलाकर इस दौरान कुल एक लाख 72 हजार 146 करोड़ रुपये की कर्ज माफी का ऐलान किया जा चुका है.

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यूपीए सरकार ने 2008 में कर्ज माफी को राजनीतिक हथियार बनाया

इंडिया टुडे के नेशनल अफेयर्स एडिटर राहुल श्रीवास्तव कहते हैं कि कर्ज माफी को मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने 2008 में राजनीतिक हथियार बनाया और 70,000 करोड़ रुपये की देशव्यापी कर्ज माफी का ऐलान किया. लेकिन चुनावी वादों का फायदा किसानों तक नहीं पहुंचता. अंशुमान तिवारी कहते हैं कि इस बात की कोई गारंटी नहीं कि चुनाव से पहले किसान कर्ज माफी का ऐलान करने से जीत तय की जा सकती है. अंशुमान तिवारी ने कहा कि उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की सरकार को कर्ज माफी की पूरी रकम अपने बजट से निकालनी पड़ी. इस रकम के लिए उत्तर प्रदेश को विकास के काम को एक-तिहाई कम करना पड़ा वहीं महाराष्ट्र सरकार को अपना खर्च निकालने के लिए शिरडी के मंदिर से कम दर पर कर्ज लेना पड़ा.

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