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फर्जी नक्सली सरेंडर मामले में दो नवंबर को होगी अंतिम सुनवाई

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Ranchi: रांची, खूंटी, गुमला व सिमडेगा के भोले-भाले 514 युवकों को नक्सली बताकर सरेंडर कराने वाले मामले में शुक्रवार को सुनवाई हुई. कोर्ट ने मामले पर सुनवाई करते हुए दो नवंबर की तारीख आखिरी बहस के लिए तय की है. बता दें कि दिग्दर्शन के जरिये नौकरी लगाने का लालच देकर 514 युवाओं को फर्जी सरेंडर कराने का आरोप है. इस मामले ने राज्य में काफी तूल पकड़ा था. कई बार कोर्ट ने मामले को लेकर प्रशासन और सरकार को फटकार लगायी थी. यहां तक कि गृह सचिव को भी सशरीर कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया था.

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क्या है मामला

यह पूरा मामला रांची, खूंटी, गुमला व सिमडेगा के भोले-भाले 514 युवकों को नक्सली बताकर सरेंडर कराने का है. इस मामले में एजेंट और अफसरों ने सरेंडर करनेवाले युवकों से हथियार खरीदने के नाम पर लाखों रुपये वसूले, ताकि सरेंडर के समय उन्हें वे हथियार उपलब्ध कराये जा सकें. यहां उल्लेखनीय है कि जिस वक्त 514 युवकों को कोबरा बटालियन के जवानों की निगरानी में पुरानी जेल परिसर में रखा गया था और हथियार के साथ उनकी तस्वीरें ली जा रही थीं, उस वक्त सीआरपीएफ झारखंड सेक्टर के आईजी डीके पांडेय हुआ करते थे. डीके पांडेय अभी राज्य के डीजीपी हैं. और इस मामले में डीजीपी डीके पांडेय, एडीजी एसएन प्रधान समेत सीआरपीएफ के अन्य अफसर संदेह के घेरे में हैं.

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झारखंड डेमोक्रेटिक संस्था ने दायर की थी जनहित याचिका

वहीं, मामले की जांच को लेकर रांची पुलिस पर लापरवाही बरतने का भी आरोप है. रांची पुलिस ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उस रिपोर्ट पर गौर ही नहीं किया, जिसमें कहा गया था कि पुलिस के सीनियर अफसरों ने सरेंडर का आंकड़ा बढ़ाने के लिए नक्सली सरेंडर पॉलिसी का दुरुपयोग किया. इस मामले को लेकर झारखंड डेमोक्रेटिक संस्था की ओर से झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गयी थी.

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