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आस्था या अंधविश्वास ? नंगे पांव से जलते अग्निकुंड से पार हुए ग्रामीण

Ranchi : आस्था और अंधविश्वास के नाम पर इस देश में कई परंपरा चलती हैं. ऐसी ही एक परंपरा नंगे पांव से अग्निकुंड पार करने की भी है. बता दें कि सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी कायम है. अग्निकुंड को नंगे पांव पार करने के ये दृश्य पाकुड़ के हिरणपुर के परगला नदी के किनारे में देखने को मिला. परगला नदी के किनारे आस्था व विश्वास के साथ ग्रामीण अग्निकुंड में नंगे पांव पार हुए.

नदी किनारे स्थित खेत मे करीब 10 फिट लंबी व 3 फिट चौड़ी अग्निकुंड का निर्माण कराया गया था. इस अग्निकुंड में काफी मात्रा में लकड़ी को जलाया गया था. जामपुर निवासी पुजारी देवीलाल हांसदा ने श्रद्धालुओं के साथ भगवान राम, सीता व लक्ष्मी की पूजा अर्चना की. फल, फूल समेत मिठाई का चढ़ावा भी चढ़ाया. इसके बाद भक्ति गीतों की लय के साथ उपस्थित श्रद्धालु झूम उठे. इसके बाद मंत्रोच्चारण के साथ पुजारी नंगे पैर अग्निकुंड में कई बार पैदल चलकर पार हुए. इसके बाद श्रद्धालु भी एक-एक कर पार होने लगे.

इसे देखने के लिए काफी संख्या में दर्शक उपस्थित थे. पुजारी ने कहा कि भगवान के प्रति आस्था व विश्वास के साथ कोई भी कार्य किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि अग्निदेव की स्तुति कर अग्निकुंड को पार किया गया. भगवान राम व सीता से लोगो की खुशी व स्वास्थ्य की प्रार्थना की गयी.

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क्या है परंपरा

पुजारी ने बताया कि मकर संक्रांति के मौके पर इस मेले का आयोजन किया जाता है. उन्होंने बताया कि ऐसे तो इस मौके पर कई लोग शामिल होते हैं. लेकिन साफा होड़ के लोगों को इस परंपरा खासी मान्यता है. उन्होंने बताया कि प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के मौके पर लोगों का जुटान होता है. रात भर भक्तिमय गीत गाने के बाद सुबह इस परंपरा को पूरा किया जाता है. हालांकि सबसे पहले पुजारी ही अग्निकुंड को पार करते हैं.

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