Opinion

सुशांत की मौत के बाद फर्जी प्राइड का खेल

Asit Nath Tiwari

मराठा और मराठा प्राइड की राजनीति से प्रभावित मुंबई वालों ने बिहारियों को बराबरी का दर्जा दिया ही कब है जो अब दे देंगे! साल दर साल बिहारियों को मारने-पीटने वाले मराठा मानुष भला ये कैसे बर्दाश्त कर लें कि एक बिहारी की संदिग्ध मौत मामले में किसी विषकन्या से पूछताछ हो जाए. बिहार और यूपी वालों को दो कौड़ी का मामूली मजदूर मानने वाली ये मराठा सोच नई तो नहीं है.

और ऐसा भी नहीं है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ये बात नहीं जानते हैं. नीतीश कुमार जिस वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री थे, उसी वाजपेयी सरकार को बर्बर ठाकरे का समर्थन हासिल था और उसी बर्बर ठाकरे के लोग मुंबई में बिहारियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटते थे. तब नीतीश कुमार को एक बार भी बिहारियों का ख्याल नहीं आता था और एक बार भी वो बर्बर ठाकरे के सामने सिर उठाकर बोलते नहीं देखे गए.

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नीतीश कुमार 2005 से बिहार के मुख्यमंत्री हैं. उनके कार्यकाल में बीसियों बार मुंबई में बिहारियों पर हमले हुए हैं. बिहारियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया है. रेलवे की परीक्षा देने गए छात्रों की पीट-पीट कर हत्या की गई है. इनमें से कितने मामलों की जांच के लिए नीतीश की सरकार ने बिहार पुलिस को मुंबई भेजा है? सच ये है कि दोनों तरफ से झूठी शान का प्रदर्शन हो रहा है. सुशांत की संदिग्ध मौत को नीतीश कुमार बिहारी प्राइड से जोड़ने में सफल होते दिख रहे हैं. ये सारे प्रयास सियासी मतलब साधने के लिए हो रहे हैं.

ये बात हुई नीतीश कुमार की और अब बात उद्धव ठाकरे की. बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे भी उसी बर्बर मराठा प्राइड की राजनीति करते हैं जिसकी शुरुआत उनके पिता बर्बर ठाकरे ने की थी. इस राजनीति का मकसद मराठों का भला न तो तब था और ना ही अब है. इस राजनाति का मकसद तब भी दूसरों से नफरत करना था और आज भी वही है.

नफरत की इस आग में आदमी अपनी कमियों को भूल जाता है. मतलब, मराठा ये भूल गए हैं कि उनकी बुनियादी ज़रूरतों के लिए सरकार की एक जिम्मेदारी बनती है. वो बस बिहारियों से नफरत करने को मराठा अस्मिता मान बैठे हैं.

जब तक सुशांत सिंह राजपूत हीरो थे, तब तक मराठा प्राइड वाली इस सियासी सोच को उनसे दिक्कत नहीं थी लेकिन, जैसे ही सुशांत के बिहारी होने का सच सामने आया है मराठों की नफरती सोच सामने आ गई. बर्बर ठाकरे की सियासी विरासत संभालने वालों को ये बात खलने लगी कि बिहारी की मौत की जांच बिहार पुलिस करे. फिर वही बर्बर खेल शुरू हो गया है. अपने पिता की दो कौड़ी वाली बर्बर प्राइड पॉलिटिक्स को उद्धव ठाकरे फिर आगे सरकाते दिख रहे हैं.

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मुझे संदेह है कि उद्धव ठाकरे और उनकी बर्बर पार्टी के लोग एक बार फिर मुंबई में बिहारियों के खिलाफ हिंसा का माहौल खड़ा करेंगे और बिहार पुलिस और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराएंगे.

इसलिए, बेहतर होगा कि समय रहते महाराष्ट्र के मराठा प्राइड की इस सोच को सकारात्मक दिशा दी जाए. मराठा युवकों को ये बताया जाए कि बर्बर ठाकरे ने अपने सियासी फायदे के लिए मराठा प्राइड का जो आवरण तैयार किया, दरअसल वो प्राइड नहीं बल्कि मराठों को लठैत बनाकर सत्ता को बर्बर परिवार का चाकर बनाए रखने की साजिश है.

वक्त रहते ये काम नहीं किया गया तो फिर एक दिन बर्बर ठाकरे के वंशज मराठा प्राइड के नाम पर अलगाववादी सोच को खाद-पानी देने लग जाएंगे. इसलिए ज़रूरी है कि फर्जी प्राइड वाली पॉलिटिक्स, चाहे बिहारी प्राइड के नाम पर चल रहा फर्जीवाड़ा हो, चाहे लंबे अर्से से चला आ रहा मराठा प्राइड वाला फर्जीवाड़ा हो, दोनों की पोल खोली जाए और बर्बर ठाकरे के वंशजों को अलगाववादी ताकत बनने से रोका जाए.

डिस्क्लेमर: लेखक पत्रकार और कवि हैं,ये इनके निजी विचार हैं.

 

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