LITERATURE

गांव के चौराहे पर : कविता संग्रह के बहाने विज्ञान और साहित्य के बीच रिश्ते की पड़ताल

Zeb Akhtar  

साहित्य और विज्ञान, एक साथ हों, यह संयोग बिरले ही हो पाता है. जार्ज आरवेल के बारे में कहा जाता है कि पहले वे विज्ञान के विद्यार्थी थे. तभी बहुत कम लिखने के बाद भी वे हमारी समृतियों में हैं. खलील जिब्रान को खगोल शास्त्र में एक साधारण अरब से अधिका रुचि औऱ जानकारी थी. वर्तमान समय में देखें तो कथाकार संजीव (जो मेरी पहुंच में हैं) विज्ञान के छात्र रहे और बतौर वैज्ञानिक लैब टेक्नीशिय की नौकरी भी एक लौह कारखाने में करते रहे. इसलिए संजीव की रचनाओं में प्राय: विज्ञान चला आता है. दबे पांव नहीं, डंके की चोट की तरह. साहित्य और विज्ञान के मिलन को मैंने बहुत अलग तरह से देखने और समझने की कोशिश की है. कहानियों में इस ‘अनायास’ को आप नियंत्रित कर सकते हैं. लेकिन कविता लिखते समय ये मेल अगर हो तो यह एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आता है.

कविता संवेदनाओं की आद्र जमीन पर बुनी, बोयी जा सकती है, नहीं तो ये निष्प्रभावी रहेगी. और ऊपर से अगर उसमें विज्ञान का इनपुट जबरन, आपके मष्तिष्क और सोंच के रास्ते आता रहे तो कविता के आद्र स्वरूप को कुंद कर सकती है. इससे जूझते हुए आपको अच्छी कविता कहनी होती है. और अपना प्रभाव छोड़ना होता है. मेरे ख्याल से लालदीप ने इसी चुनौती को स्वीकार किया है. और विज्ञान की धारा में चलते हुए कविता कहने और वो भी आम आदमी की कविता, खुरदुरी जमीन की कविता कहने का जोखिम उठाया है. लालदीप के कविता “संग्रह गांव के चौराहे  पर” को इसीलिए भारतीय कविता के परिप्रेक्ष्य में अलग से पढ़ा जाना चाहिये.

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मैं लगभग एक दशक से उनको पढ़ रहा हूं. आम तौर पर कविताओं से परहेज ही रहता है. क्योंकि अक्सर मैंने समकालीन कवियों में संवेदना तो देखी है, लेकिन वहां से विचारधारा और सोच गायब है. और जब आप विचारधारा के प्रति आग्रही होते हैं, तो वहां कलात्मकता की गुंजायश कम हो जाती है. और यही कलात्मकता आपको पाठक के नजदीक करती है. तो लालदीप ने न सिर्फ कविता की संवेदना, उसकी कलात्मकता और उसके आद्र रूप को अपने लेखन में बचाये रखा है, बल्कि वहां एक वैज्ञानिक सोच भी है. जो आपको कहीं से रूमानी नहीं होने देता. आपको रूमानी होने से बचाये रखना चाहता है. मेरे विचार से लालदीप की कविताओं को इसीलिए नोट किया जाना चाहिये. जिस जमीन से वे कविताओं के लिए पौध और जल लाते हैं, वो बेहद खुरदुरी, बेहद उखड़-खाबड़ और बेहत रूखी जमीन है. किसी मजदूर और फसल गंवा चुके किसान के जीवन की तरह. जहां से प्रतिरोध के स्वर गर्जना के साथ गूंजते और उठते हैं.

जैसे समृति कविता की इन लाइनों को देखिये-

मां की स्मृति में अब भी ताजा है

रैलियों में हमें, पीठ पर बेतरा किये

मीलों पैदल चलना

मुट्ठियों में  भींचकर नारा लगाना

इनकलाब जिंदाबाद की जगह

इनकलाब जिनराबाएल कहना

…और पांच पंक्तियों की इस कविता में आप क्या क्या देख सकते हैं, कोशिश कीजिये –

गोली छोड़ने के बाद

बंदूक दर्ज करती है अपना प्रतिरोध

बंदूकधारी के कंधे

और मस्तिष्क पर

टूटी हुई मेढ़ कविता में लालदीप किसान की वो परिभाषा स्थापित करते हैं, जिस से हम आज  तक लगभग अनजान रहे हैं –

किसान होते हैं इंजीनियर

जोड़ते हैं परिवार, गांव, समाज

देश के विकास के लिए

टूटे मेढ़ जोड़ते हैं बार-बार

इन दिनों पिता परेशान है

गांव में भी खबर है कि

खेतों के लुटेरे आ रहे हैं

कविता संग्रह की अंतिम की कुछ कविताओं में वही खुरदुरापन फिर से झांकने लगता है, जिस जमीन पर लालदीप और उनका लेखकीय चिंतत गतिशील है. एक कविता है वे कब के मारे जा चुके हैं –

जो बोल रहे हैं

वे मारे जायेंगे

जो चुप हैं,

वे भी मारे जायेंगे

लेकिन जो चुप होने का अभिनय कर रहे हैं

वे तो कब के मारे जा चुके हैं

लालदीप ऐसी ही जमीनों के कवि हैं. हमारे समय में उनका होना जरूरी है. मेरी जानकारी में ये उनका पहला कविता संग्रह है. दुबला सा. सिर्फ 80 पृष्ठों का. लेकिन अगर आप इन कविताओं में उतरना चाहें तो ये आपको अंतहीन समय के सफर पर ले जाने में सफल हैं. जहां से लौटना मुश्किल है. लालदीप के जीवन को पकड़ने के कौशल और उनकी वैज्ञानिक सोच के कारण.

संग्रह बोधि प्रकाशन से छपा है, जिसकी कीमत 120 रुपये हैं. और मंगवाने का पता है- सी-46, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर, 302006.

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