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रोजगार मेला और कोयलांचल के युवाओं के शोषण का खेल

मीडिया और बड़े-बड़े बैनर लगाकर पूरे शहर में प्रचार किया जाता है. रोजगार दिलाने के बड़े-बड़े दावे किये जाते हैं.

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Dhanbad: धनबाद में अक्सर राष्ट्रीय स्तर की कम्पनियां स्थानीय संस्थाओं के साथ मिलकर रोजगार मेला लगाती हैं. बड़े- बड़े कार्यक्रम आयोजित करती हैं. मीडिया और बड़े-बड़े बैनर लगाकर पूरे शहर में प्रचार किया जाता है. रोजगार दिलाने के बड़े-बड़े दावे किये जाते हैं. युवाओं को सुनहरे सपने दिखाये जाते हैं. रोजगार देने का श्रेय लूटने की होड़ मचती है. ये संस्थाएं खुद को भाग्य विधाता सिद्ध करने में लग जाती हैं. लेकिन रोजगार मेला और रोजगार का असली सच कुछ और ही है. रोजगार मेला कोयलांचाल के युवाओं के सपनों के साथ एक छलावा मात्र है. रोजगार के नाम पर यहां के युवाओं के आगे चारा डाला जाता है. बेरोजगारी का आलम ऐसा कि युवा खींचे चले आते हैं. ऐसा ही एक मेला महीने भर पहले जियालगोरा में भी लगाया गया था. वहां लगभग 500 युवाओं को रोजगार दिया गया था.

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रोजगार का सच यह है

कोयलांचाल के युवाओं को दिल्ली, नोएडा, मानेसर, गुरुग्राम, गुजरात आदि की कम्पनियों में ले जाकर काम पर लगा दिया जाता है. वहां उन्हें 12 घंटे खड़ा रखकर काम कराया जाता है. जिसके बदले  केवल 8 से 10 हजार रुपये ही मिलते हैं. वहां उन्हें रहने के लिए रूम का किराया भी खुद देना होता है. खाना का खर्च भी खुद ही वहन करना पड़ता है. गाड़ियों से आने-जाने का किराया भी अपनी ही जेब से देना होता है. इन सब में ही युवाओं का खर्च कम से कम 5-6 हजार रुपए हो जाता है. वहां न उन्हें आसानी से छुट्टी मिलती है और ही बीमार होने पर स्वास्थ्य सुविधा. सिर्फ और सिर्फ आप जानवरों की तरह काम कीजिए. ऐसा ये कम्पनियां इसलिए करती हैं, क्योंकि उन क्षेत्रों के युवा को यह हालत पहले ही पता होता है. वह इन हालात को बर्दाश्त नहीं करते. विद्रोह कर देते हैं. जिससे बचने के लिए इन कम्पनियों ने स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं देने का नियम बना दिया है. स्थानीय लोग उनके इस शोषण को समझ चुके हैं और वह इस शोषण का शिकार नहीं होते इसलिए कोयलांचाल के युवाओं को मछली की भांति चारा डालकर फंसाया जा रहा है.

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क्या कहते हैं रोजगार मेला में चयनित युवा

रोजगार मेले से ही चयनित अभ्यर्थी में एक गुरुग्राम में कार्यरत पीयूष कुमार ने बताया कि उसे महीने की 8 हजार रुपये सैलरी दी जाती है. बदले में 10 घंटे लगातार खड़े रहकर उत्पादन का काम करना होता है. रहने-खाने, आने-जाने का खर्च भी उसे खुद उठाना पड़ता है. हद तो तब हो जाती है जब कभी वह बीमार हो जाते हैं. तब भी कंपनी उन्हें छुट्टी नहीं देती. अगर खुद छुट्टी करते हैं तो कंपनी हाजिरी काट लेती हैं. मेडिकल की कोई सुविधा नहीं मिलती है.

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